दिल्ली के सभी 6 ज़िला न्यायालय दिल्ली बार एसोसिएशन के आदेश के अनुसार 22-23 अगस्त को हड़ताल पर चले गए हैं। स्पष्ट सूचना के अनुसार दिल्ली बार एसोसिएशन का यह फ़ैसला दिल्ली के राज्यपाल वीके सक्सेना द्वारा जारी किए गए सर्कुलर के बाद आया जिसमें सरकार की तरफ़ से एक नई पहल के अंतर्गत एक नया नियम लाया जा रहा है, जिसमें पुलिस स्टेशन को गवाही के लिए एक नियत स्थान घोषित किया गया है।
इसका तात्पर्य यह है कि पुलिस पदाधिकारी पुलिस स्टेशन में ही अपनी गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा दे सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ़ एसोसिएशन का मानना है कि कई बार के प्रयास के बाद भी जब सरकार ने ग़ैर-क़ानूनी फ़ैसले को वापस नहीं लिया तो यह क़दम लेना आवश्यक हो गया।
12 अगस्त को सक्सेना ने उस अधिसूचना को मंज़ूरी दी थी, जिसके तहत दिल्ली के सभी 226 पुलिस स्टेशनों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग केंद्र घोषित किया गया, ताकि अधिकारी अदालत में साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें। यह कदम, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रारूप मॉडल नियमों के आधार पर उठाया गया था, जिसका उद्देश्य “कुशलता बढ़ाना और समय की बचत करना” था, साथ ही जनशक्ति और संसाधनों को मुक्त करना भी।
इस क़दम से मुख्य समस्याएँ क्या उत्पन्न हो सकती हैं?
जहाँ तक फ़ेयर ट्रायल का मानना है, पूरे आपराधिक मुक़दमे का मूल स्तंभ है कि सही न्यायिक प्रक्रिया से गुज़र कर ही केवल किसी व्यक्ति को सज़ा या दोषसिद्धि की जा सकती है। जितना ज़रूरी विधि के द्वारा मुजरिम का पकड़ा जाना और उस पर क़ानूनी कार्यवाही की जानी है, उतना ही ज़रूरी है लोगों के मूल अधिकारों को बिना अनदेखा किए हुए पूरी गरिमामयी तरीक़े से मुक़दमे को चलाना भी। बार एसोसिएशन ने अपनी चिंता और रोष व्यक्त करते हुए यह स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया से संभावित छेड़छाड़, जिरह में एक बुनियादी मज़बूती का अभाव और पारदर्शिता के हद तक समाप्त होने की संभावना है। उनका मानना है कि न्याय पुलिस अधिकारी को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने की माँग करती है।
द्वारका बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अधिवक्ता अवनीश राणा ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि “साक्ष्य प्रस्तुत करने का उद्देश्य सत्य को उजागर करना है, जो केवल तभी संभव है जब यह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीक़े से हो; अर्थात गवाह को न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। यदि किसी पुलिस अधिकारी का बयान अदालत से दूर बैठकर और वह भी किसी पुलिस स्टेशन से दर्ज किया जाएगा, तो गवाही में हेरफेर की पूरी संभावना रहेगी….यह किसी हद तक पुराने ढंग के पुलिस राज को बढ़ावा देने जैसा है।”
बार संस्थाओं का कहना है कि यह अधिसूचना 15 जुलाई, 2024 को केंद्र के गृह सचिव द्वारा जारी सर्कुलर के विपरीत है, जिसमें स्पष्ट रूप से पुलिस स्टेशनों (या पुलिस नियंत्रण वाले स्थानों) को वीडियो माध्यम से गवाही के लिए स्थल घोषित करने पर प्रतिबंध लगाया गया था।
यह बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि इससे पहले के सर्कुलर, अर्थात 15 जुलाई, 2024 के सर्कुलर को जारी करते हुए यही दिल्ली की सरकार ने इस बात को स्पष्ट किया था कि पुलिस स्टेशन को गवाही या जिरह के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह पूरी तरीक़े से निष्पक्ष मुक़दमे की अवहेलना होगी। इस उहापोह की स्थिति का एक बहुत बड़ा कारण सुप्रीम कोर्ट की इस बात पर कुछ स्पष्ट तरीक़े से न आना भी है। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य बनाम प्रफुल बी. देसाई मामले में, पुलिस द्वारा कोर्ट से बाहर दिए जाने वाले बयान पर पूरी तरीक़े से रोक नहीं लगाई थी, बल्कि उस मामले की सुनवाई में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सही आपराधिक मुक़दमे और निष्पक्ष तरीक़े की बात रखी थी।
दरअसल, धारा 273 दंड प्रक्रिया संहिता इस बात पर चर्चा करते हुए यह कहती है कि “गवाही आरोपी के समक्ष होनी आवश्यक है” परंतु इसमें यह कहीं भी नहीं लिखा है कि उसे शारीरिक रूप से वहाँ उपस्थित होने की आवश्यकता है या नहीं। हालांकि प्रफुल बी. देसाई में जिन परिस्थितियों में और जिन तथ्यों के आधार पर एक उदारवादी विश्लेषण कोर्ट द्वारा किया गया, वह एक असाधारण स्थिति थी, जहाँ एक डॉक्टर की गवाही कोर्ट को अहम लगी और उन्होंने इंग्लैंड से आने से मना कर दिया था, और ऐसी परिस्थिति में उनकी गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा ली गई थी। परंतु इसके लिए तमाम उपकरणों को व्यवस्थित किया गया था ताकि फ़ेयर ट्रायल को नीचा न कर दिया जाए।
परंतु नए भारतीय न्याय संहिता में इसको एक ज़्यादा स्पष्ट रूप देने का प्रयास किया गया और यह सर्कुलर शायद उसी को मूर्त रूप देने का प्रयास है। नए भा.न्याय.सं. की धारा 308 की भाषा को अगर हम ध्यान से पढ़ेंगे तो वह इस प्रकार है, जहाँ इस धारा में “through audio-video electronic means at the designated place to be notified by the State Government” शब्द को जोड़ा गया है। अगर हम भारतीय न्याय संहिता की धारा 308 को पढ़ते हैं तो यह सर्कुलर उसी को अनुपालित करते हुए लाया गया है।
परंतु क्या यह वास्तविक रूप से मुक़दमे की प्रक्रिया को सही करेगा या यह तकनीक के बढ़ते प्रयोग का फ़ायदा राज्य को पहुँचाएगा? इस सवाल का जवाब जाने बिना इसे आँख बंद कर सिर्फ़ यह मानकर अनुसरण में लाना कि तकनीक का प्रयोग कर हर बार चीज़ें आसान हो जाती हैं, ठीक विकल्प नहीं है।
चित भी मेरी पट भी मेरी
दरअसल अगर हम सीधे तौर पर एक बात देखें तो वास्तविक रूप से और सरल तरीक़े से बचाव (डिफ़ेन्स) के पास जिरह (क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन) के अलावा और कौन-सी स्थिति है, जहाँ वह अभियोजन (शिकायतकर्ता) पक्ष में छिपी हुई समस्याओं को उजागर कर सकता है? और अगर जिरह का अधिकार भी बचाव पक्ष के पास न बचे, तो फिर आपराधिक न्यायिक संकल्पना में फ़ेयर ट्रायल की बात कहाँ से आ जाती है?
आए दिन हम अदालत के अंदर मामलों की सुनवाई में देखते हैं कि पुलिस द्वारा जाँच के दौरान किस प्रकार से चीज़ों को तोड़-मरोड़ कर एक कहानी प्रस्तुत की जाती है, सीज़र मेमो बना दिए जाते हैं। और क्या हम ऐसी स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जब पुलिस के पास ही पूरा अधिकार हो जाए अपने द्वारा दिए गए बयान को ख़ुद के साथ मिलाकर सही करने का?
जहां तक फ़ेयर ट्रायल सुनिश्चित करने का सवाल है, आज भी सीज़र की कोई भी वीडियो हमें तुरंत देखने को नहीं मिलती। अपराध स्थल पर क्राइम टीम द्वारा या पुलिस द्वारा मुश्किल से ही किसी-एक-दो मामलों में वीडियो सबमिट किया जाता है। क्या वह फ़ेयर ट्रायल को सुनिश्चित नहीं करेगा?
गिरफ़्तारी के दौरान कभी भी स्वतंत्र गवाह (इंडिपेंडेंट विटनेस) इन्हें नहीं मिलते? क्या लोगों को इतनी परेशान करने वाली जाँच एजेंसियाँ लगती हैं? अगर लगती हैं, तो जाँच एजेंसियों को अपने इन सारे मुद्दों पर पहले काम करने की ज़रूरत है।
(निशांत आनंद की रिपोर्ट।)