कब पकड़ें और कब छोड़ दें

घर से निकला ही था कि एक मित्र दिखे अपनी गाड़ी में। मुझे देखकर रुके और पूछा किस तरफ जा रहे हैं? पता चला कि नोएडा सिटी सेंटर जाना है तो बोले, ‘मैं भी उसी तरफ जा रहा हूं। आपको छोड़ता जाऊंगा। बैठ जाइए गाड़ी में।’

मित्र की गाड़ी खासी अच्छी और सुविधाजनक थी। इत्मीनान से बात करते हुए वह सफर कैसे कट गया, पता ही नहीं चला। लेकिन सिटी सेंटर करीब आते ही मैं चौकन्ना हो गया। सही जगह पर उन्हें गाड़ी रोक देने को कहा। मुझे उतारकर मित्र आगे बढ़ गए। मैं अब गाड़ी के बाहर धूप में था। कुछ सेकंड उस सुविधापूर्ण गाड़ी को आगे बढ़ता देखता रहा और फिर अपने गंतव्य की ओर बढ़ गया।

सवाल कुनमुनाया मन में। गाड़ी से पहले भी धूप थी, गाड़ी के बाद भी धूप। अगर चंद सेकंड पहले मैं गाड़ी को नहीं छोड़ता, तो अभी यह धूप नहीं झेलनी पड़ती। गाड़ी की सुविधाएं हासिल रहतीं अब तक। लेकिन, घर के पास उस गाड़ी में बैठने से लेकर अब तक वह सुविधाओं से लैस गाड़ी मुझे मेरे लक्ष्य की ओर ले जा रही थी, जबकि इस खास बिंदु के बाद वह मुझे लक्ष्य से दूर करती जाती। जितने क्षण मैं उस गाड़ी में बना रहता, लक्ष्य अधिक से अधिक दूर होता जाता।

यानी, एक समय जो चीज हमें लक्ष्य के करीब पहुंचा रही होती है, वही चीज एक खास बिंदु के बाद लक्ष्य से दूर ले जाने लगती है। क्या यह नियम व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन से जुडी हर चीज, हर विचार और हर भाव पर लागू होता है?

शायद हां, शायद नहीं।

अब इस शायद का क्या इलाज है? हम कैसे मानें कि यह नियम हर चीज पर लागू होता है और न मानें तो कैसे जानें कि किन बातों पर यह लागू नहीं होता?

उपाय एक ही है कि इसे हर चीज पर लागू करके देखें। ऐसा बार-बार करें, करते रहें। जिन नीतियों, नियमों, कहावतों, कसौटियों को हम बचपन से सुनते और मानते आए हैं, उन्हें किसी की बातों में आकर एक झटके में छोड़ देना भले सही न हो, यह सोच तो सकते ही हैं कि उनसे हमारा और दूसरों का क्या फायदा और नुकसान हो सकता है। मौजूदा हालात में ये कितने आवश्यक या उपयोगी हैं और हालात बदलने के बाद कितने निरर्थक या हानिकारक साबित हो सकते हैं? चूंकि देश-समाज और हमारे आसपास के हालात निरंतर परिवर्तनशील हैं, इसलिए देखने और आजमाने की यह प्रक्रिया भी निरंतर चलाते रहनी होगी।

तभी पता चलेगा कि राष्ट्रभक्ति की जो भावना एक समय हमें और हमारे देश को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने वाली साबित होती है, उसी भावना के नाम पर हम किसी और समय पड़ोसी मुल्क से नफरत का शिकार होकर देशवासियों को युद्ध की आग में झोंकने पर तत्पर भी हो सकते हैं। तभी स्पष्ट होगा कि धर्म की जो भावना किसी समय हमें ज्यादा उदार, ज्यादा संवेदनशील और ज्यादा परोपकारी बनाती है, वही किसी और समय हमें ज्यादा संकीर्ण, ज्यादा क्रूर और ज्यादा अमानवीय बनाने लग जाती है। तभी अहसास होगा कि अपने लिए अधिक से अधिक संग्रह करने की जो भावना एक समय हमें ज्यादा समृद्ध और ज्यादा सुरक्षित बनाती है, वही भावना एक सीमा के बाद हमें व्यक्ति ही नहीं, समाज के रूप में भी ज्यादा दरिद्र और ज्यादा असुरक्षित बनाने लगती है।

(रेखाचित्र एआई की मदद से)

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं और यूट्यूब चैनल @dhoop_chhaanv चला रहे हैं।)


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