उमर, शरजील को बहुत पहले जमानत मिल जानी चाहिए थी: जस्टिस सुधांशु धूलिया

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया ने दिल्ली दंगों के मामले में जेल में बंद छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत दिए जाने की पैरवी की है। उन्होंने कहा कि उनकी राय में दोनों को आज नहीं, बल्कि बहुत पहले जमानत मिल जानी चाहिए थी। उमर खालिद और शरजील इमाम दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश के मामले में छह साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं और अभी ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ है।

जस्टिस धूलिया ने यह बात ‘भारतीय संविधान में न्याय की परिकल्पना’ विषय पर आयोजित तीसरे सर सैयद व्याख्यान के दौरान कही। कार्यक्रम में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, जजों की सेवानिवृत्ति के बाद होने वाली नियुक्तियों, नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी और संविधान में दिए गए अधिकारों पर सवाल-जवाब हुए।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार एक श्रोता ने सवाल उठाया कि जब उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे लोग लंबे समय से जेल में हैं और कुछ पूर्व न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद राज्यसभा या राज्यपाल जैसे पद मिलते हैं तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भरोसा कैसे किया जाए? इस सवाल के जवाब में जस्टिस धूलिया ने सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्तियों की परंपरा को किसी एक सरकार तक सीमित मानने से इनकार किया। इसके बाद उन्होंने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर अपनी निजी राय जाहिर की।

जस्टिस धूलिया ने कहा, ‘मेरी अपनी राय है कि शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत मिलनी चाहिए। आज नहीं, उन्हें बहुत पहले जमानत मिल जानी चाहिए थी।’ यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि लंबे समय तक विचाराधीन क़ैदी के रूप में जेल में रहने और जमानत मिलने में देरी को लेकर नागरिक अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपराधिक न्याय प्रक्रिया पर लगातार बहस होती रही है।

व्याख्यान के दौरान एक अन्य श्रोता ने सवाल उठाया कि यदि किसी खास समुदाय को न्याय नहीं मिल रहा है तो संविधान में न्याय की परिकल्पना का क्या अर्थ रह जाता है? इसके जवाब में जस्टिस धूलिया ने कहा कि संविधान की रक्षा की ज़िम्मेदारी केवल अदालतों या सरकारों की नहीं है। नागरिकों को भी जागरूक रहना चाहिए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोगों को सचेत होकर काम करना होगा और राजनीति में भाग लेना होगा। उन्होंने कहा, ‘लोग राजनीति में नहीं आ रहे हैं। आपको राजनीति में आना चाहिए और लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता बदलनी चाहिए।’

जस्टिस धूलिया ने इस बात पर चिंता जताई कि समाज के कई सम्मानित परिवारों के लोग गर्व से कहते हैं कि वे राजनीति से दूर रहते हैं या उन्हें राजनीति पसंद नहीं है। उनके मुताबिक़ ऐसे लोग यह नहीं समझते कि राजनीति से दूर रहने का असर आम जीवन पर भी पड़ता है। उन्होंने महंगाई, ग़लत लोगों के सत्ता में पहुँचने और भ्रष्ट नेताओं के उभरने जैसी समस्याओं का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि नागरिकों को अपनी राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति अधिक जागरूक होना होगा।

जस्टिस धूलिया ने संविधान के मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के संबंध पर भी बात की। यह विषय उनके व्याख्यान का महत्वपूर्ण हिस्सा था। एक श्रोता ने पूछा कि जब नागरिकों के मौलिक अधिकार ही खतरे में हों तो वे संविधान के नीति-निदेशक तत्वों में बताए गए आदर्शों को कैसे हासिल कर सकते हैं? इस पर जस्टिस धूलिया ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के बीच अंतर संबंधी सोच का ज़िक्र किया। उन्होंने नीति-निदेशक तत्वों को ऐसे सिद्धांतों के रूप में देखा जो समाज की जरूरतों और परिस्थितियों के साथ आगे बढ़ते हैं।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत की बड़ी आबादी आर्थिक रूप से इतनी मजबूत नहीं है कि वह संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों का पूरा लाभ उठा सके। उन्होंने कहा, ‘हां, यह सच है कि भारत के बहुत बड़े हिस्से के लोग तब तक भाग-3 में दिए गए अधिकारों का पूरा लाभ नहीं उठा सकते, जब तक वे आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में न हों। भूखे आदमी को रोटी चाहिए, आजादी नहीं।’

देश में मौलिक अधिकारों की स्थिति को लेकर सवाल के जवाब में जस्टिस धूलिया ने वर्तमान परिस्थितियों पर चिंता जताई, लेकिन भविष्य को लेकर उम्मीद भी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात अच्छे नहीं हैं, लेकिन परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। समय के साथ बदलाव होता है और आगे चलकर हालात बेहतर भी हो सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं मानता हूं कि आजकल हालात ठीक नहीं हैं। लेकिन हालात बदलते हैं। समय की सबसे अच्छी बात यही है कि वह बदलता है।’

(जनचौक ब्यूरो)

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