भारतीय राजनीति आज एक चौराहे पर खड़ी है जहाँ सत्ता है, पर दिशा नहीं। यह वार्ता आकाश आनंद के सन्दर्भ से शुरू हुई है, पर सवाल किसी आकाश आनंद या केवल एक व्यक्ति का नहीं, पूरे दलित आंदोलन और इससे भी ज्यादा देश के लोकतंत्र का है।
समस्या क्या है?
पहली समस्या विरासत का बोझ है। कांशीराम जी ने एक मिशन बनाया था जो समाज के पैसे और कैडर कैंप से चलता था। मायावती जी ने उसे सत्ता में बदला – चार बार मुख्यमंत्री बनना बड़ी उपलब्धि है। पर सत्ता ने मिशन को खा लिया। आज बसपा में कैडर नहीं,टिकट प्रबंधक हैं। जब पार्टी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने लगती है तो वह चाटुकार पैदा करती है,नेतृत्व नहीं। आकाश आनंद में नई भाषा और युवा स्वीकार्यता है,पर वे रिश्तों के बोझ,विशेषकर बुआ और पिता की संपत्ति के नैरेटिव तले दबे हैं। अगर वे इसी संरचना में रहे तो उनका भविष्य एक और इस्तेमाल किए गए नंबर दो नेता से ज्यादा नहीं होगा।
दूसरी समस्या भारतीय क्षेत्रीय दलों के मॉडल की है। भारत के लगभग सभी क्षेत्रीय दल परिवार की जागीर बन चुके हैं। वहाँ आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। इस कारण युवा कार्यकर्ता सपना नहीं देख सकता। वह जानता है कि कितनी भी मेहनत कर ले, शीर्ष पर परिवार ही रहेगा। इसी निराशा ने युवाओं को या तो घर बैठा दिया है या दूसरे ध्रुव की ओर धकेल दिया है।
तीसरी और सबसे बड़ी समस्या देश की है, जिसे बाबा साहेब ने 1949 में कहा था – “जब दल धर्म को देश से ऊपर रखेंगे तो स्वतंत्रता खतरे में पड़ेगी।” स्वतंत्रता खतरे में पड़ती है तो मानवीय अधिकारों का क्षरण होना निश्चित है। आज एक कदम आगे की स्थिति है – जब दल सत्ता को देश से ऊपर रखेंगे तो पतन निश्चित है। धर्म को हथियार बनाना और सत्ता को बचाने के लिए हर संवैधानिक संस्था को दबाना (झुकाना एवं उनका दुरूपयोग) ये दोनों प्रवृत्तियाँ आज सत्ताधारी दल में स्पष्ट दिखती हैं। सीट 303 से 240 पर आना इस मोहभंग का संकेत तो है मगर लोगों का जो छद्म धार्मिक मानस बनाया गया है उस पर कोई चोट या बात नहीं करना चाहता।
समाधान क्या हो सकता है?
समाधान व्यक्ति बदलने से नहीं, मॉडल बदलने से आएगा।
पहला, आकाश आनंद को यदि नई राजनीति करनी है तो उन्हें बसपा और आजाद समाज पार्टी दोनों के सेंट्रलाइज्ड मॉडल को छोड़ना होगा। पार्टी विकेंद्रित होनी चाहिए, जहाँ जिला इकाई अपना अध्यक्ष और अपना फंड खुद तय करे। सत्ता लखनऊ या दिल्ली से नहीं, बूथ से निकले।
दूसरा, आंतरिक लोकतंत्र को संस्कृति बनाना होगा। यह केवल चुनाव कराना नहीं है। यह खुद को परिवार से अलग करना है। सार्वजनिक रूप से पिता के व्यवसाय से कानूनी दूरी और चंदे पर आधारित फंडिंग ही नैतिक वैधता देगी। जनता पैसा देने को तैयार है, पर उसे पारदर्शिता चाहिए।
तीसरा, और सबसे अहम, एक नया वैचारिक मॉडल चाहिए – प्रतिनिधित्ववादी राज्य समाजवाद। अब तक आरक्षण को केवल सरकारी नौकरी तक सीमित रखा गया। जबकि देश की संपत्ति अब निजी क्षेत्र में है। नया विचार यह होना चाहिए – प्राइवेट कंपनियों, प्राइवेट विश्वविद्यालयों, ठेकों और सप्लाई चेन में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व। राज्य पूंजी अर्थात अनियंत्रित पूंजीवाद को नियंत्रित करे ( याद रहे चुनिंदा लोगों के पास अकूत सम्पदा, पूंजी के इकट्ठा होने का विरोध करना औद्योगीकरण का विरोध नही है) पर नौकरशाही और अर्थव्यवस्था में दलित, पिछड़े, आदिवासियों की हिस्सेदारी सुनिश्चित हो। यह मॉडल किसी पार्टी के पास नहीं है।
अंत में बाबा साहेब का उदाहरण ही रास्ता दिखाता है। उन्हें राजनीतिक रूप से असफल कहा गया क्योंकि वे चुनाव हारे। मायावती जी को सफल कहा गया क्योंकि वे चुनाव जीतीं। पर आज कौन अमर है? चुनाव जीतकर मूर्तियाँ बनवाने वाले का समाज साथ छोड़ रहा है, चुनाव हारने वाले का विचार रोज फैल रहा है, उनकी (बाबा साहेब की) स्वीकार्यता दिन प्रतिदिन बढ़ रही है।
आकाश आनंद में क्या खूबी है जो दूसरों में नहीं?
पहली खूबी उनकी चाहत है। आपने देखा होगा कि वे अपने भाषणों में बार-बार स्क्रिप्ट से बाहर निकल जाते हैं। उन्हें जबरन सर्वजन की पुरानी लाइन पढ़वाई जाती है, पर उनके मुंह से सड़क, संघर्ष और सवाल की बात निकलती है। यह स्वतंत्र अभिव्यक्ति की चाहत है। एक घुटन है जो एक युवा में तभी आती है जब वह रिश्तों के बोझ, खासकर बुआ के राजनीतिक अनुशासन तले दबा हो और फिर भी खुद को साबित करना चाहता हो।
दूसरी खूबी उनकी सक्षमता है। मायावती जी कथित रूप से जमीनी नेता थीं, पर उनका दायरा हिंदी पट्टी और प्रशासन तक था। आकाश पढ़े-लिखे हैं, अंग्रेजी में सहज हैं, सोशल मीडिया की भाषा समझते हैं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर दलित प्रश्न को रख सकते हैं। यही वह गैप है जिसके कारण युवा विशेषकर दलित युवा आज बसपा से नहीं जुड़ रहा। उसे एक ऐसा चेहरा चाहिए जो लंदन में भी बहस कर सके और नगीना में भी। इस सक्षमता को चंद्रशेखर आजाद में आंदोलन के रूप में और आकाश आनंद में उनकी प्रस्तुति के रूप में समझा जा सकता है।
आकाश के लिए विकल्प
इसलिए आकाश आनंद का भविष्य एमपी या एमएलए बनने में नहीं, एक दीर्घकालिक विचार बनने में है। आकाश आनंद के पास अवसर है कि वे परिवार के वारिस नहीं,विचार के वारिस बनें। अगर वे यह साहस दिखाते हैं तो एक नई पार्टी केवल दलितों की नहीं, देश के उस युवा की पार्टी बन सकती है जो धर्म और सत्ता दोनों को देश से नीचे देखना चाहता है।

(रामेश्वर दयाल भारतीय लोकतान्त्रिक समाज महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक मंडल के सदस्य हैं।)