सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाई, जिसमें गौतम बुद्ध नगर जिले (नोएडा) की मजिस्ट्रेट मेधा रूपम को नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में छात्रा आकृति चौधरी को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए) के तहत हिरासत में रखने के लिए अपनी सैलरी से 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने उस फ़ैसले के अमल पर भी रोक लगाई, जिसमें छात्रा की हिरासत रद्द की गई थी।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने DM और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर चैंबर में अंतरिम रोक का आदेश पारित किया। सुनवाई के दौरान, बेंच ने ज़िला मजिस्ट्रेट की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और यूपी सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी की दलीलें संक्षेप में सुनीं। इसके बाद VC कार्यवाही का ऑडियो म्यूट कर दिया गया और मीडिया की पहुँच रोक दी गई (रिपोर्टर सुप्रीम कोर्ट में शारीरिक रूप से प्रवेश नहीं कर सकते)।
कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के पैरा 27 से 33 पर रोक लगाई। इन पैराग्राफ़ में बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए साफ़ चेतावनी दी थी कि अफ़सरशाही का लगातार ‘तानाशाही’ वाला रवैया उत्तर प्रदेश को “ऑर्वेलियन डिस्टोपिया” (एक दमनकारी समाज) में बदल सकता है, और 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था।
कोर्ट ने कहा, “दोनों पक्षों के सीनियर वकीलों को सुनने के बाद यह कोर्ट इस राय पर है कि जब तक मामले की मेरिट पर सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक विवादित फ़ैसले, विशेष रूप से पैरा नंबर 27 से 33, के अमल पर रोक रहेगी।”
हाईकोर्ट के फ़ैसले के पैरा 27-33 में DM के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणियाँ और मुआवज़ा देने का निर्देश शामिल है।
जहां SG मेहता ने तर्क दिया कि अधिकारी के ख़िलाफ़ टिप्पणियाँ “बेवजह” थीं, वहीं रोहतगी ने भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को “पूरी तरह से अनावश्यक” बताया। उन्होंने कहा कि प्रतिवादी, आकृति चौधरी, हरियाणा के मानेसर में “समस्या पैदा कर रही थीं” और बाद में आंदोलन नोएडा में शिफ्ट हो गया, जिसके कारण अप्रैल में आगज़नी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा।
रोहतगी ने तर्क दिया कि हिरासत का प्रस्ताव SHO द्वारा रखा गया और अंततः DM द्वारा मंज़ूर किया गया। उन्होंने कहा कि DM के आदेश को सलाहकार समिति ने मंज़ूरी दी थी। बाद में राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने भी ‘नेशनल सिक्योरिटी एक्ट’ (NSA) के तहत इसे मंज़ूरी दी; उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि DM इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ़ एक “कड़ी” थे।
रोहतगी ने आगे तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने NSA के तहत हिरासत में लेने के आदेश की समीक्षा नहीं की, बल्कि कोर्ट ने सिर्फ़ यह देखा था कि गिरफ़्तारी कानूनी थी या नहीं। इस मोड़ पर कार्यवाही का ऑडियो रोक दिया गया, जिससे आगे की कार्यवाही की जानकारी नहीं मिल सकी।
सीनियर वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने कैविएट पर आकृति चौधरी का पक्ष रखा। बेंच ने प्रतिवादी को अपना जवाबी हलफ़नामा दाखिल करने की अनुमति दी।
दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ स्टूडेंट और एक्टिविस्ट, 24 साल की आकृति चौधरी को NSA के तहत हिरासत में लेने का आदेश रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश जारी करने के तरीके की कड़ी आलोचना की थी।(मेधा रूपम बनाम आकृति चौधरी और अन्य|डायरी नंबर 56202-2026)
इसके साथ एक विवाद भी खड़ा हो गया है। आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को रद्द करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुप्रीम कोर्ट में हुई लिस्टिंग ने मामलों के रोस्टर और कनेक्टेड मामलों की सुनवाई को लेकर सवाल खड़े किए हैं। नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दायर याचिकाओं पर बुधवार को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की। रिपोर्ट के अनुसार, 13 जुलाई 2026 से प्रभावी सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर में Habeas Corpus और Preventive Detention से जुड़े मामले इस पीठ के रोस्टर में शामिल नहीं हैं।
13 जुलाई 2026 के सुप्रीम कोर्ट रोस्टर के अनुसार, Habeas Corpus और Preventive Detention (Category 2201-2202) से जुड़े मामले वरिष्ठता क्रम में शुरुआती चार पीठों को सौंपे गए हैं। इनमें चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एमएम सुंदरेश की अध्यक्षता वाली पीठें शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई पहले से जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है।
नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित हैं। केशव आनंद की याचिका में उनके भाई आदित्य आनंद और ऑटो चालक रूपेश रॉय को कोर्ट के समक्ष पेश करने की मांग की गई थी। दोनों की गिरफ्तारी को भी चुनौती दी गई थी।
8 मई को नोटिस जारी होने के बाद 15 मई को सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों को उत्तर प्रदेश पुलिस के माध्यम से कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। इसके बाद उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाई गई और याचिका लंबित रही।
इसी तरह पत्रकार सत्यम वर्मा की पत्नी ने अपने पति की NSA के तहत preventive detention को चुनौती दी थी। यह याचिका बाद में 7 सितंबर को हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता के साथ वापस ले ली गई।
इसके अलावा कानून के छात्र योगेश मीणा ने भी नोएडा मजदूर प्रदर्शन के संबंध में अपनी गिरफ्तारी और कथित पुलिस उत्पीड़न को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह मामला भी जस्टिस नागरत्ना की पीठ के समक्ष आया था और अभी लंबित है।
रिपोर्ट में मुख्य सवाल यह उठाया गया है कि जब नोएडा प्रदर्शन से जुड़े अन्य Habeas Corpus और Preventive Detention मामले जस्टिस नागरत्ना की पीठ के समक्ष लंबित हैं, तो जिलाधिकारी और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाएं जस्टिस शर्मा की पीठ के सामने कैसे सूचीबद्ध हुईं।
इन याचिकाओं को भी Category 2202 के तहत रखा गया है, जबकि यह कैटेगरी जस्टिस शर्मा के नियमित रोस्टर में दिखाई नहीं देती। आमतौर पर एक ही मामले से जुड़े कनेक्टेड मामलों को उसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने की प्रथा रही है। हालांकि, जस्टिस शर्मा के रोस्टर में “any other matters specially assigned” का प्रावधान मौजूद है।
इसलिए रिपोर्ट में यह संभावना व्यक्त की गई है कि मामला विशेष रूप से इस पीठ को सौंपा गया हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट में Master of Roster की प्रशासनिक शक्ति चीफ़ जस्टिस के पास होती है।
सुनवाई के दौरान एक अन्य घटनाक्रम भी सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग कार्यवाही का ऑडियो म्यूट करने का निर्देश दिया, जिससे कोर्ट रिपोर्टर्स को सुनवाई की कार्यवाही सुनने में असुविधा हुई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कोर्ट रिपोर्टर्स को भौतिक रूप से कोर्टरूम में मौजूद रहने की अनुमति नहीं थी और VC ऑडियो म्यूट होने के कारण वे कार्यवाही को सुन नहीं सके। इस घटनाक्रम को लेकर भी ओपन कोर्ट की कार्यवाही और मीडिया की पहुंच से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
पूरे घटनाक्रम के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि मामले की असामान्य लिस्टिंग, कनेक्टेड मामलों की अलग-अलग पीठों के समक्ष सुनवाई और VC ऑडियो म्यूट किए जाने के कारण न्यायिक प्रशासन में पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास से जुड़े प्रश्न उठते हैं।
हालांकि, उपलब्ध सामग्री में इस विशेष लिस्टिंग के कारण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट प्रशासन या मुख्य न्यायाधीश की ओर से कोई स्पष्टीकरण दर्ज नहीं है। इसलिए विशेष असाइनमेंट के संबंध में अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय इसे एक संभावित प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)