भक्त संज्ञा का राजनीतिक अर्थशास्त्र

मार्क्सवाद-लेनिनवाद के महागुरुओ ने बताया है, “जनता महान होती है!” भारत की ऐसी महान जनता भक्त कैसे हो गई?? कब हुई?? यह एक विचारणीय प्रश्न है! दरअसल जनता को भक्त कहना जले पर नमक छिड़कने के बराबर है! जनता पर उंगली उठाने वालों को खास कर अपने को कम्युनिस्ट, समाजवादी कहने वालों को ध्यान रहे कि उनकी तीन उंगलियां खुद उनके पापों (अकर्मण्यता) की ओर, अपनी ओर ही इशारा करती हैं।

अपनी ही संकलित रचनाओं में लेनिन कह रहे हैं कि मजदूर वर्ग जब तक पूंजीवाद की काली शक्तियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए खुद शिक्षित नहीं होता, (मार्क्सवादी) उपदेशों की कोई भी मात्रा उसे शिक्षित नहीं करेगी, बल्कि इसका उल्टा ही असर होगा।

लेकिन बड़ी-बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों के दफ्तरों में चले जाइए आपको उनकी बैठकों, प्रवेश द्वारों पर मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, लेनिन की एक भी पुस्तक ढूंढे नहीं मिलेगी, उनकी वेबसाइट देख लीजिए उसमें भी कोई पुस्तक, पुस्तिका, लेख या ऐसा कोई लेख नहीं मिल सकता जिसमें समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद के बारे में कोई एक लेख मिल जाए। गोया, कोई प्रतिबंधित साहित्य हो, गोया हम उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक के रूस में हों जहां जारकालीन प्रतिबंध लगे हैं, या आधुनिक छापेखाने ही नहीं हैं।

जब जनता में, मजदूरों में हमारा राजनीतिक काम ही नहीं होगा तो उस निर्वात में भाजपा आरएसएस जैसी कैडर वाली पार्टियों/ संगठनों के कट्टर धार्मिक विचारों की बातें ही तो जनता ग्रहण करेगी। 

किसान, मजदूर, बेरोजगार जैसी धर्म निरपेक्ष संज्ञाएँ आम गरीबों मजदूरों के दिलोदिमाग में कैसे आ सकती हैं?

क्या 25 सालों तक पंजाब में आम किसानों को डब्ल्यूटीओ के बारे में गांव-गांव में जाकर पंजाब की कम्युनिस्ट विचारधारा के किसान नेताओं के किए काम के बिना 2020 के किसान आंदोलन की कल्पना की जा सकती थी। 13 माह तक जब किसानों ने आधे दर्जन से अधिक स्थानों पर दिल्ली को घेरा था तो हमारी कई बड़े सेंट्रल ट्रेड यूनियंस, जिनमें से हरेक में पांच लाख से ज्यादा सदस्य थे, अपनी सेनाओं को चारों मजदूर संहिताओं को रद्द करने नहीं आ सकते थे? घेरे को क्यों नहीं और ज्यादा व्यापक रूप दिया गया?

हाल के दशकों में देश के औद्योगिक क्षेत्रों में हालिया मजदूर संघर्षों को देख लीजिए। ऐतिहासिक मारुति के संघर्ष को देख लीजिए, जिसमें पाकिस्तान, जापान, यूरोप, अमेरिका समेत दुनिया भर की जगहों पर भारतीय दूतावासों पर विदेशी मजदूर वर्ग ने प्रदर्शन किया, उसमें हमारी बड़ी-बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियां कहां खड़ी हैं? उनके मुकाबले अत्यंत छोटे संगठन जैसे इंकलाबी मजदूर केंद्र, मजदूर सहयोग केंद्र के लोग ही क्यों मारुति के ऐतिहासिक मजदूर आंदोलन में दिखाई देते हैं?? 

बिल्कुल हालिया मजदूर आंदोलन – औद्योगिक मजदूरों के आंदोलन – को देख लीजिए जो कि मानेसर से शुरू होकर नोएडा, ग्रेटर नोएडा, उत्तराखंड, राजस्थान आदि जगह ऑन तक फैला, उसमें भी इंकलाबी मजदूर केंद्र और बिगुल जैसे कतई छोटे संगठनों के लोग ही गिरफ्तार हुए। क्यों नहीं तुरन्त इनके समर्थन में देश भर में आज तक भी कोई आंदोलन नहीं खड़ा किया गया है?

विगत तीस वर्षों से एक दो दिन की अनुष्ठानिक हड़तालों से क्या हासिल होता रहा?

स्थापित इतिहास और सिद्धांतों से परे जाकर चुनाव जीतकर समाजवाद लाने वाली पार्टियों को आत्मचिंतन करना चाहिए कि ये दो हजार तक करीब चालीस सीटें जीतते रहे हैं तो उनके आधार में कैसे और किसने सेंध लगाई जबकि तीस साल से मजदूरों की हालत बद से बदतर होती गई है।

क्या आज पूरे भारत में जहां पर आधी जनता हिंदी भाषी है वहां पर मजदूरों का कोई लोकप्रिय अखबार है जो लाखों की संख्या में प्रकाशित होता हो और वितरित किया जाता हो?

वैसे तो इस मामले में किसान आंदोलन के नेता भी आत्मघाती आत्मतुष्टि का शिकार हो गए हैं। इसीलिए हिंदी भाषा के प्रदेशों में लाखों में छपने वाला कोई भी अखबार आज तक प्रचलन में नहीं है। अहिंदीभाषी इलाकों में भी एक लैटिन लिपि में ही कई भाषाओं के अखबार छापने का प्रयोग किया जा सकता है।

(उमेश चंदोला का लेख)

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