तस्वीरों में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च

”इस बार या तो हम संविधान को बचा लेंगे या फिर संविधान हमें बचा लेगा” बेहद गहमागहमी वाली शाम को कवर करके घर लौटते वक़्त तिरंगा ओढ़े मिली उस बच्ची की बात ज़ेहन में गूंज रही थी। 

ये उस जेन ज़ी की आवाज़ थी जो 16 अक्टूबर को सीजेपी  (कॉकरोच जनता पार्टी) की तरफ से दिल्ली के कनॉट प्लेस में स्थित सेंट्रल पार्क में ”लहरा दो तिरंगा” मार्च में शामिल होने आई थी। भारी सुरक्षा बल की वजह से वो कार्यक्रम तो नहीं हो सका लेकिन उसमें शामिल होने आए लोगों ने कनॉट प्लेस में ही जगह-जगह तिरंगा रैली निकाली।  

तस्वीरों में देखिए इस दिन की ख़ास झलक 

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क के आस-पास भारी सुरक्षा बल की तैनाती की गई थी

 सेंट्रल पार्क के बाहर खड़ी आंसू गैस छोड़ने की गाड़ी,  जिस पर सूचना लगी थी कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू है

चूंकि सेंट्रल पार्क तक लोगों को जाने नहीं दिया गया तो उन्होंने मेट्रो के गेट पर ही विरोध-प्रदर्शन किया उसी दौरान क्रांति की बयार का संदेश देता एक पोस्टर दिखा

 तिरंगा मार्च में हिस्सा लेने आए कुछ जेन ज़ी अतरंगी स्लोगन के साथ

तिरंगा ओढ़े एक छोटा बच्चा जिसने कहा कि ”हम ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा लेकर ही जाएंगे”

ट्रेड यूनियन के लोगों ने भी कनॉट प्लेस पहुंच कर तिरंगा लहराया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की

मार्च के दौरान एक पोस्टर दिखा जिसमें स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न को रद्द करने की मांग की गई है

मार्च में हिस्सा लेने आई लड़कियां, वायरल स्लोगन के साथ

तिरंगा मार्च के दौरान एक युवक अपने शरीर को ही तिरंगे में रंग कर पहुंचा।

शाहदरा से एक शख़्स बाइक पर कनॉट प्लेस पहुंचा जिसकी बाइक पर कई तिरंगे लहरा रहे थे, इस शख़्स ने कहा कि ” तिरंगा मेरा अभिमान और शान है” 

एक युवक के हाथ में पोस्टर, जिसके माध्यम से संदेश देने की कोशिश की गई कि संविधान के आगे दमन नहीं चल सकता

एक बुजुर्ग ने पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी.एन.शेषन को याद करते हुए मौजूदा दौर में उनके जैसे CEC की ज़रूरत को पोस्टर के माध्यम से व्यक्त किया

नारेबाज़ी कर रहे प्रदर्शनकारियों को जिस वक़्त हटाया जा रहा था उस वक़्त भारी सुरक्षा बल के बीच लहराता हुआ तिरंगा दिखा

तिरंगा मार्च में छात्र, मज़दूर संगठनों के साथ ही आवाज़ उठाने वाली आम जनता को देखकर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘इंतिसाब’ याद आती है जो उन तमाम लोगों के नाम है जिनकी तक़लीफों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। ये नज़्म बताती है कि देश से मोहब्बत करने का मतलब ये नहीं कि उसकी तमाम परेशानियों से आंखें मूंद ली जाए, अपने देश के दुख, परेशानी को पहचाना भी उससे अपने रिश्ते को ईमानदारी से निभाना है। उसी की चंद लाइनें कुछ यूं हैं –  

आज के नाम 

और 

आज के ग़म के नाम 

आज का ग़म कि है ज़िन्दगी के भरे गुलिस्तां से ख़फ़ा 

ज़र्द पत्तों का बन 

ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है

दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है 

पढ़ने वालों के नाम 

वो जो असहाब-ए-तब्ल-ओ-अलम

के दरो पर किताब और क़लम

का तक़ाज़ा लिए हाथ फैलाए 

वो मासूम जो भोले-पन में 

वहां अपने नन्हे चराग़ों में लौ की लगन 

ले के पहुंचे जहां 

बट रहे थे घटा-टोप बे-अंत रातों के साए 

(नजमा ख़ान की रिपोर्ट)

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