चोंगथम विक्रम सिंह की हत्या राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हो गई। चोंगथम विक्रम सिंह मणिपुर के रहनेवाले थे। उसी मणिपुर के जिस से उठी चिरायंध को नाक पर रुमाल डाले बिना व्यवस्था बरदाश्त करती रहा है। उसी मणिपुर से फिर आ रही है न्याय की मांग जिस मणिपुर (थोउबल) सेराहुल गांधी ने 14 जनवरी, 2024 को शुरू की थी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’!
चोंगथम विक्रम सिंह संगीतज्ञ थे। 6 सितंबर 2026 की रात ग्यारह से बारह बजे के बीच उन की हत्या हो गई। बताया गया है कि चोंगथम विक्रम सिंह कूड़ा फेंकने के लिए अपने तीसरी मंजिल वाले फ्लैट से नीचे आए। पास ही के ढाबा के कर्मचारी और डिलीवरी बॉय की तरफ से हो रहे शोर का विरोध किया। विरोध विवाद में बदला और फिर विवाद हत्या में बदल गया। परिवार ने कहा कि उन्हें बदला नहीं, न्याय चाहिए।
बदला नहीं, न्याय चाहिए
इस घटना का विश्लेषण बहुत गंभीरता से किये जाने की जरूरत है। उस से भी ज्यादा जरूरी है, परिवार के भीतर से उठ रही न्याय की मांग पर गौर करना! दुख और आघात की ऐसी घड़ी में किसी के भी विवेक का सही-साबूत रह पाना बहुत कठिन होता है। परिवार के सही-साबूत विवेक को समझने के लिए भी सही-साबूत विवेक चाहिए।
यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हमारे समय में बदला और प्रतिशोध की भावना को राजनीतिक उत्तेजना से बाघ बना दिया गया है। कोई संकोच नहीं है कहने में कि भारत के नागरिक जीवन में राजनीतिक उत्तेजना और उन्माद के न्यायखोर बाघ की सवारी सरकार कर रही है। सवाल यह है कि जब सरकार खुद न्यायखोर बाघ की सवारी कर रही है तो फिर! न्याय की मांग किस से!
हमारे समय में हर तरफ से उठ रही है न्याय की मांग! हर तरफ से आ रही है आवाज कि हम को भी चाहिए न्याय! बस एक ही आवाज कि न्याय चाहिए! न्याय चाहिए। दुनिया अभाव से अधिक अन्याय से पीड़ित है। कहा जाता है कि न्याय की आंख पर पट्टी बंधी होती है। हमारे यहां तो न्याय की आंख पर पट्टी के साथ-साथ कान में रूई ठुसी हुई लगती है। विडंबना ही है कि चतुष्पदीय व्यवस्था में न्याय की मांग हर तरफ से अनसुनी रह जाती है। ऐसे में न्याय का मतलब!
ऐसे में न्याय का मतलब जब शोर ने संगीत को मार दिया है! चोंगथम विक्रम सिंह संगीतकार थे। संगीतकार शोर को संगीत में बदलना जानता है। संगीतकार शोर को संगीत में बदलना चाहता है। संगीत और शोर की लड़ाई बहुत पुरानी है। परिवार की तरफ से आवाज आ रही है कि बदला नहीं, न्याय चाहिए!
यह ठीक है कि पूर्ण न्याय निष्ठ समाज एक यूटोपिया है। पूर्ण न्याय निष्ठ न सही, लेकिन व्यवस्था को न्याय निष्ठ तो होना ही चाहिए। जिस तरह का सामाजिक-नागरिक वातावरण, इको सिस्टम, बना दिया गया है या बनने दिया गया है वह बहुत ही त्रासद है। चोंगथम विक्रम सिंह के हत्यारों को कानूनी सजा बदला नहीं, न्याय है। लेकिन क्या यह वही न्याय नहीं है जिस न्याय के अभाव की बेचैनी में परिवार और समाज की तरफ से निरंतर न्याय की मांग उठ रही है?
नागरिक बेचैनी की अभिव्यक्ति और अदालत के अपमान में फर्क कर लेना चाहिए, किया जाना चाहिए।
(प्रफुल्ल कोलख्यान लेखक, आलोचक, सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)