85वां शहीद दिवस: क्रांतिकारी आकाशगंगा के “प्रकाश पुंज” शहीद उधम सिंह

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को जिस ढंग से प्रस्तुत किया गया है, उससे तीन बातें स्पष्ट होती हैं। प्रथम, यह धारणा कि भारत को स्वतंत्रता केवल अहिंसावादी साधनों के द्वारा प्राप्त हुई और इसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया, आंशिक रूप से सही है। राष्ट्रीय आंदोलन में क्रांतिकारी विचारधारा, क्रांतिकारी व्यक्तियों, साम्यवादियों, समाजवादियों, क्रांतिकारी संस्थाओं और असंख्य क्रांतिकारियों के योगदान पर सही ढंग से प्रकाश नहीं डाला गया। वास्तव में, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारियों द्वारा जीवन देकर दी गई आहुति अपने आप में एक अनोखा, अद्भुत और शानदार उदाहरण है, जो विश्व के विभिन्न देशों के इतिहास में दुर्लभ है।

भारतीय क्रांतिकारियों की विचारधारा, साधनों और कार्यप्रणाली पर विश्व के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों-गैरीबाल्डी, कावूर, मेजिनी, कार्ल मार्क्स, लेनिन और अन्य सिद्धांतकारों-का गहरा प्रभाव पड़ा। रूस की साम्यवादी क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के परवानों के लिए एक पथ-प्रदर्शक के रूप में थी।

भारतीय क्रांतिकारी संघर्ष के मुख्य नायक और नायिकाएँ

भारतीय क्रांतिकारी संघर्ष के इतिहास (1857 से 1947 तक) में असंख्य ज्ञात और अज्ञात क्रांतिकारियों ने भाग लिया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में खुदीराम बोस (बंगाल के प्रथम युवा शहीद), श्यामजी कृष्ण वर्मा, चापेकर बंधु, अरविंद घोष, बिपिन चंद्र पाल, सुभाष चंद्र बोस, राजा महेंद्र प्रताप, लाला हरदयाल, लाला लाजपत राय, चंद्रशेखर आजाद, करतार सिंह सराभा, मदनलाल ढींगरा, अशफाक उल्ला खान, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और अनेक क्रांतिकारी महिलाओं-रानी लक्ष्मीबाई, अजीजन बाई, बेगम हजरत महल, बीना दास, प्रीतिलता वादेदार (बंगाल की प्रथम महिला शहीद), आबादी बानो बेगम (बी अम्मा), सुनीति चौधरी, भीकाजी कामा, कल्पना दत्ता आदि का योगदान उल्लेखनीय है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बलिदान देने वाले शहीदों के जन्मदिवस या शहीदी दिवस पर यह चिंतन करना आवश्यक है कि इन महान बलिदानियों ने अपने जीवन में क्या-क्या कार्य किए और क्यों किए? उनकी विचारधारा क्या थी? वे अपनी विचारधारा को व्यावहारिक रूप देने में कहाँ तक सफल रहे? क्या वर्तमान सरकारें उनके चिंतन पर खरी उतरती हैं या केवल उनकी मूर्तियों और प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करके इतिश्री कर लेती हैं? इस लेख में क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम उधम सिंह के संघर्षपूर्ण जीवन और उनकी विचारधारा की वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता का वर्णन करने से पूर्व उनसे संबंधित विवादों का पर्दाफाश करना भी आवश्यक है।

उधम सिंह से संबंधित विवाद

1. जाति संबंधी विवाद

कुछ विद्वानों, जैसे शम्सुल इस्लाम, ने उधम सिंह को दलित सिख परिवार से जोड़ा। उनके लेख ‘सांझी शहादत, सांझी विरासत की बंद पड़ी गौरव यात्रा’ (समयांतर, वर्ष 50, अंक 9, जून 2019, पृष्ठ 29) में लिखा गया कि उधम सिंह का जन्म दलित परिवार में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय और सामाजिक अध्ययन फाउंडेशन द्वारा 8 अगस्त 2022 को आयोजित सेमिनार में भी उन्हें दलित जाति से जोड़ा गया।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने उधम सिंह नगर जिले का नामकरण चमार जाति से जोड़कर किया। इसके अतिरिक्त, सैनी, कुर्मी और कोली समुदायों ने भी उधम सिंह को अपनी जाति से जोड़ने का प्रयास किया।

हमारा मानना है कि शहीदों की कुर्बानी को जाति, धर्म या क्षेत्र के दायरे में बाँधना उचित नहीं, क्योंकि यह पूरे राष्ट्र और मानवता के लिए होती है। फिर भी, ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। साक्ष्यों के अनुसार, उधम सिंह कंबोज जाति से थे, और उनकी कुर्बानी भारत की स्वतंत्रता और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए थी।

2. जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला: भ्रामक धारणा

यह आम धारणा कि उधम सिंह ने कर्नल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर (9 अक्टूबर 1864 – 23 जुलाई 1927), जिन्हें ‘अमृतसर का कसाई’ कहा जाता है, को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) का बदला लिया, भ्रामक है। यह धारणा फिल्म रंग दे बसंती में भी प्रचारित हुई। ऐतिहासिक तथ्य यह है कि डायर की मृत्यु 23 जुलाई 1927 को हो चुकी थी। वास्तव में, उधम सिंह ने सर माइकल फ्रांसिस ओ’डायर (28 अप्रैल 1864 – 13 मार्च 1940), तत्कालीन पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर और जलियांवाला बाग नरसंहार के प्रमुख योजनाकार, को 1940 में मारकर बदला लिया।

3. जलियांवाला बाग हत्याकांड के दिन उधम सिंह की उपस्थिति

पंजाब शिक्षा विभाग की पाठ्यपुस्तक पंजाबी पाठ (PSEB, चौथी कक्षा) में दावा किया गया कि 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय उधम सिंह वहाँ उपस्थित नहीं थे और लंदन में थे। यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है। सरकारी रिकॉर्ड, विद्वानों के लेख, इतिहासकारों के शोध और उधम सिंह के मुकदमे की पैरवी करने वाले वकील वी.के. कृष्ण मेनन के बयानों से पुष्टि होती है कि उधम सिंह उस दिन जलियांवाला बाग में मौजूद थे। वे और उनके अनाथालय के साथी वहाँ लोगों को पानी पिला रहे थे। अर्थात्, उधम सिंह हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शी थे।

4. उधम सिंह की मूर्तियों और चित्रों से संबंधित विवाद

उधम सिंह की मूर्तियों और चित्रों के संबंध में समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं। इसका प्रमुख उदाहरण उनके पैतृक गाँव सुनाम (पंजाब) में स्थापित मूर्तियाँ हैं। विनय लाल के अनुसार, सुनाम में एक ही वर्ष में उनकी दो मूर्तियाँ स्थापित की गईं, जो एक-दूसरे के निकट हैं। एक मूर्ति में उन्हें खालसा सिख के रूप में दर्शाया गया है, जिसमें उनके बाल कटे हुए हैं और दाढ़ी है, जबकि दूसरी मूर्ति में उन्हें एक साफ-सुथरे हिंदू व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। हालाँकि, ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, माइकल ओ’डायर की हत्या के समय उधम सिंह ने सिर पर हैट पहनी थी, जो इन चित्रणों से भिन्न है।

5. रोगी, हत्यारा, कम पढ़ा-लिखा और निम्न जाति से संबंधित अनुचित अवधारणाएँ

अनीता आनंद की पुस्तक द पेशेंट असैसिन: ए ट्रू टेल ऑफ मसैकर, रिवेंज, एंड इंडियाज़ क्वेस्ट फॉर इंडिपेंडेंस (अप्रैल 2019) में उधम सिंह को ‘रोगी हत्यारा’, ‘कम पढ़ा-लिखा’, और ‘निम्न जाति’ से संबंधित बताया गया है। लेखिका के अनुसार, ब्रिटेन में उधम सिंह को अत्यधिक घृणित व्यक्ति माना जाता था, जबकि भारत में उन्हें नायक के रूप में सम्मान प्राप्त था। अनीता आनंद ने क्राइमरीड्स की प्रबंध संपादक मौली ओडिंट्ज़ को दिए एक ऑनलाइन साक्षात्कार में कहा:

“उस क्षण (13 मार्च 1940) तक, उधम सिंह कोई नहीं थे, कुछ भी नहीं थे-एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास कोई शक्ति नहीं थी। वह न केवल एक गरीब, ‘निम्न जाति और कम शिक्षित’ अनाथ था, बल्कि वह उस देश का ‘मूल निवासी’ भी था, जहाँ भारतीयों के पास बहुत कम शक्ति थी और निचली जातियों के पास कुछ भी नहीं था। अपने पूरे युवावस्था में अदृश्य, नगण्य और शक्तिहीन रहे उधम सिंह का बदला लेने का संकल्प ही उन्हें नायक बनाता है, कम से कम उनके अपने मन में। यह विचार उनके लिए मादक था और उनका जुनून बन गया, जिसने उन्हें दो दशकों से अधिक समय तक प्रेरित किया।”

उपरोक्त अवधारणाएँ गलत, अनैतिहासिक, अनुचित, भ्रामक और तथ्यहीन हैं। उधम सिंह का जन्म कंबोज जाति में हुआ, जो एक ऐतिहासिक तथ्य है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने रेजिनाल्ड डायर को नहीं, बल्कि पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर की हत्या की थी। उधम सिंह जलियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे और उस समय विदेश में नहीं थे। अनीता आनंद का यह दावा कि उधम सिंह रोगी, हत्यारा, कम शिक्षित और निम्न जाति से थे, भी अस्वीकार्य है। सन् 1918 में मैट्रिक पास करना उस समय कम शिक्षा नहीं मानी जाती थी। साथ ही, एक रोगी व्यक्ति इतना धैर्यवान और गंभीर नहीं हो सकता, जितना उधम सिंह थे। अनीता आनंद की इस पुस्तक को सन् 2020 में हेसल-टिल्टमैन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

वास्तव में, उधम सिंह एक धैर्यवान, शूरवीर, साहसी, राष्ट्रवादी, महान देशभक्त, समाजवादी क्रांतिकारी और यथार्थवादी व्यक्ति थे, जो देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार थे। अपने मिशन को पूरा करने के लिए उन्होंने यूरोप, पूर्वी यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका जैसे चार महाद्वीपों की यात्रा की। उन्होंने जर्मनी के राष्ट्रवादियों, रूस के साम्यवादियों, और अफ्रीका, अमेरिका व इंग्लैंड में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोधियों से संपर्क स्थापित किया। यह किसी रोगी व्यक्ति का कार्य नहीं हो सकता, बल्कि यह एक मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ व सुदृढ़ व्यक्ति का कार्य है। यही कारण है कि उन्होंने अपने मिशन को पूरा करने के लिए 21 वर्ष तक प्रतीक्षा की।

पंजाब की माटी में जन्मे क्रांतिकारी शिरोमणि शहीद उधम सिंह का नाम हमेशा युवाओं में राष्ट्रभक्ति का संचार करता रहेगा। उन्होंने जलियाँवाला बाग नरसंहार को अपनी आँखों से देखा था और पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर से खून का बदला खून से लेने की कसम खाई थी, यद्यपि उनकी कोई व्यक्तिगत शत्रुता माइकल ओ’डायर से नहीं थी।

आपने शहीद उधम सिंह के जीवन और जलियांवाला बाग नरसंहार की पृष्ठभूमि से संबंधित एक विस्तृत पाठ प्रदान किया है। मैंने आपके पाठ की वर्तनी, व्याकरण, और शैलीगत त्रुटियों को सुधारने के लिए इसे ध्यानपूर्वक देखा। नीचे सुधारा गया पाठ प्रस्तुत है, जिसमें वर्तनी, विराम चिह्न, और भाषा की प्रवाहमयता को ठीक किया गया है। मैंने मूल अर्थ और भाव को बनाए रखते हुए केवल आवश्यक सुधार किए हैं।

मुसीबतों का पहाड़ और टूटा बचपन

अमर शहीद उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को तत्कालीन पटियाला स्टेट (वर्तमान पंजाब) के लाहौर से 130 मील दूर दक्षिण में सुनाम के पिलबाद इलाके में कंबोज जाति के जम्मू गोत्र में हुआ।

उधम सिंह के पिता का नाम सरदार टहल सिंह कंबोज और माता का नाम श्रीमती नारायण कौर था। उनके माता-पिता ने उनका नाम शेर सिंह रखा। उस समय किसी को यह आभास नहीं था कि भविष्य में यही बालक शेर सिंह विश्व प्रसिद्ध क्रांतिकारियों की आकाशगंगा में ध्रुव तारे की तरह प्रकाशमान होगा और क्रांतिकारियों की श्रेणी में अग्रणी स्थान प्राप्त कर भारतीय क्रांतिकारी इतिहास का एक स्वर्णिम और गौरवपूर्ण पृष्ठ बनेगा। इतना ही नहीं, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श, प्रेरक और क्रांतिकारी राजकुमार के रूप में स्थापित होगा।

इस परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ तब टूटा, जब बचपन में उनकी माता का सन् 1901 में और पिता का सन् 1907 में देहांत हो गया। उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। किशन सिंह रागी ने दोनों भाइयों, शेर सिंह और साधु सिंह, को सेंट्रल खालसा अनाथालय, पुतलीघर, अमृतसर में भर्ती कराया। अनाथालय के आधिकारिक रजिस्टर के अनुसार, 28 अक्टूबर 1907 को सिख धर्म के नियमानुसार दोनों भाइयों का नामकरण संस्कार (दीक्षा) हुआ। पुनर्बपतिस्मा (दीक्षा) के बाद शेर सिंह का नाम उधम सिंह और साधु सिंह का नाम मुक्ता सिंह रखा गया।

सैनिक के रूप में:

उस समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, और ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार को सैनिकों की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप, सन् 1918 में कम उम्र होने के बावजूद, उधम सिंह को उनके अनुरोध पर सेना में भर्ती कर लिया गया। उन्होंने 32 सिख पायनियर्स के एक सैनिक के रूप में समुद्र तट से बसरा क्षेत्र तक रेलवे की बहाली के लिए काम शुरू किया। लेकिन कम उम्र और उच्च अधिकारियों के साथ मतभेद के कारण उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी और वापस भारत (पंजाब) लौटना पड़ा। छह महीने के भीतर, वह फिर से सेना में भर्ती हो गए और उन्हें बढ़ईगीरी, मशीनरी, और वाहनों के रखरखाव व मरम्मत के लिए बसरा और बगदाद भेजा गया। लेकिन फिर से विवाद के कारण, वह सन् 1919 की शुरुआत में अमृतसर के अनाथालय में वापस आ गए। इस अनुभव ने उन्हें और अधिक निराशा में डाल दिया।

प्रथम विश्व युद्ध (सन् 1914–1918): असंतोष और रोष की चरम सीमा

हमारे सुधी पाठकों के लिए जलियांवाला बाग नरसंहार की पृष्ठभूमि समझना अति आवश्यक है। प्रथम विश्व युद्ध (सन् 1914–1918) के समय अंग्रेजी सरकार का कहना था कि युद्ध स्वतंत्रता के लिए लड़ा जा रहा है। इस युद्ध में भारतीयों ने अंग्रेजी सरकार की अभूतपूर्व सहायता की। सन् 1914-1916 तक 1,92,000 भारतीय सैनिकों में पंजाब के सैनिकों की संख्या 1,10,000 थी। जनता ने न केवल सैनिक दिए, बल्कि 2 करोड़ रुपये युद्ध चंदे के रूप में और 10 करोड़ रुपये ब्याज के रूप में भी दिए। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने भारतीय जनता से स्वैच्छिक और बलपूर्वक चंदा लिया। युद्ध में 43,000 सैनिकों की मृत्यु के कारण सैनिक परिवारों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। युद्ध के दौरान जनता से बलपूर्वक युद्ध चंदा इकट्ठा करना, अभूतपूर्व महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, जनता पर कर्ज, महामारी, असंतुलित मानसून, किसानों की दुर्दशा, आर्थिक मंदी, गदर पार्टी के क्रांतिकारी आंदोलन का पंजाबी युवाओं पर निरंतर बढ़ता प्रभाव, और तुर्की में पैन-इस्लामिक मूवमेंट के कारण भारतीय जनता में असंतोष और रोष की भावना चरम सीमा पर थी।

अराजक एवं क्रांतिकारी अपराध अधिनियम 1919 (रौलट एक्ट):

पंजाब सरकार ने असंतोष को दबाने के लिए अराजक एवं क्रांतिकारी अपराध अधिनियम 1919 (रौलट एक्ट) लागू किया। रौलट एक्ट 1919 के अंतर्गत सरकार को प्रेस पर नियंत्रण, स्वतंत्रता आंदोलन पर रोक, नेताओं को बिना मुकदमा चलाए जेल में डालने, बिना वारंट गिरफ्तारी, और विशेष न्यायाधिकरणों तथा बंद कमरों में बिना किसी जवाबदेही के अभियोग चलाने जैसे अधिकार प्राप्त थे। भारतीयों ने रौलट एक्ट को ‘काला कानून’ कहकर इसकी कड़ी आलोचना की। इसके विरुद्ध ‘नो अपील, नो दलील, नो वकील’ का नारा पूरे हिंदुस्तान में गूंज उठा। इस काले कानून का पंजाब में सर्वाधिक विरोध हुआ।

13 अप्रैल 1919: पंजाब में बैसाखी का त्योहार जलियांवाला बाग नरसंहार में बदल गया

13 अप्रैल को पंजाब और विदेशों में पंजाबियों द्वारा बैसाखी का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार फसल कटाई के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है और सिखों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर भी है, क्योंकि इसी दिन 13 अप्रैल, 1699 को गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की थी। यह सिख नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक भी है। इस त्योहार में सिखों के अतिरिक्त हिंदू, मुस्लिम, और ईसाई धर्मों के अनुयायी भी शामिल होकर उत्सव मनाते हैं।

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी की सुबह ब्रिगेडियर जनरल आर.ई.एच. डायर ने अमृतसर शहर में नए नियम लागू किए। इन नियमों के अंतर्गत लोगों को बिना परमिट के शहर छोड़ने, किसी भी तरह के जलूसों, और चार से अधिक लोगों की सभा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। सबसे खतरनाक नियम यह था कि “रात 8 बजे के बाद सड़कों पर पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को गोली मार दी जाएगी।” नगर प्रचारकों द्वारा सैन्य ड्रमों की धुन के साथ शहर में मुनादी की गई, लेकिन गर्मी और शोर-शराबे के कारण भीड़-भाड़ वाले प्रमुख स्थानों पर इसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हो सका।

ब्रिगेडियर जनरल आर.ई.एच. डायर को उसी दिन दोपहर 12:40 बजे सूचना मिली कि जलियांवाला बाग में एक राजनीतिक सभा आयोजित हो रही है। इस शांतिपूर्ण सभा को दबाने और भारतीयों को सबक सिखाने की सुनियोजित योजना के तहत डायर, 2-9वीं गोरखा, 54वीं सिख, और 59वीं सिंध राइफल्स के 90 सैनिकों (सिख, गोरखा, बलूच, और राजपूत) के साथ शाम 5:15 बजे सभा स्थल पर पहुँचे। उस समय वहाँ लगभग 20,000 लोग, जिनमें हिंदू, सिख, मुस्लिम, और ईसाई, सभी आयु वर्ग के पुरुष, महिलाएँ, और बच्चे शामिल थे, शांतिपूर्वक एकत्रित थे। डायर ने बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने का आदेश दिया। सैनिकों ने लगभग 1650 गोलियाँ चलाईं, और गोलीबारी तब तक जारी रही जब तक गोलियाँ समाप्त नहीं हो गईं। अमृतसर के सिविल सर्जन डॉ. स्मिथ के अनुसार, इस हत्याकांड में लगभग 1800 लोग मारे गए, जिनमें 41 बच्चे और एक 6 सप्ताह का शिशु भी शामिल था। लगभग 1200 लोग घायल हुए।

ब्रिटिश सरकार ने 581 व्यक्तियों पर मुकदमे चलाए, जिनमें से 108 को मृत्युदंड, 265 को आजीवन कारावास, 85 को सात वर्ष की कैद, और शेष को अपमानित किया गया। जलियांवाला बाग नरसंहार 1857 की जनक्रांति के बाद 20वीं सदी की सबसे रक्तरंजित, बर्बर, और अमानवीय घटना थी। दीनबंधु एफ. एंड्रयूज ने इसे “जानबूझकर की गई क्रूर हत्या” कहकर आलोचना की। थॉमसन और गैरट के अनुसार, “अमृतसर की यह घटना भारत-ब्रिटिश संबंधों में युगांतरकारी थी, जैसा कि 1857 का विद्रोह था।”

जलियांवाला बाग नरसंहार का ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में आलोचना

जलियांवाला बाग नरसंहार पर ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में व्यापक चर्चा और आलोचना हुई। तत्कालीन युद्ध सचिव विंस्टन चर्चिल ने इसे “अत्यंत भयानक” कहकर निंदा की। हाउस ऑफ कॉमन्स में हुए मतदान में 247 सांसदों ने डायर के खिलाफ वोट दिया, जबकि केवल 37 ने उनका समर्थन किया। यह मतदान और बहस ब्रिटिश जनता के गुस्से और असंतोष का प्रतीक थी। भारत में इस सुनियोजित नरसंहार ने जनता का आक्रोश सातवें आसमान पर पहुँचा दिया, जिसके परिणामस्वरूप असहयोग आंदोलन को बल मिला और जन आंदोलनों, किसान आंदोलनों, मजदूर संघर्षों, और राष्ट्रीय आंदोलन में एक नया मोड़ आया। दूसरे शब्दों में, जलियांवाला बाग नरसंहार एक युगांतरकारी घटना थी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पतन की नींव रखी।

उधम सिंह ने इस हत्याकांड को स्वयं देखा था और “खून का बदला खून” से लेने की सौगंध ली थी। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को समूल नष्ट करने की कसम खाई। इस नरसंहार ने उनके जीवन पर गहरी छाप छोड़ी, और उन्होंने पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर को मारने का संकल्प लिया।

राष्ट्रीय नेताओं और क्रांतिकारियों का प्रभाव

उधम सिंह के जीवन दर्शन और चिंतन पर अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन (दिसंबर 1919) में स्वामी श्रद्धानंद सहित प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के भाषणों, प्रसिद्ध क्रांतिकारियों, और गदर पार्टी के नेताओं जैसे लाला हरदयाल, प्रोफेसर मोता सिंह, सरदार बसंत सिंह, बाबा सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा, भगत सिंह के चाचाओं सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह, सत्यपाल, डॉ. सैफुद्दीन किचलू, और लाला लाजपत राय के व्यक्तित्व और विचारों का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा।

बब्बर अकाली लहर – ‘बाबाओं’ का प्रभाव

उधम सिंह के चिंतन पर बब्बर अकाली लहर का भी प्रभाव था, क्योंकि उन्होंने ‘बाबाओं’ के साथ काम किया था। 1924 में अमेरिका प्रवास के दौरान उन्होंने गदर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से न केवल मुलाकात की, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली से भी प्रभावित हुए। गदर पार्टी का उद्देश्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने के लिए प्रवासी भारतीयों को संगठित करना था।

मार्क्सवाद, लेनिनवाद, और बोल्शेविकवाद का प्रभाव

उधम सिंह के चिंतन पर मार्क्सवाद, लेनिनवाद, और बोल्शेविकवाद का भी प्रभाव था। जुलाई 1927 में अमृतसर के रामबाग में उन्हें आर्म्स एक्ट की धारा 20 के तहत गिरफ्तार किया गया। उनके पास गदर पार्टी का प्रतिबंधित समाचार पत्र “गदर-ए-गूंज” भी मिला, जिसे जब्त कर लिया गया। यही कारण है कि उन्हें “सिख पंजाबी मार्क्सवादी” कहा गया। उनकी प्रेरणा का स्रोत रूस के बोल्शेविक भी थे। वे बाबा ज्वाला सिंह की पुस्तक “गदर” से भी अत्यधिक प्रभावित थे।

क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए गिरफ्तारी और 5 साल की सजा

अमेरिका प्रवास के दौरान उधम सिंह का भगत सिंह के साथ पत्र-व्यवहार था। भगत सिंह के बुलावे पर ही वे 1927 में भारत लौटे। उन्हें 25 साथियों, रिवॉल्वर, गोला-बारूद, और गदर पार्टी के समाचार पत्र “गदर-ए-गूंज” की कुछ प्रतियों के साथ गिरफ्तार किया गया। परिणामस्वरूप, उन पर मुकदमा चला और 5 साल की सजा सुनाई गई। 23 मार्च 1931 को जब सुखदेव, भगत सिंह, और राजगुरु को फाँसी दी गई, उस समय उधम सिंह जेल में सजा काट रहे थे। 1931 में जेल से रिहा होने के बाद, उन्होंने गुप्तचर विभाग और पंजाब पुलिस को चकमा देते हुए कश्मीर के रास्ते जर्मनी पहुँच गए और 1934 में लंदन पहुँचने में सफल हुए।

विदेशी यात्राओं व प्रवास का प्रभाव

उधम सिंह ने अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न छद्म नामों से चार महाद्वीपों-यूरोप, पूर्वी यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका-के देशों की यात्राएँ कीं। इन देशों में अफ्रीका (1920), नैरोबी (1921), अमेरिका (1924), जर्मनी, जिम्बाब्वे, ब्राजील, मिस्र, इथियोपिया, रूस और अंततः इंग्लैंड (1934) प्रमुख हैं। सन् 1920 में सिंह अफ्रीका पहुँचने में सफल हुए, जहाँ उस समय रंगभेद की नीति (गोरे-काले के बीच भेदभाव) व्यापक थी। इसका उनके विचारों पर गहरा प्रभाव पड़ा। दक्षिण अफ्रीका में तीन वर्ष के प्रवास के दौरान उन्होंने रेलवे वर्कशॉप में नौकरी की और एक कुशल वक्ता के रूप में उभरे, साथ ही अंग्रेजी भाषा में भी निपुणता हासिल की।

चार महाद्वीपों की यात्राओं और प्रवास के दौरान, उधम सिंह ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जर्मनी के राष्ट्रवादियों, रूस के साम्यवादियों, और अफ्रीका, अमेरिका व इंग्लैंड में ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधियों से संपर्क स्थापित किया। परिणामस्वरूप, उनके चिंतन और व्यक्तित्व में अभूतपूर्व परिपक्वता आई।

छद्म नाम: लंदन मेट्रोपॉलिटन पुलिस रिपोर्ट (फाइल)

क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करने के लिए क्रांतिकारियों को अनेक रूप और नाम धारण करने पड़ते थे ताकि उनकी पहचान गुप्त रहे। उधम सिंह ने भी अपनी पहचान छिपाने के लिए समय-समय पर नाम और वेशभूषा में परिवर्तन किए। परिणामस्वरूप, भगत सिंह की तरह उन्होंने सिख धर्म के प्रतीकों का परित्याग कर ‘क्लीन शेव्ड’ रूप अपनाया और टोपी, उच्च गुणवत्ता वाले सूट उनकी पोशाक का हिस्सा बने। लंदन मेट्रोपॉलिटन पुलिस फाइल (MEPO 3/1743) के अनुसार, उन्होंने अपने अपेक्षाकृत छोटे जीवन में विभिन्न चरणों में कई नाम अपनाए, जैसे-उदे, शेर सिंह, उदय फ्रैंक ब्राजील, उदे सिंह, उधम सिंह कम्बोज, मोहम्मद सिंह आजाद, और राम मोहम्मद सिंह आजाद। मेट्रोपॉलिटन पुलिस रिपोर्ट (फाइल MEPO 3/1743, दिनांक 16 मार्च 1940) के अनुसार, वे एक अत्यंत सक्रिय, खूब यात्रा करने वाले, राजनीति से प्रेरित, धर्मनिरपेक्ष सोच वाले युवक थे, जिनके जीवन में कुछ महान उद्देश्य थे और जो भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति तीव्र घृणा से प्रेरित थे।

राम मोहम्मद सिंह आजाद

‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ नाम वास्तव में सांप्रदायिक सद्भाव, धर्मनिरपेक्षता, सहनशीलता और गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक है। ‘राम’ हिंदू धर्म से, ‘मोहम्मद’ इस्लाम से, और ‘सिंह’ सिख धर्म से संबंधित हैं। इस नाम के माध्यम से उन्होंने पंजाबी संस्कृति को दर्शाते हुए राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता और विभिन्न धर्मों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। यह नाम धर्म, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता को अपनाने की प्रेरणा देता है। वर्तमान संदर्भ में, जहाँ धार्मिक कट्टरवाद के नारे गूंज रहे हैं, यह नाम अत्यंत प्रासंगिक है। समय की आवश्यकता है कि लोग संकीर्णताओं से मुक्त होकर समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान दें ताकि न्यूनतम सुविधाएँ-रोटी, कपड़ा, रोजगार, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य-सभी को उपलब्ध हों, भुखमरी से मुक्ति मिले, और भारत उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों के स्वप्न के अनुरूप एक समृद्ध राष्ट्र बने। यद्यपि उस समय भारत ब्रिटिश साम्राज्य में गुलाम था, परंतु उधम सिंह ने क्रांतिकारी परंपरा का अनुसरण करते हुए कभी स्वयं को पराधीन नहीं माना। यही कारण है कि उन्होंने अपने नाम के साथ ‘आजाद’ शब्द जोड़ा, जिसका अर्थ ‘स्वतंत्र’ है।

उधम सिंह का इंग्लैंड में प्रवास: निवास स्थान में बार-बार परिवर्तन

उधम सिंह ने लंदन में अपने निवास स्थान को बार-बार बदला, जिससे ब्रिटिश पुलिस और गुप्तचर विभाग असमंजस में रहे। सन् 1934 में ‘राम मोहम्मद सिंह’ के नाम से पासपोर्ट बनवाकर वे लंदन पहुँचे और 9 एडलर स्ट्रीट, कमर्शियल रोड पर एक घर किराए पर लिया। 12 मई 1936 को हॉलैंड, जर्मनी, पोलैंड, ऑस्ट्रिया, हंगरी और इटली के लिए पासपोर्ट हेतु आवेदन करते समय उन्होंने 4 ड्यूक स्ट्रीट, स्पाइटल फील्ड्स का पता दिया। 26 जून 1936 को लेनिनग्राद से लंदन लौटने पर उन्होंने वेस्ट एंड ऑफ लंदन को अपना पता बताया। लंदन में रहते हुए, वे फिल्म स्टूडियो में भीड़ के दृश्यों में काम करते रहे। निवास स्थान में लगातार बदलाव के कारण ब्रिटिश पुलिस और गुप्तचर विभाग उन्हें पकड़ नहीं सका।

राष्ट्रीय पंजीकरण के दौरान उन्हें सीरियल नंबर EACK/305/7 के तहत ‘आजाद सिंह’ के नाम से पंजीकृत किया गया, जिसमें उन्होंने अपना पता 581, बिम्बोर्न रोड, Bournemouth और व्यवसाय बढ़ई बताया। गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट (23 फरवरी 1938) के अनुसार, वे इंडियन स्टूडेंट्स हॉस्टल, गोवर स्ट्रीट, NW1 में भी रहे। गुप्तचर विभाग ने यह भी स्वीकार किया कि उधम सिंह ने 30, चर्च लेन, E1 को भी अपना पता बताया, परंतु वहाँ छापेमारी करने पर वह स्थान एक वेयरहाउस निकला। उधम सिंह को यह जानकारी थी कि ब्रिटिश गुप्तचर विभाग उनकी गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रख रहा था।

निवास स्थान में बार-बार परिवर्तन ने पुलिस और गुप्तचर विभाग को असमंजस में डाल दिया, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका। अगस्त 1938 में उन पर लंदन में एक मुकदमा भी चला, परंतु वे ट्रायल के बाद छूट गए। 1 सितंबर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, जिसके दौरान ब्रिटिश पुलिस और गुप्तचर विभाग युद्ध विरोधियों पर नजर रखने में व्यस्त हो गए। इससे उधम सिंह की निगरानी कम हुई, जो उनके उद्देश्यों की पूर्ति में लाभकारी सिद्ध हुई।

उधम सिंह और भगत सिंह में घनिष्ठ संबंध: भगत सिंह का प्रभाव

उधम सिंह और भगत सिंह के बीच मैत्रीपूर्ण और घनिष्ठ संबंध थे। उधम सिंह, भगत सिंह को अपना परम मित्र और गुरु मानते थे। दोनों के चिंतन और कार्यप्रणाली में निम्नलिखित समानताएँ थीं:

  1. प्रेरणा के स्रोत: दोनों के चिंतन पर जलियाँवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल 1919), ग़दर पार्टी, बब्बर अकाली लहर, ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नेताओं व आंदोलनों का प्रभाव था।
  2. सामाजिक-आर्थिक मुद्दे: दोनों महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, जनता पर कर्ज, और भारतीय व विदेशी पूँजीपतियों, साम्राज्यवादी सरकारों, नरेशों, नवाबों व राजाओं द्वारा जनसाधारण के शोषण से प्रभावित थे।
  3. समतावादी समाज: दोनों ने इन समस्याओं को समूल नष्ट करने और शोषण-मुक्त समतावादी समाज स्थापित करने का संकल्प लिया। वर्तमान संदर्भ में, उनका चिंतन उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण और कॉर्पोरेटीकरण के विरुद्ध था।
  4. धर्मनिरपेक्षता: दोनों धर्म, सांप्रदायिकता, पाखंड और अंधविश्वास के खिलाफ थे। भगत सिंह की तरह उधम सिंह भी राष्ट्र और सिद्धांतों के लिए जीवन बलिदान करने को तैयार थे, क्योंकि उन्हें मृत्यु का कोई भय नहीं था।
  5. प्रतिरोध के तरीके: यद्यपि दोनों गांधीवादी तरीकों के खिलाफ थे, फिर भी भगत सिंह ने लाहौर सेंट्रल जेल में 116 दिन की भूख हड़ताल की। उधम सिंह ने भी इंग्लैंड की जेल में यातनाओं के विरोध में 42 दिन की भूख हड़ताल की।
  6. नारे: दोनों के स्लोगन-‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’-प्रसिद्ध थे।

इन समानताओं से स्पष्ट है कि उधम सिंह के चिंतन पर भगत सिंह का गहरा प्रभाव था।

उधम सिंह: क्रांतिकारी संगठनों के सक्रिय सदस्य व संगठनकर्ता

उधम सिंह भारतीय मजदूर संघ, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (भारत), इलेक्ट्रीशियन यूनियन (इंग्लैंड), वर्कर्स एसोसिएशन (IWA), और ग़दर पार्टी (अमेरिका) जैसे क्रांतिकारी संगठनों के सक्रिय सदस्य थे। भारतीयों को क्रांतिकारी उद्देश्यों के लिए संगठित करने हेतु, उन्होंने लंदन में ‘आजाद पार्टी’ की स्थापना भी की।

उधम सिंह के चरित्र और मूल्यों को कई कारकों ने प्रभावित किया। बचपन में माता-पिता और भाई मुक्ता सिंह की मृत्यु (1917), अभावग्रस्त पालन-पोषण, अकेलापन, पारिवारिक गरीबी और अनाथालय का जीवन उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से साहसी और जुझारू बनाया। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा भारतीय संसाधनों का शोषण, भारतीयों पर अत्याचार, गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी ने उनके विचारों को आकार दिया। जलियाँवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल 1919) का उनके राजनीतिक दर्शन पर सबसे गहरा प्रभाव पड़ा। बब्बर अकाली लहर, मार्क्सवाद, लेनिनवाद, बोल्शेविज्म और विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों ने भी उनके विचारों को समृद्ध किया। चार महाद्वीपों के एक दर्जन से अधिक देशों की यात्राएँ और भगत सिंह के चरित्र, विचारों व निस्वार्थता ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया। भगत सिंह उनके सबसे अच्छे मित्र और गुरु थे।

उधम सिंह का व्यक्तिगत जीवन

यह धारणा रही है कि उधम सिंह अविवाहित थे, लेकिन सिकंदर सिंह के अनुसार, फरवरी 1922 में अमेरिका के कैलिफोर्निया के क्लेरमॉन्ट में उनकी मुलाकात एक मैक्सिकन महिला, लूपे हर्नांडेज़, से हुई, जो सुंदर और बड़ी आँखों वाली थी। 1923 में उधम सिंह ने लूपे हर्नांडेज़ से विवाह किया। 1924 के जॉनसन-रीड (आव्रजन) अधिनियम के कारण, भारतीय पुरुषों को अमेरिका में हिस्पैनिक पत्नियों से विवाह करना पड़ता था, अन्यथा उन्हें निष्कासित कर दिया जाता था। उधम सिंह ने स्वयं एक बयान में स्वीकार किया कि उनके दो बेटे थे, जो क्लेरमॉन्ट के सैक्रामेंटो स्कूल में पढ़ते थे। इन बच्चों को स्कूल में ‘भारत के पुत्र’ (India’s Sons) के नाम से जाना जाता था। 1935 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया, और उनके दोनों बेटों को लूपे के रिश्तेदारों ने एरिज़ोना ले जाकर पाला।

ब्रिटिश गुप्तचर रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 1936 में इंग्लैंड प्रवास के दौरान उधम सिंह ने एक श्वेत महिला से विवाह किया और वे दोनों लंदन के वेस्ट एंड में रहते थे। हालांकि, इस विवाह से उनकी कोई संतान होने की पुष्टि नहीं हुई।

सर माइकल ओ’ड्वायर की हत्या: 13 मार्च 1940

अनेक देशों की यात्रा करते हुए उधम सिंह 1934 में लंदन पहुँचने में सफल हुए। 1940 में, जलियाँवाला बाग हत्याकांड के 21 वर्ष बाद, उधम सिंह ने अपने मिशन को पूरा किया। लंदन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसाइटी द्वारा आयोजित एक सभा में, जिसमें अफगानिस्तान की स्थिति और मुस्लिम देशों पर चर्चा हो रही थी, उधम सिंह ने मौका पाया। सभा की अध्यक्षता भारतीय मामलों के सचिव लॉर्ड जेटलैंड कर रहे थे। सर माइकल ओ’ड्वायर (1913-1919 तक पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर) ने अपने भाषण में भारतीयों के लिए अपमानजनक शब्दों का उपयोग किया। उधम सिंह ने सभागार में तीन गज की दूरी से ओ’ड्वायर पर दो गोलियाँ दागीं, जिससे उनकी तत्काल मृत्यु हो गई। मंच पर मौजूद लुइस डेन, लॉरेंस, चार्ल्स सी. बैली, लॉर्ड जेटलैंड, और लॉर्ड लैमिंगटन को भी गोलियाँ लगीं, लेकिन वे बच गए। लॉर्ड लैमिंगटन का बायाँ हाथ घायल हुआ, और वे फर्श पर गिर पड़े।

मदनलाल ढींगरा और उधम सिंह: सर्जिकल स्ट्राइक के प्रतीक

शत्रु के देश (इंग्लैंड) में घुसकर हमला करने वाले पहले शहीद मदनलाल ढींगरा थे, और दूसरे उधम सिंह। दोनों को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में जाना जाता है। मदनलाल ढींगरा को 17 अगस्त 1909 को भारतीय सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम कर्जन वायली की हत्या के लिए इंग्लैंड में फाँसी दी गई थी। उधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को पेंटनविले जेल में सर माइकल ओ’ड्वायर की हत्या के लिए फाँसी दी गई। दोनों ने अपने उद्देश्यों को विदेश में पूरा किया, लेकिन जीवित स्वदेश नहीं लौट सके। बाद में उनकी अस्थियों को भारत लाया गया। दोनों क्रांतिकारी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सम्मानित चेहरे हैं, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज़ उठाई और इतिहास को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ओ’ड्वायर की हत्या पर प्रतिक्रियाएँ

भारत में प्रतिक्रियाएँ:

  • महात्मा गांधी: 15 मार्च 1940 को ‘हरिजन’ समाचार पत्र में गांधी ने इस हिंसक घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया और इसे ‘पागलपन’ करार दिया। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की आलोचना के बाद, 23 मार्च 1940 के संस्करण में उन्होंने कहा कि उधम सिंह को ‘बहादुरी के चिंतन का नशा’ था।
  • जवाहरलाल नेहरू: 15 मार्च 1940 को ‘नेशनल हेराल्ड’ में नेहरू ने ओ’ड्वायर की हत्या पर दुख व्यक्त किया। लेकिन 1962 में ‘दैनिक प्रताप’ में प्रकाशित एक बयान में उन्होंने कहा, “मैं शहीद-ए-आज़म उधम सिंह को सम्मानपूर्वक नमन करता हूँ, क्योंकि उन्होंने फाँसी के फंदे को चूमकर हमें आज़ादी दिलाई।”
  • भारतीय समाचार पत्र: अमृतसर पत्रिका (कोलकाता) और ‘द स्टेट्समैन’ ने उधम सिंह के कार्य की प्रशंसा की। 18 मार्च 1940 के ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ ने लिखा, “माइकल ओ’ड्वायर का नाम उस घटना से जुड़ा है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।” 14 मार्च 1940 को ‘द ट्रिब्यून’ (लाहौर) ने लिखा, “उधम सिंह ने वीरतापूर्वक कार्य किया।” भारत सरकार के गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, ओ’ड्वायर की मृत्यु से भारतीयों को ‘महान संतुष्टि’ मिली, और उधम सिंह को ‘स्वतंत्रता का योद्धा’ माना गया।

ब्रिटिश प्रेस:

  • ‘डेली टेलीग्राफ’ ने इस घटना को जलियाँवाला बाग (13 अप्रैल 1919) से जोड़ते हुए ‘पुरानी, दुखद स्मृति’ बताया। ‘यॉर्कशायर पोस्ट’ ने माना कि ओ’ड्वायर का नाम ‘दर्दनाक यादें ताज़ा करता है।’ हालाँकि, नरसंहार शब्द से परहेज किया गया। ‘द टाइम्स’ (लंदन) ने उधम सिंह को ‘स्वतंत्रता का योद्धा’ कहा।

धुरी राष्ट्रों (जर्मनी, इटली, जापान) में प्रेस:

  • मित्र देशों में उधम सिंह की आलोचना हुई, लेकिन धुरी राष्ट्रों में उनके शौर्य की प्रशंसा हुई। जर्मन रेडियो ने कहा, “भारतीय हाथियों की तरह अपने शत्रुओं को कभी माफ नहीं करते। वे 20 वर्ष बाद भी बदला ले सकते हैं।” रोम के ‘बर्गेरेट’ ने इस घटना को ‘महान महत्वपूर्ण’ और उधम सिंह के कार्य को ‘साहसपूर्ण’ बताया। ‘बर्लिनर बोर्सन ज़eitung’ ने इसे ‘भारतीय स्वतंत्रता की मिसाल’ कहा।

सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट, ओल्ड बेली में मुकदमा और फाँसी

उधम सिंह पर सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट, ओल्ड बेली में मुकदमा चला। उनके वकील वी.के. कृष्ण मेनन ने कहा कि उधम सिंह का हत्या का इरादा नहीं था, लेकिन उधम सिंह ने वकील को फटकारते हुए कहा, “मेरा वकील मेरी जान बचाने के लिए झूठ बोल रहा है। क्रांतिकारियों की परंपरा बहाने बनाना नहीं है। मैं अपने बलिदान से इंकलाब की ज्योति प्रज्वलित करना चाहता हूँ।” उन्होंने आगे कहा, “जलियाँवाला बाग हत्याकांड के दिन मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं इसका बदला लूँगा। मुझे प्रसन्नता है कि 21 वर्ष बाद मैंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।” 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को पेंटनविले जेल में फाँसी दे दी गई।

उधम सिंह का चिंतन: सपनों का भावी भारत

उधम सिंह को केवल एक राष्ट्रवादी या बदला लेने वाला शेर मानना उनके विचारों को सीमित करना होगा। उनके राजनीतिक विचार समाजवाद, मार्क्सवाद-लेनिनवाद, बोल्शेविज़्म, और गदर आंदोलन के क्रांतिकारी आदर्शों से प्रेरित थे। उनका उद्देश्य केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, और शैक्षिक परिवर्तन लाना था। वे हिंदू, मुस्लिम, और सिख एकता, गरीबी, अज्ञानता, और अशिक्षा के उन्मूलन के पक्षधर थे।

15 जुलाई 1940 को पेंटनविले जेल से लिखे पत्र में उधम सिंह ने अपने सपनों का भारत वर्णित किया:

“हमारा महान कर्तव्य है देश से अंग्रेजों को बाहर निकालना, फिर हिंदू, मुस्लिम, और सिख एकता स्थापित करना। भुखमरी, अज्ञानता, और बीमारियों को जड़ से खत्म करना। जनता को न्याय, किसानों और मज़दूरों को पेट भर भोजन, विद्यार्थियों के लिए अच्छे स्कूल-कॉलेज, और बच्चों-वृद्धों के लिए क्रीड़ास्थल और उद्यान हों। मेरी इच्छा है कि लोग शादी-विवाह की शान-शौकत के बजाय उच्च शिक्षा पर खर्च करें। मुझे विश्वास है कि आप इन मूल्यों को अपनाएँगे। मेरा देश उन्नत हो।”

क्रांति के प्रति समर्पण

उधम सिंह क्रांति को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे। अपने अदालती बयान में उन्होंने कहा:

“मैंने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के नीचे लोगों को तड़प-तड़पकर मरते देखा। मैंने जो किया, वह विरोध था, मेरा धर्म और कर्तव्य था। मुझे इसकी कोई चिंता नहीं कि मुझे कितना दंड मिलेगा—10, 20, या 60 वर्ष का कारावास या फाँसी। मैं किसी निर्दोष को मारना नहीं चाहता था, केवल विरोध करना चाहता था।”

30 मार्च 1940 को अपने मित्र सिंह को लिखे पत्र में उन्होंने कहा:

“मुझे मौत का डर नहीं। मैं हर हाल में तैयार हूँ। मैं शीघ्र ही मौत से शादी करने वाला हूँ। मुझे कोई अफसोस नहीं।”

उधम सिंह का चिंतन आज भी प्रासंगिक

उधम सिंह और अन्य क्रांतिकारियों का लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि एक ऐसा भारत था जिसमें भुखमरी, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, और सामाजिक-आर्थिक असमानता न हो। आज भी भारत में गरीबी, महँगाई, बेरोज़गारी, अशिक्षा, आर्थिक शोषण, सामाजिक असमानता, राजनीतिक अपराधीकरण, संप्रदायवाद, जातीय भेदभाव, दलित-आदिवासी शोषण, और महिलाओं पर अत्याचार जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। ये सभी उधम सिंह के चिंतन के विरुद्ध हैं। इसलिए, उनका विचार और बलिदान आज भी प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।

(लेखक: डॉ. रामजीलाल, समाज वैज्ञानिक, पूर्व प्राचार्य, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल)

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