राहुल गांधी को करनी चाहिए देश की पदयात्रा: रामशरण जोशी

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देश की सत्ता इस समय हिंदुत्ववादी शक्तियों के हाथों में है। भाजपा की जीत ने विपक्ष के हौसले को पस्त कर दिया है। विपक्षी दलों में बिखराव है और ये सुविधाभोगी राजनीति के दलदल में फंसे है। कम्युनिस्ट पार्टियां इस पूरे परिदृश्य से बाहर हैं। मध्यमार्गी दल परिवारवाद की चपेट में हैं। राजनीतिक पार्टियां जनता के सवालों पर संघर्ष करने से बच रही हैं। राजनीति में कारपोरेट और हिंदुत्व के घालमेल ने देश की आबोहवा में एक अजीब किस्म का उन्माद भर दिया है। ऐसे में देश को सांप्रदायिकता, कट्टरपंथ और कारपोरेटराज से कैसे मुक्ति मिलेगी, इन्हीं सवालों पर वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी से प्रदीप सिंह ने बातचीत की है। पेश है बातचीत का संपादित अंश:

आम चुनाव 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर से भारी बहुमत से सत्ता में लौटे हैं। इस जीत का श्रेय किसे देना चाहेंगे नरेंद्र मोदी,अमित शाह या भाजपा-संघ के विशाल संगठन को?

रामशरण जोशी: यकीनन 17वीं लोकसभा की जीत का सेहरा नरेंद्र मोदी के माथे पर बंधना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस दोनों इस जीत में एक महत्वपूर्ण कारक जरूर रहे हैं लेकिन इन दोनों संस्थाओं का प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने किया है। आज संघ परिवार की कार्यप्रणाली के निर्धारण पर मोदी-शाह के जबरदस्त प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसकी शुरूआत 2013 से ही हो चुकी थी जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था।

2014 में अभूतपूर्व विजय के पश्चात नरेंद्र मोदी और उनके लगोटिया यार अमित शाह ने इतना जरूर समझ लिया कि अब वे आसानी से भारतीय सत्ता के साथ-साथ संघ की सत्ता को छोड़ने वाले नहीं हैं। इसलिए मोदी ने अपने परम मित्र अमित शाह को भाजपा की बागडोर दी औऱ इसके बाद उन्हें सत्रहवीं लोकसभा में गृहमंत्री बनाया। यानी अब यह कह सकते हैं कि मोदी-शाह ने सरकारी तंत्र के साथ-साथ संगठन को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया है। नरेंद्र मोदी की जीत में उनकी भाषण कला और मेहनत ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ठेठ देशज शब्दों और मुहावरों से वे जनता के साथ जुड़ते गए। लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि 2014 और 2019 दोनों जीत में पर्दे के पीछे से एक महत्वपूर्ण शक्ति काम करती रही, वह है इस देश की उभरती कारपोरेट शक्ति।

2014 के पहले कारपोरेट सेक्टर ने यह समझ लिया था कि मिलीजुली सरकार में उनका हित नहीं सधता है। कोई मजबूत सरकार ही उनको आगे बढ़ा सकता है। इस दृष्टि से नरेंद्र मोदी उनके लिए सबसे अच्छे विकल्प के रूप में उभरे। कारपोरेट मीडिया ने उन्हें आईकॉन के रूप में स्थापित किया। कारपोरेट ने मोदी को पूंजीदूत के रूप में स्थापित किया। इसमें मीडिया ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज सारी मीडिया पूंजीपतियों के हाथ में है।

मोदी सरकार हिंदुत्व की नीतियों पर चल रही है या कारपोरेट के इशारे पर काम कर रही है?
रामशरण जोशी:
मोदी कारपोरेट के दुलारे हैं और हिंदुत्व के भी। मोदी सरकार कारपोरेट के हित को ध्यान में रख कर ही सारे फैसले करती है इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए। लेकिन हिंदुत्व के ठेकेदार भी सुविधा से वंचित नहीं हैं। उन्हें कानूनी-गैरकानूनी तरीके से हर काम करने को छूट मिली हुई है। आज दुनिया में नेशन-स्टेट को किस तरह से कारपोरेट स्टेट में रूपांतरित कर दिया जाए, इसकी कोशिश हो रही है। कारपोरेट पहले पर्दे के पीछे से राज्य को संचालित करता है। शासन को अपने हित में फैसले करने को बाध्य करता है। वह खुलकर मंच पर कम आता है। लेकिन कारपोरेट की अंतिम महत्वाकांक्षा है कि स्टेट को कारपोरेट राज्य में तब्दील कर दिया जाए। ऐसे में कारपोरेट भी राज्यसत्ताओं का स्पष्ट संचालक बनकर संपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक सत्ता पर कब्जा कर सकता है। अब मोदी सरकार में कारपोरेट की कितनी चल रही है इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। केंद्र सरकार ने चार-पांच महीने पहले किसी परीक्षा से चुने गए लोगों को नहीं बल्कि अनुभव औऱ विशेषज्ञता के आधार पर कुछ सचिव और उप सचिव स्तर के अधिकारियों को नियुक्त किया। इसका मतलब यह हुआ कि जो नौकरशाही संघ लोकसेवा आयोग से आती है वो अब कारगर नहीं रही। कारपोरेट से आए विशेषज्ञ अब सरकारी नीतियों को तय करेंगे। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि जो लोग कारपोरेट सेक्टर से आएं हैं उनकी निष्ठा जनता के प्रति नहीं बल्कि कारपोरेट के प्रति होगा। वहीं परंपरागत तरीके से आने वाली नौकरशाही को ट्रेनिंग के दौरान जनता की समस्याओं और जरूरतों को समझने का मौका मिलता है। और वे जनता और संविधान के प्रति उत्तरदायी होते हैं। धीरे-धीरे कारपोरेट सेक्टर अपना पंजा बढ़ाता जा रहा है। लेकिन इसका संपूर्ण श्रेय मोदी को नहीं जाता है।

आज की राजनीति में विपक्ष का कितना रोल बचा है ?
रामशरण जोशी:
यह सच है कि इस समय विपक्ष काफी लुंज-पुंज और बिखरा हुआ है। लेकिन जब तक लोकतंत्र जीवित रहेगा विपक्ष की भूमिका बनी रहेगी। लेकिन यहां मैं ये बताना चाहूंगा कि इस समय विपक्षी दलों का इंजन कांग्रेस है। लोकसभा में 52 सीटे उसके पास है, राज्य सभा में भी उसके सदस्य हैं, तीन-चार राज्यों में कांग्रेस की सरकार हैं। अब सवाल यह है कि कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभा सकेगी या नहीं। आप देख ही रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कई राज्यों में कांग्रेस के विधायक सत्ताधारी दल में शामिल हो गए। पिछले एक महीने में आप ये तय नहीं कर पाए कि राहुल की जगह कौन लेगा। इससे एक तरह का असमंजस और अनिर्णय की स्थिति बन गई है। मैं हमेशा से इस पक्ष का रहा हूं कि कांग्रेस को वंशवाद से मुक्त होना चाहिए। आज के दौर में कांग्रेस का चरम यूपीए-1 और यूपीए-2 को कहा जा सकता है। लेकिन इस दौर में कांग्रेस अपने 1952 से 1984 की तरह पूर्णँ बहुमत में नहीं थी। कांग्रेस एक गठबंधन की सरकार चला रही थी। इस दौर में कांग्रेस के नेता डॉ. मनमोहन सिंह थे, जो गांधी-नेहरू परिवार के नहीं थे।

क्या समय के साथ कांग्रेस की नीतियां और सिद्धांत पुराने पड़ गए हैं ?
रामशरण जोशी
: यदि कांग्रेस को फिर से केंद्र सरकार में आना है तो उसे अपनी नीतियों और सिद्धांतों की समीक्षा करनी होगी। आज यह साफ दिखता है कि धर्मनिरपेक्षता का प्रोजेक्ट एक्सपायर हो गया है। कभी कांग्रेस उसकी चैंपियन थी। धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान का बुनियादी संकल्प है। इस तरह इस पर नए सिरे से विचार करना होगा। लेकिन कांग्रेस यदि इस पर भी दृढ़ता से टिकी रहती तो उसे ज्यादा सीटें मिलतीं। लेकिन कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता को किनारे कर नरम हिंदुत्व के रास्ते पर चल पड़ी। अब सवाल यह है कि आप ऐसे मुद्दे को अपना रहे हैं जिसके आप उस्ताद नहीं हैं। हिंदुत्व तो संघ-भाजपा का एजेंडा है। ऐसे में कांग्रेस भाजपा के गोल में जाकर उससे लड़ रही है। कोई ये कैसे मानेगा कि सदियों तक धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाली कांग्रेस आज हिंदुत्व की पैरोकार हो गई है। यह तो उसी तरह हुआ जैसे लालकृष्ण आडवाणी ने एक समय अपने को सेकुलर घोषित कर दिया। जिन्ना की मजार पर जाकर उन्होंने जिन्ना को भी सेकुलर बताया। इससे भाजपा के बाहर तो कोई उन्हें सेकुलर नहीं माना, उल्टे पार्टी के अंदर भी उनकी अपनी छवि ध्वस्त हो गयी। अब अगर कल को भाजपा कहे कि वो धर्मनिरपेक्ष दल है को क्या लोग मान लेंगे? ऐसे में कांग्रेस को समय के साथ अपनी नीतियों परिवर्तन करने की जरूरत तो है, लेकिन ऐसा न हो कि वह भाजपा की बी टीम बन जाए। 2014 और 2019 के चुनाव में यह साफ हो चुका है कि कांग्रेस को नई-नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में कांग्रेस को नीति, संगठन से लेकर नेतृत्व तक पर विचार करना होगा।

भाजपा और मोदी ने कांग्रेस के साथ ही जवाहर लाल नेहरू और नेहरू-गांधी परिवार पर सबसे ज्यादा हमले किए। इसका क्या कारण है ?
रामशरण जोशी:
कांग्रेस औऱ नेहरू परिवार में एक ऐतिहासिक संबंध रहा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपने परिवार के साथ ही देश के लिए कुछ बुनियादी वसूल विकसित किए – धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, वैज्ञानिक चिंतन, उदारवाद आदि को वो किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र के लिए जरूरी तत्व मानते थे। नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक के शासनकाल में नेशन-स्टेट का चरित्र वेलफेयर वाला रहा है। ये सब किसी भी सूरत में लोकतंत्र को जिंदा रखना चाहते थे। यह अलग बात है कि 1975 में इमरजेंसी लागू किया गया था। मनमोहन सिंह ने भी अपने शासनकाल में आर्थिक उदारीकरण के साथ ही सोशल वेलफेयर को भी जारी रखा। संघ-परिवार औऱ भाजपा ने सबसे ज्यादा नेहरू परिवार की छवि को खंडित किया। क्योंकि वो जानते हैं कि नेहरू परिवार भारत की परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। बिना इसको खंडित किए अपने वजूद को जिंदा नहीं रखा जा सकता है। संघ-भाजपा के लोग भारत के उदारवादी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं। इसमें सबसे बड़ा रोड़ा पं. नेहरू के विचार और गांधी परिवार है। ऐसे में सोनिया गांधी और कांग्रेस को नई रणनीति अपनानी पड़ेगी। क्योंकि देश में हिंदुत्व जड़ पकड़ चुका है। दिल्ली से लेकर प्रदेशों में ध्रुवीकरण हो चुका है। ऐसे में कांग्रेस के पास इसका क्या तोड़ है, इसे बताना पड़ेगा।

कांग्रेस के लिए इस समय बहुत ही विषम परिस्थिति है। राहुल गांधी क्या कांग्रेस को पुनर्जीवन दे सकते हैं ?
रामशरण जोशी:
कांग्रेस को फिर से राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए नेतृत्व को कड़ी मेहनत करनी होगी। मैं सोचता हूं कि राहुल गांधी को कुछ परंपरागत तरीके मसलन सत्याग्रह और पदयात्रा करना होगा।राहुल गांधी को पूर्व के अरूणाचल प्रदेश के ईटानगर से पदयात्रा शुरू कर पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ ही बंगाल, बिहार,यूपी होते हुए दिल्ली आकर समाप्त होनी चाहिए। इस पदयात्रा में उस क्षेत्र की समस्या को समझने के साथ ही उसके निदान के उपाय सोचने होंगे। पदयात्रा के पहले कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ताओं को भी क्षेत्र में सक्रिय किया जाए। इसके साथ ही प्रियंका गांधी को दक्षिण भारत से तो कांग्रेस के अन्य नेताओं को देश के अलग-अलग भागों से पदयात्राओं पर निकलना चाहिए। मेरा स्पष्ट मानना है इससे भारत की विभिन्नता, बहुलता, जनता की समस्या, क्षेत्रीय आकांक्षा, महत्वाकांक्षा को समझने में मदद मिलेगी। यात्रा में जनता से संवाद होगा। देश-समाज में उभरी नई प्रवृत्तियों और समस्याओं को समझने में मदद मिलेगी। यात्रा से पहले रास्ते और वहां की समस्याओं का खाका तैयार करवाएं। ये बात तो सही है कि सिर्फ भाजपा और मोदी की आलोचना करने से काम नहीं चलेगा। हिंदुत्व को बेअसर करना चाहते हैं तो जनता से संवाद करना होगा। गांधीजी जब 1915 में भारत वापस आए और राजनीति में सक्रिय होना चाहते थे तो उन्हें पूरे देश में घूमने को कहा गया। गांधी ने इस सलाह को मानते हुए पूरे देश की यात्रा पर निकल पड़े। इससे उन्हें देश और तत्कालीन भारतीय समाज को समझने में मदद मिली। आज कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती जनता से जुड़ने का है। आने वाले दिनों में बिहार, दिल्ली और हरियाणा आदि में विधानसभा का चुनाव होना है। 2024 में लोकसभा चुनाव होने के पहले कांग्रेस को अपने संगठन को मजबूत बनाना होगा। पदयात्रा से यह संभव है।

कांग्रेस के साथ ही देश के सामने भी विषम चुनौतियां हैं, सामाजिक सद्भाव नष्ट होता जा रहा है, सांप्रदायिकता की राजनीति चरम पर है। ऐस में राजनीतिक दलों के साथ जनता को क्या करना चाहिए ?
रामशरण जोशी:
आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती देश और संविधान बचाने की है। राजनीतिक दलों को संविधान रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए। विपक्ष को अपने अहम को छोड़कर संयुक्त मंच पर आने की जरूरत है। कम्युनिस्ट पार्टियों को छोटे-छोटे सैद्धांतिक विरोधों के दरकिनार कर देश और संविधान के हित में विपक्ष के साथ आना चाहिए। इसके साथ ही नागरिकों को भी नागरिक धर्म का पालन करते हुए देश के प्रति सचेत रहने की जरूरत है। संविधान के अनुसार काम करना ही नागरिक धर्म हैय़ प्रगतिशील, संविधानप्रेमी और देशप्रेमियों को अपने झगड़े को छोड़ कर देश में बढ़ रहे सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ काम करना होगा। सिविल सोसायटी को मानवाधिकार के साथ ही आम नागरिकों, गरीबों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के संवैधानिक हित के प्रति सचेत रहने की जरूरत है। सिविल सोसायटी को समाज में नागरिकबोध पैदा करने का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए। आज देश में नागरिक धर्म नहीं वरन हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई धर्म का बोध हावी हो गया है। आज हमारा एजेंडा नागरिक धर्म को उभारने का होना चाहिए। जो नागरिक धर्म का पालन करेगा वो देशभक्त होगा। इससे किसी भी धर्म के कट्टरपंथी तत्वों को काबू करने में मदद मिल सकती है।

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