74 दिनों से संघर्षरत हिंदी विश्वविद्यालय के छात्रों के समर्थन में उतरे सीजेपी फाउंडर अभिजीत दीपके

वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के छात्रों के 74 दिन से जारी संघर्ष को समर्थन देने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके आंदोलन स्थल पर पहुंचे और आंदोलनरत छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त की। जिलाधिकारी कार्यालय के पास गांधी प्रतिमा के निकट चल रहे धरने का शनिवार को 17वां दिन था।

अभिजीत दीपके ने छह दलित-पिछड़े छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर तत्काल वापस लेने और विश्वविद्यालय परिसर तथा छात्रावास में उनके प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंध को समाप्त करने की मांग की। उन्होंने कहा कि पानी, भोजन, पुस्तकालय, शिक्षा और लंबित प्रवेश जैसी बुनियादी मांगें उठाने वाले छात्रों को अपराधी की तरह पेश करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

दीपके ने आंदोलन की मांगों का उल्लेख करते हुए कहा कि छात्र साफ पानी, भोजन, 24 घंटे पुस्तकालय, विभागों की वापसी और लंबित पीएचडी प्रवेश जैसी मांगें उठा रहे हैं।

उन्होंने सवाल किया कि जब छात्र विश्वविद्यालय में अपनी बुनियादी जरूरतों और शैक्षणिक अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे थे, तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और कैंपस से प्रतिबंधित करने की जरूरत क्यों पड़ी।

उन्होंने तीखे अंदाज में कहा कि “छात्र आपसे बेसिक डिमांड्स ही मांग रहे थे — साफ पानी, खाना और 24 घंटे लाइब्रेरी। वे आपसे बंगला – गाड़ी तो नहीं मांग रहे थे।”

उन्होंने कहा कि छात्रों की समस्याओं का जवाब पुलिस कार्रवाई और प्रतिबंध नहीं, बल्कि संवाद और समाधान होना चाहिए। उन्होंने आंदोलन को अपना समर्थन देते हुए कहा कि बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे छात्रों के अपराधीकरण का विरोध किया जाएगा।

छात्रों का आरोप है कि आंदोलन समाप्त कराने के लिए वर्धा पुलिस की ओर से लगातार दबाव बनाया जा रहा है। छात्रों के अनुसार, उन्हें अब तक दो नोटिस दिए जा चुके हैं, जिनमें आंदोलन समाप्त नहीं करने की स्थिति में कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

आंदोलनरत छात्रों का सवाल है कि क्या लोकतांत्रिक देश में अपने शैक्षणिक और बुनियादी अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण धरना देना अपराध हो गया है?

छात्रों का कहना है कि वे लगातार शांति व्यवस्था बनाए रखते हुए संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे हैं। इसके बावजूद आंदोलन समाप्त कराने के लिए पुलिस नोटिस और कार्रवाई की चेतावनी लोकतांत्रिक अधिकारों पर दबाव के रूप में देखी जा रही है।

आंदोलनरत छात्र शिवपूजन पासी ने कहा—“जब तक विश्वविद्यालय प्रशासन हम छह दलित-पिछड़े छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस नहीं लेता, विश्वविद्यालय परिसर और छात्रावास में लगाए गए प्रतिबंध को समाप्त नहीं करता तथा हमारी बुनियादी मांगों पर ठोस पहल नहीं करता, तब तक हमारा आंदोलन समाप्त नहीं होगा। हम किसी भी दमनात्मक कार्रवाई के आगे झुकने वाले नहीं हैं। हमारा संघर्ष शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से जारी रहेगा।”

परास्नातक छात्र राहुल कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न के विरोध में 28 सितंबर को ‘चलो वर्धा विश्वविद्यालय’ का देशव्यापी आह्वान किया गया है।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)

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