याद कीजिए उन दिनों को, जब हमारे प्रधानमंत्री जी ने 2014 के अपने प्रथम संसदीय चुनाव में बड़े उत्साह के साथ स्वयं को ‘चायवाला’ कहकर देश भर में चाय की दुकानों पर लोगों के साथ चर्चा की थी। उनकी इस स्थिति को मजबूती देने में चाय वालों और वहाँ उपस्थित लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, ठीक वैसे ही जैसे वे ‘मन की बात’ के माध्यम से आकाशवाणी पर हर माह लोगों से संवाद करते हैं।
बहरहाल, ब्रिटेन में यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ ‘चाय पर चर्चा’ को हमारे चायवाले प्रधानमंत्री ने स्वयं ट्वीट कर लोगों को बताया। मोदी जी ने अपने एक्स हैंडल पर दो तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि चेकर्स में प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ ‘चाय पर चर्चा’ भारत-ब्रिटेन संबंधों को और मजबूत कर रही है। दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच औपचारिक वार्ता से पहले यह अनौपचारिक चर्चा हुई।
लगता है कि शायद आने वाले समय में मोदी जी विदेशों में ‘चाय पर चर्चा’ के माध्यम से एक बार फिर अपनी छवि को निखारने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका शुभारंभ ब्रिटेन की धरती से हो चुका है। लेकिन इस ‘चाय पर चर्चा’ में षड्यंत्र की बू आ रही है।
यह विचारणीय बिंदु है कि क्या चेकर्स, जो प्रधानमंत्री आवास का हिस्सा है, में यह चाय की दुकान पहले से थी, या इसे मोदी जी की अवमानना के लिए प्रायोजित किया गया था? क्योंकि आज तक ब्रिटेन में इस तरह की कोई ‘चाय पर चर्चा’ आयोजित नहीं हुई। यदि इसमें हमारे देश की कोई भूमिका है, तो यह और भी शर्मनाक है, क्योंकि इसके लिए गुजराती चायवाले अखिल पटेल को ही क्यों चुना गया?
उसने गुजराती में बोलते हुए मसाला चाय की याद दिलाई। जब वह अपनी मसाला चाय के बारे में बताता है कि इसमें असम की चायपत्ती और केरल के मसाले जैसे जायफल और दालचीनी हैं, तो मोदी जी को गर्व महसूस होता है। लेकिन जब वह चाय परोसता है, तो पहला प्याला मेजबान कीर स्टार्मर को देता है, जो चौंकाने वाला है। वे प्याला लेते हैं, लेकिन उसे अपने मेहमान मोदी जी की ओर नहीं बढ़ाते।
यहीं संदेह होता है कि क्या हमारे मोदी जी अपने देश की चाय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को पिला रहे हैं? अंत में, चर्चा का विषय वीडियो में सामने नहीं आया। हाँ, दुकानदार चायवाले ने यह कहकर मोदी जी पर कटाक्ष ज़रूर किया कि “एक चायवाला दूसरे चायवाले को चाय पिला रहा है।” जैसा कि उनकी आदत है, जब अंग्रेजी भारी पड़ने लगती है, तो वे जबरन हँसने की अदा अपनाते हैं और प्रफुल्लित हो जाते हैं।
हो सकता है कि यह पूरा षड्यंत्र ब्रिटिश सरकार ने हमारे प्रधानमंत्री की तौहीन के लिए रचा हो। वायरल वीडियो से तो यही प्रतीत होता है। यदि यह दोनों पक्षों की सहमति से हुआ, तो भी यह चिंतनीय है, क्योंकि अमेरिका, कनाडा, फ्रांस आदि देशों में हमारे प्रधानमंत्री के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया है, उसे इससे अलग नहीं देखा जा सकता।
हालाँकि, ऐसा कहा जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ युद्ध से परेशान हमारे प्रधानमंत्री ब्रिटिश सरकार को मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिए राजी करने में सफल रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यह ‘चाय पर चर्चा’ भारत के लिए फायदेमंद होगी। देखना यह है कि अमेरिका के 25% टैरिफ और उनके आदेशों के उल्लंघन पर अतिरिक्त टैरिफ से बचने के लिए वे कौन सा रास्ता अपनाते हैं, या फिर आत्मसमर्पण की नीति अपनाते हैं।
लेकिन इतना तय है कि भारत के प्रधानमंत्री को देश की प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए उनके खिलाफ रची जा रही साजिशों और षड्यंत्रों से सावधान रहना होगा। विदेशों में ‘चाय पर चर्चा’ से बचना ही बेहतर होगा।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं)