झारखंड में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद जारी प्रारूप मतदाता सूची के अनुसार कुल 43, 61,987 मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। एसआईआर प्रक्रिया से पहले झारखंड में कुल 2, 64, 63, 236 मतदाता थे। संशोधन के बाद अब नई ड्राफ्ट सूची में 2, 21, 01, 249 मतदाता बचे हैं।
नाम कटने के मुख्य कारण मतदाताओं की मृत्यु, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले जाना, एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होना (डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन) और फॉर्म जमा या सत्यापित न हो पाना बताया जाता है।
एसआईआर का घोषित उद्देश्य पात्र भारतीय नागरिकों को सूची में शामिल करना और अपात्र, मृतक, स्थायी रूप से स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लिकेट नामों को हटाना बताया जा रहा है। जून 2026 के अंत से प्रक्रिया शुरू हुई है, जिसके तहत बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) का कार्य घर-घर जाकर गणना प्रपत्र वितरित करना, सत्यापन करना और 2003 की पिछली एसआईआर सूची से मैपिंग सुनिश्चित करना है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार लगभग 2.64 करोड़ मतदाताओं में से 83 प्रतिशत से अधिक ने प्रपत्र जमा किए। मसौदा सूची में 43,61,987 लाख अधिक नाम एएसडीडी (अनुपलब्ध, स्थलांतरित, मृत और डुप्लीकेट) श्रेणियों में हटाए गए। इसमें दावे और आपत्तियों का चरण जारी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रक्रिया जितनी सरल लगती है, उतनी नहीं है। आंगनबाड़ी सेविकाओं को बीएलओ बनाया गया है, जो अपनी मुख्य ड्यूटी के साथ-साथ यह अतिरिक्त भार संभाल रही हैं।
कहना होगा कि केवल कुछ प्रतिशत बीएलओ ही दिशा-निर्देशों को पूरी तरह समझकर लोगों को सही सलाह दे पा रहे हैं। विसंगति नोटिस घर-बैठे या अधूरे तरीके से वितरित हो रहे हैं। 2003 की सूची आसानी से उपलब्ध नहीं है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों का सहयोग कमजोर है। ये समस्याएँ मतदाताओं, खासकर अनपढ़ और दूर-दराज़ के लोगों को भ्रमित कर रही हैं।
प्रमुख विसंगतियाँ और जमीनी चुनौतियों में पहली समस्या प्रशिक्षण और समझ की घोर कमी है। बीएलओ के पास पर्याप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं है। रिपोर्टों में बताया गया है कि लक्ष्य, समय सीमा और बदलते निर्देशों के दबाव में कई बीएलओ संघर्ष कर रहे हैं। विसंगति नोटिस के अलग-अलग कारण (मैपिंग न होना, दस्तावेज की कमी आदि) के लिए अलग दस्तावेज चाहिए। बीएलओ खुद स्पष्ट नहीं समझ पाते तो ग्रामीणों को क्या बताएँगे? शिविर के दिन ही पढ़े-लिखे लोगों को भी असली जरुरत का पता चलता है। यह प्रक्रिया पारदर्शी बनाने के बजाय भ्रम पैदा कर रही है।
दूसरी समस्या नोटिस वितरण की है। दिशा-निर्देश के अनुसार नोटिस घर-घर जाकर दिए जाने चाहिए ताकि व्यक्ति समय पर जवाब दे पाए। इस पर भी कई जगह यह काम अधूरा या घर बैठे हो रहा है। परिणामस्वरुप पात्र मतदाता समय सीमा चूक सकते हैं।
2003 की मतदाता सूची की सहज उपलब्धता का अभाव सबसे बड़ी बाधा है। माता-पिता या पूर्वजों की मैपिंग के लिए यह सूची जरुरी है। बेशक वेबसाइट्स और हेल्पलाइन उपलब्ध हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, डिजिटल साक्षरता और स्थानीय भाषा समर्थन कमजोर है। बीएलओ को मदद चाहिए तो जिला स्तर पर हेल्पडेस्क का सहारा लेना पड़ता है, जो पर्याप्त नहीं है।
तीसरी समस्या स्थानीय सहयोग की कमी है। पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट को प्रक्रिया में शामिल किया गया है। इस पर भी कई स्थानों पर उनका सक्रिय सहयोग नहीं मिल पा रहा है। अनपढ़ मतदाताओं को सही जानकारी और दस्तावेज जुटाने में मदद नहीं मिलती है। कुछ मामलों में दबाव या गलत फॉर्म जमा करने की शिकायतें भी सामने आई हैं। कुल मिलाकर ग्रामीण मतदाता सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
मामले का गंभीरता से अध्ययन करने यह साफ हो जाता है कि बीएलओ पूरी तरह दोषी नही हैं। वे आंगनबाड़ी सेविका के रुप में पहले से व्यस्त हैं। अतिरिक्त भार, अपर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन की कमी उन्हें प्रभावी नहीं बनने देती है। फिर भी जो बीएलओ दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर पा रहे हैं, नोटिस अधूरे बाँट रहे है या गलत सलाह दे रहे हैं, जबकि पूरी जवाबदेही उनकी है।
बता दें कि बीएलओ व सुपरवाइजरों को गुणवत्ता और मात्रा दोनों जाँचनी होती है। कई जगह प्रगति धीमी होने पर वेतन रोकने जैसे कदम उठाए गए, जो दबाव तो बढ़ाते हैं, लेकिन समस्या का मूल हल नहीं होता है। इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ), असिस्टेंट ईआरओ, डिस्ट्रिक्ट इलेक्टोरल ऑफिसर (डीईओ) और मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) प्रशिक्षण, मॉनिटरिंग, 2003 सूची की उपलब्धता, हेल्पलाइन और जन जागरुकता सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार हैं। चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों में बीएलओ को कम से कम तीन बार घर जाने, कमजोर वर्गों की सुविधा और बीएलए-2 के साथ सहयोग का प्रावधान है। इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है तथा सिस्टम स्तर की कमी बनी हुई है। स्थानीय जनप्रतिनिधि और राजनीतिक दल भी सहयोग न देकर प्रक्रिया को कमजोर कर रहे हैं।
वास्तविक दोषी एकल व्यक्ति नही, बल्कि समन्वय की कमी, प्रशिक्षण की अपर्याप्तता, डिजिटल-ग्रामीण खाई और जवाबदेही तंत्र की कमजोरी है। बीएलओ मैदान में हैं, लेकिन सिस्टम उन्हें तैयार और समर्थ नही बना पा रहा है।
इन तमाम तरह स्थितियों पर आदिवासी लोकतांत्रिक अधिकार मोर्चा, झारखंड कोर कमेटी के सदस्य लक्ष्मीनारायण मुंडा मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से मांग करते हुए कहते हैं कि इन तमाम विसंगतियों का समाधान के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाया जाए। जिसके तहत – सभी बीएलओ (विशेषकर आंगनबाड़ी) को व्यावहारिक, स्थानीय भाषा में रीफ्रेशर प्रशिक्षण दें।
विसंगति के हर कारण के लिए दस्तावेज सूची और नमूना स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराएँ। वीडियो और मोबाइल ऐप आधारित गाइड अनिवार्य किया जाए। 2003 सूची की सहज उपलब्धता के साथ-साथ, पंचायत भवन, ब्लॉक ऑफिस और बीएलओ के पास हार्ड कॉपी या ऑफलाइन एक्सेस सुनिश्चित किया जाए। हेल्पलाइन 1950 को मजबूत करें और स्थानीय भाषा सपोर्ट बढ़ाएँ। मैपिंग न होने वाले मामलों में विशेष शिविर लगाएँ। घर-घर वितरण अनिवार्य किया जाए। अधूरे वितरण पर सुपरवाइजर और BLO दोनों की जवाबदेही तय हो जिसके तहत डिजिटल नोटिस के साथ-साथ फिजिकल डिलीवरी का प्रमाण रखें।
इसके अलावा सहयोग तंत्र को सक्रिय किया जाए। पंचायत प्रतिनिधियों और बीएलए-2 को सक्रिय भागीदारी के लिए बाध्य करें। हर बूथ पर साप्ताहिक समीक्षा बैठक हो। कमजोर क्षेत्रों में अतिरिक्त स्वयंसेवक तैनात करें।
मॉनिटरिंग और शिकायत निवारण के संदर्भ में डीईओ स्तर पर रीयल-टाइम डैशबोर्ड बनाएँ। शिकायतों का त्वरित निपटारा हो। बीएलओ पर अनावश्यक दबाव कम करें और संसाधन (यात्रा भत्ता, समय) दिया जाए। जन जागरुकता अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में लाउडस्पीकर, दीवार लेखन और शिविरों के माध्यम से सरल भाषा में जानकारी पहुँचाई जाए। जिससे “क्या दस्तावेज चाहिए” की सूची हर घर तक पहुँच पाए।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)