भारतमाला एक्सप्रेस-वे : विकास की सड़क, किसानों की बर्बादी, फसलें नहीं-रौंदे जा रहे अन्नदाता के सपने?

कैमूर। बिहार के कैमूर जिले के चांद प्रखंड के किसानों के लिए अबकी बारिश की बूंदें उम्मीद लेकर आई थी। खेती-किसानी की थकान और श्रम के बाद जब सूरज की पहली किरणें खेतों पर बिखरीं तो लहलहाती धान की फसलें हवा के झोंकों में झूम रही थीं। किसानों के चेहरों पर उम्मीद की चमक थी, क्योंकि तीन महीने की मेहनत जल्द ही पकने को तैयार खड़ी थी, बीते सोमवार की सुबह कुछ ही घंटों में उनकी खुशी-चीख़ और सिसकियों में बदल गई। भारतमाला परियोजना से जुड़े नुमाइंदों की मनमानी ने बर्बादी की पटकथा लिख दी।

08 सितंबर को सिकंदरपुर और मसोई गांव की पगडंडियों से होकर जब भारी भरकम बुलडोज़र और पोकलैंड मशीनें पुलिस बल व अफसरों के साथ खेतों में उतरीं तो किसानों को समझ ही नहीं आया कि यह कैसा विकास है? जिन खेतों को उन्होंने खाद, पसीने और दुआओं से सींचा था वहां लोहे के पंजे धंस रहे थे। फसलें टूट रही थीं,  जिन खेतों में धान की बालियां लहलहा रही थीं वो कुचल रही थीं। किसानों के सपने पल भर में राख हो रहे थे। यह दृश्य किसी युद्धभूमि जैसा था जहां दुश्मन सामने नहीं, बल्कि सत्ता की ठंडी मशीनें थीं।

इसी रास्ते से जाना है हाईवे।

किसानों के लिए यह सिर्फ़ फसल नहीं थी। यह उनकी जिंदगी, उनकी रोज़ी-रोटी, उनकी पीढ़ियों की पहचान और उनके पूर्वजों की विरासत थी। लेकिन विकास की परियोजना के नाम पर जब खेत उजड़े, तो हर गिरती हुई बाली के साथ किसानों के आंसू जुड़ते चले गए। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें धकेला गया, गालियां दी गईं और लाठियों से चुप करा दिया गया। किसान कहते हैं-मोहनियां के एसडीएम खुद इस कार्रवाई की अगुवाई कर रहे थे, और वहीं से अपमान और दर्द की शुरुआत हुई।

पिछले महीने जब सिहोरा और करबंदिया गांवों में भी फसल रौंदने की कोशिश हुई थी, तब किसानों ने सीना तानकर विरोध किया और प्रशासन को पीछे हटना पड़ा। मंत्री जमा खान के ज़रिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तक किसानों की गुहार पहुंची थी। नेताओं के आश्वासन ने किसानों को भरोसा दिलाया था कि अब उनकी मेहनत सुरक्षित रहेगी। लेकिन मसोई गांव में जब मशीनों ने फसल को बेरहमी से कुचलना शुरू किया, तो किसानों की सारी उम्मीदें धूल में मिल गईं।

बुलडोज़र चला, खेत उजड़े, उम्मीदें टूटीं

पोकलेन से धान की फसलों को तहस-नहस कर रही सरकारी मशीनरी की धमक और धमकी का सीन किसी शोकसभा से कम नहीं है। बूढ़े किसान हाथ जोड़कर अपनी फसल को बचाने की गुहार लगा रहे हैं। उनके कांपते होंठों से केवल यही निकल रहा है, “यह हमारी जान है, इसे मत छीनो।” महिलाएं रो-रोकर आसमान को देख रही थीं जैसे ऊपर वाला भी मौन साधे बैठा हो। बच्चे अपने माता-पिता से चिपके खड़े थे। उनके मासूम सवालों का जवाब किसी के पास नहीं था। किसानों की आंखों के सामने उनकी मेहनत, उनका भविष्य, उनका सहारा, सब मिट्टी में मिल रहा था। वे केवल देख सकते थे, रोक नहीं सकते थे।

कुछ इस तरह से रौंदा जा रहा है फसलों को।

मसोई गांव के उदई सिंह की आंखों में दर्द साफ झलकता है। वे बताते हैं, “मेरी पांच एकड़ जमीन भारतमाला परियोजना में जा रही है। यही सब कुछ था मेरे पास। अब इस ज़मीन के बाद मेरे पास बचा ही क्या रहेगा? हम अपने बच्चों को क्या खिलाएंगे, कहां ले जाएंगे?” उनकी आवाज़ कांपती है, लेकिन शब्दों में हताशा और गुस्सा दोनों साफ झलकते हैं।

यह दर्द सिर्फ उदई सिंह का नहीं है। इसी गांव के भूपेंद्र सिंह और सच्चिदा सिंह भी उसी पीड़ा से गुजर रहे हैं। भूपेंद्र की बारह एकड़ जमीन परियोजना में समा रही है। वे कहते हैं, “पीढ़ियों से इस मिट्टी को सींचा है। यही हमारी रोज़ी-रोटी, यही हमारी पहचान थी। अब सरकार इसे भी छीन लेना चाहती है।”

अपनी जमीनों के बचाने के लिए चांद इलाके के किसान महीनों से सड़कों पर हैं। वो आवाज़ उठा रहे हैं कि उन्हें उनकी ज़मीन का सही मूल्य दिया जाए। सरकार ने किसानों की जमीनों का जो मुआवजा तय किया है वह बाजार दर से बहुत कम है। किसानों ने साफ कह दिया था कि यह सौदा अन्याय है। यही कारण था कि उन्होंने मुआवजा लेने से इनकार कर दिया और उसी अधिग्रहीत ज़मीन पर धान पौध रोप दी थी।

यह कदम केवल खेती का नहीं, बल्कि प्रतिरोध का प्रतीक था। उन्होंने मानो ऐलान कर दिया था कि यह ज़मीन उनकी रगों में दौड़ते खून की तरह है, इसे छोड़ा नहीं जा सकता। आंदोलित किसानों की पुकार साफतौर पर देखा जा सकता है, “हमारी जमीनें ले लो, लेकिन पहले हमें दफना दो।”

सिकंदरपुर गांव में जिन किसानों की फसलें रौंदी गईं, उनमें प्रगतिशील किसान अनुपम पांडेय, अनिल पटेर मुखिया और राकेश पांडेय शामिल हैं। अनुपम पांडेय गुस्से से कहते हैं, “हम खेती में आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, ताकि गांव का नाम रोशन हो। लेकिन जब हमारी खड़ी फसल पर बुलडोज़र चल जाता है, तो सोचिए हमारे सपनों पर क्या बीतती होगी?”

नौ सितंबर को दुलहरा मौजा में छोटे-छोटे किसानों की धान की फसलें रौंदी गईं। अरविंद पटेल वहां खड़े होकर रो पड़े। वे बोले, “हम छोटे किसान हैं साहब। हमारी मेहनत का एक-एक दाना बच्चों के पेट से जुड़ा है। सरकार अगर जमीन ले भी रही है, तो क्या हमारी खड़ी फसल को बख्श नहीं सकती थी?”

सबसे बदतर हालात दलित समुदाय के हैं। कानून कहता है कि इन्हें पहले पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए, लेकिन यहां उल्टा हो रहा है। सिकंदरपुर इलाके के दलित किसान धनंजय राम, मुन्ना राम, बाबूनंदन राम और काशीराम बताते हैं कि उनके खेतों के साथ-साथ घरों को भी उजाड़ा जा रहा है। धनंजय राम की आवाज़ भर्रा जाती है, “हमारे सिर से छत छीन ली जा रही है। खेत उजाड़ दिए जा रहे हैं। बिना पुनर्स्थापना किए अगर हमें बेघर कर दिया जाएगा, तो हम अपने बच्चों को कहां ले जाएंगे?”

दुलारा और दियुर मौजा में भी यही सब देखने को मिल रहा है। किसान गज्जन सिंह बताते हैं, “खड़ी फसल को बर्बाद करना किसानों की आत्मा को कुचलने जैसा है। हम अपनी आंखों से देख रहे हैं कि महीनों की मेहनत कुछ मिनटों में मिट्टी हो जाती है।”

फसल के मसले पर पंचायत करते किसान

जिन गांवों से होकर भारतमाला परियोजना की सड़क गुजरने वाली है वो पूरा इलाका आक्रोश और आंसुओं से भरा हुआ है। कहीं बेबस किसानों की सिसकियां हैं, तो कहीं उनके सवाल-आख़िर क्यों उनकी मेहनत की कमाई और पीढ़ियों की जमीनें इस बेरहमी से छीनी जा रही हैं? प्रशासन के लिए यह महज़ आदेश का पालन था, लेकिन किसानों के लिए यह उनकी पीढ़ियों की विरासत का विनाश था?

दर्दनाक है किसानों की जिंदगी

किसानों का दर्द यह है कि जिनके दम पर देश का पेट भरता है, वही आज अपने हक़ के लिए सबसे असहाय और उपेक्षित नज़र आ रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार कंपनियों के साथ खड़ी है, जबकि किसानों की आवाज़ को कुचल दिया गया है। उनकी मांग बहुत सीधी है-बाजार मूल्य के अनुरूप मुआवजा और उनकी मेहनत की इज़्ज़त। किसानों पर लाठीचार्ज की घटनाओं ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनकी पुकार सत्ता के गलियारों तक कभी पहुंचेगी भी?

यह त्रासदी केवल एक सड़क के लिए खेतों उजाड़ नेस्तनाबूत करने की कहानी नहीं है। यह कहानी है उस टकराव की जिसमें एक तरफ़ विकास का नाम लेकर मशीनें बढ़ रही हैं और दूसरी तरफ़ किसान हैं, जिनके सपनों की जड़ें उसी मिट्टी में गड़ी हैं। धान की वह बाली, जो मशीनों के नीचे रौंदी गई, केवल अनाज का दाना नहीं थी, बल्कि सैकड़ों परिवारों की उम्मीद, उनका भविष्य और उनकी गरिमा थी।

किसान नेता अनिल सिंह की आवाज़ में दर्द और गुस्सा साफ झलकता है। वे बताते हैं, “भारतमाला परियोजना की आड़ में कैमूर जिले के 90 गांवों की ज़मीनों पर कब्ज़ा किया जाना है। इनमें कुछ गांव चिरागी हैं, जहां पीढ़ियों से लोग रहते आए हैं और कुछ ना-चिरागी, जहां अब आबादी नहीं है। सरकार का दावा है कि एनएच एक्ट के तहत बाजार भाव से चार गुना मुआवजा दिया जाएगा, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।”

अनिल आगे कहते हैं, “जब विकास की आंधी किसानों की मेहनत पर इस तरह टूटती है तो उनके मन से यही सवाल उठता है-क्या तरक्की हमेशा उनकी मिट्टी, उनके पसीने और उनके जीवन की बलि लेकर ही हासिल की जाएगी? या फिर कभी ऐसा भी दिन आएगा, जब विकास की राह अन्नदाता की आंखों के आंसू पोंछते हुए आगे बढ़ेगी? जब फसल रौंदी जाती है तो केवल अनाज नहीं मिटता, बल्कि किसानों का आत्मविश्वास, उनकी उम्मीदें और उनका भविष्य भी ढह जाता है।”

फसलें रौंदने के लिए खड़ा बुल्डोजर

सच यह है कि सरकार सर्किल रेट को ही बाजार रेट मानकर मुआवजा तय कर रही है। साल 2013 से अब तक सर्किल रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, जबकि महंगाई आसमान छू चुकी है। ऐसे में किसानों को उनकी ज़मीन की असली कीमत का आधा भी नहीं मिल रहा। अनिल कहते हैं, “यह सिर्फ ज़मीन की लड़ाई नहीं है। यह किसानों की रोटी-रोज़ी और उनकी अस्मिता की लड़ाई है। खेतों में लहराती फसलों को रौंदा जाना, किसानों की उम्मीदों को कुचलने जैसा है। यह दृश्य किसी के भी दिल को झकझोर देगा-जहां एक ओर किसान अपने अधिकार के लिए खड़ा है, वहीं दूसरी ओर सत्ता उसके हक़ की आवाज़ को दबाने में लगी है।”

हालात यह हैं कि किसान अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं और दूसरी ओर उनकी मेहनत से खड़ी की गई फसलों को बेरहमी से रौंदा जा रहा है। खेतों में खड़े किसानों की आंखों में बेबसी है, लेकिन मन में आक्रोश भी। दुलहरा-चैनपुर गांव में पिछले दो दिनों से किसानों पर लाठियां बरसाई जा रही हैं। उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश हो रही है। वाजिब मुआवजा मांग रहे किसानों पर लाठीचार्ज से बिहार के गांव-गांव में तनाव है। लोग गुस्से और डर के बीच जी रहे हैं। किसान चाहते हैं कि कम से कम उनकी फसल पकने तक उन्हें राहत दी जाए, लेकिन अफसर उनकी गुहार सुनने को तैयार नहीं।

प्रशासन और किसानों की जद्दोजहद

प्रशासन और सरकार के नुमाइंदे किसानों पर लाठीचार्ज के पूरे घटनाक्रम पर सफाई दे रहे हैं। मोहानियां के एसडीएम अमित कुमार दावा करते हैं कि किसी किसान से मारपीट नहीं हुई है। प्रशासन केवल सरकार के आदेशों का पालन कर रहा है। जिन जमीनों का अधिग्रहण हुआ है उसका मुआवजा नियमों के मुताबिक दिया जाएगा। किसानों को गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए।”

फसल रौंदे जाने के बाद अपने खेत पर पहुंचा एक किसान।

वहीं, निर्माण कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक का कहना है कि उन्हें सरकार की तरफ से स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि तय समय सीमा में सड़क निर्माण पूरा करना है। कंपनी का दावा है कि “मुआवजा प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी है और किसानों के साथ किसी तरह की ज्यादती नहीं हो रही।”

सवाल यह है कि जब किसान अपनी आंखों से अपनी खड़ी फसल को बर्बाद होते देखते हैं, जब महिलाओं और बच्चों की चीखें खेतों में गूंजती हैं तब ये सरकारी बयान कितने सच्चे लगते हैं? किसानों का दर्द और बेबसी प्रशासनिक भाषा की पंक्तियों में कहीं खो जाती है।

किसानों का कहना है कि अगर सरकार सचमुच उनके साथ है तो पहले संवाद होना चाहिए, उनकी बातें सुनी जानी चाहिए और बाजार भाव पर न्यायसंगत मुआवजा दिया जाना चाहिए। मौके पर पहुंचे किसान नेता राम अवध सिंह ने अफसरों से बातचीत की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। उन्होंने कहा, “बिना संवाद और बिना न्याय, विकास केवल किसानों के आंसुओं पर खड़ा होगा। भारतमाला परियोजना के लिए कैमूर की उपजाऊ जमीनों पर बुलडोज़र तो चल रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास की यह रफ्तार किसानों के टूटे हुए सपनों और उजड़ी हुई जमीनों से होकर ही गुज़रेगी?”

विकास का सपना या किसानों की बर्बादी?

वाराणसी से कोलकाता तक को जोड़ने वाला छह लेन एक्सप्रेसवे भारतमाला परियोजना का अहम हिस्सा है। इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य देश के अलग-अलग हिस्सों को आपस में जोड़ना और यात्रा के समय को घटाना है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के रेवसा गांव से शुरू होकर यह मार्ग पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के उलुबेरिया तक जाएगा। परियोजना को 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है।

कुल 610 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से होकर गुजरेगा। इसका मुख्य उद्देश्य वाराणसी जैसे आध्यात्मिक नगर और कोलकाता जैसी सांस्कृतिक राजधानी को सीधा जोड़ना है। यह झारखंड की राजधानी रांची से भी गुजरेगा और एशियाई राजमार्ग-1 (ग्रैंड ट्रंक रोड) के समानांतर बनाया जाएगा।

इस सड़क के बनने से न केवल दो बड़ी राजधानियों के बीच की दूरी घटेगी, बल्कि यह अन्य प्रमुख एक्सप्रेसवे से जुड़कर पूरे देश की कनेक्टिविटी को मजबूत करेगा। इसके अलावा, यह मार्ग 18 बड़े शहरों से होते हुए स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी गति देगा। फिलहाल वाराणसी से कोलकाता की यात्रा में 12 से 14 घंटे लगते हैं। एक्सप्रेसवे बनने के बाद यह समय घटकर मात्र 6 से 7 घंटे रह जाएगा। दूरी भी मौजूदा 690 किलोमीटर से घटकर 610 किलोमीटर हो जाएगी। यात्रियों और व्यापारियों दोनों के लिए यह समय और ईंधन की बचत का बड़ा साधन होगा।

बिहार के अपर मुख्य सचिव का पत्र।

सरकार का दावा है कि एक्सप्रेस-वे से औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में नई जान फूंकी जाएगी। बेहतर कनेक्टिविटी से बाजार तक पहुंच आसान होगी और स्थानीय उत्पादों की मांग बढ़ेगी। करीब 35 हजार करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह एक्सप्रेसवे चार राज्यों में सामाजिक और आर्थिक विकास की गति बढ़ाएगा। निर्माण कार्य के दौरान हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा और सड़क के किनारे नई व्यावसायिक गतिविधियां शुरू होने की उम्मीद है।

चंदौली के 31 गांवों से गुजरेगा एक्सप्रेस-वे

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में प्रस्तावित मार्ग 22 किलोमीटर लंबा होगा। यह पीडीडीयू नगर तहसील के रेवसा स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) से शुरू होकर धरौली, बिहार बॉर्डर तक पहुंचेगा। इस बीच यह रेवसा, कठौड़ी, बरहुली, हिरामनपुर, लौदा, देबई और सदर तहसील के शाहपुर, मद्धुपुर, बहेरा, खुरुहुजा, शिवपुर, अकोढ़ा कला, चनहटा, चुरमुली, सिकंदरपुर, गोरारी, विशुनपुरा, गोवर्धनपुर, जगदीशपुर, नैनपुरा, हरनाथपुर, कांटा, परासी खुर्द, जलालपुर, टीरो, कोल्हई, बेदहा, सवैया महलवार, सवैया पट्टीदारी और धरौली समेत कुल 31 राजस्व गांवों से गुजरेगा। इसके आगे यह मार्ग बिहार के 90 गांवों से होकर निकलेगा।

यह परियोजना भारत सरकार की महत्वाकांक्षी भारतमाला योजना के अंतर्गत है। इस योजना का मकसद देश के सड़क नेटवर्क को मजबूत करना और राष्ट्रीय राजमार्ग व एक्सप्रेस-वे के जरिए इकोनॉमिक कॉरिडोर, इंटर-कॉरिडोर और फीडर रूट्स का विकास करना है। लक्ष्य यह है कि देश के सभी कोनों तक निर्बाध कनेक्टिविटी उपलब्ध हो सके।

भारत माला योजना में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक सड़क निर्माण, बंदरगाहों और समुद्री तटों को हाईवे नेटवर्क से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है। इसके अलावा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे का भी निर्माण होगा। योजना का लक्ष्य देश के 550 जिलों को चार से आठ लेन वाले हाईवे नेटवर्क से जोड़ना है। इसके तहत 50 हाईवे कॉरिडोर विकसित किए जाएंगे और माल ढुलाई की क्षमता को 70 से 80 प्रतिशत तक बढ़ाने की तैयारी है।

गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मिजोरम समेत विभिन्न राज्यों में तेज़ी से सड़क निर्माण कार्य चल रहा है। उद्देश्य है कि बेहतर परिवहन सुविधा उपलब्ध कराते हुए क्षेत्रीय आर्थिक विकास को प्रोत्साहन दिया जा सके।

पहले बनारस-कोलकाता एक्सप्रेसवे को आठ लेन का बनाने की योजना थी, लेकिन जमीन की कमी के कारण इसे घटाकर छह लेन कर दिया गया। इस दौरान भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास को लेकर कई विवाद सामने आए। खासकर चंदौली के रेवसा गांव में, जहां दलित समुदाय की तीन बस्तियों को उजाड़ने की तैयारी है।

सरकारी अधिसूचना में कहा गया है कि भारतमाला योजना सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की व्यापक परियोजना है, जिसका उद्देश्य पूरे देश में यात्री और माल यातायात को सुगम बनाना है। इस योजना का लक्ष्य 500 से अधिक जिलों को राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क से जोड़ना है, जिससे कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ-साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिल सके।

परियोजना की मुख्य विशेषताओं में सड़क की गुणवत्ता सुधारना, मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्कों से गलियारों की दक्षता बढ़ाना और अवरोधों को दूर करना शामिल है। साथ ही पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी को मजबूत करने और अंतर्देशीय जलमार्गों के साथ बेहतर तालमेल बनाने पर भी ध्यान है। इसके निर्माण, क्रियान्वयन और निगरानी में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग अहम माना गया है।

इस परियोजना में 9,000 किलोमीटर लंबे आर्थिक गलियारे, 6,000 किलोमीटर अंतर-गलियारा और फीडर सड़कें, 5,000 किलोमीटर राष्ट्रीय गलियारा दक्षता सुधार परियोजनाएं, 2,000 किलोमीटर सीमा और अंतरराष्ट्रीय संपर्क सड़कें, 2,000 किलोमीटर तटीय और बंदरगाह संपर्क सड़कें और 800 किलोमीटर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे शामिल हैं।

भविष्य की दृष्टि से यह योजना आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया को गति देने वाली साबित हो सकती है। प्रौद्योगिकी आधारित नियोजन से निगरानी और तैयारी अधिक प्रभावी होगी। खासकर पूर्वोत्तर में कनेक्टिविटी बढ़ने से पर्यटन, व्यापार और आधारभूत संरचना के विकास को नई दिशा मिलेगी।

पीड़ितों ने लगायी सरकार से गुहार।

यूपी के किसानों में भी असंतोष

अखिल भारतीय किसान सभा (आईपीएफ) के राज्य कार्यसमिति सदस्य अजय राय की बातों में गहरी पीड़ा झलकती है। वह कहते हैं, ” केंद्र सरकार ने भारतमाला परियोजना के लिए दलितों और किसानों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनाई है। इससे प्रभावित परिवारों के बीच भय और असंतोष का माहौल बन गया है। इस परियोजना के तहत भूमि अधिग्रहण में न केवल किसानों के अधिकारों का हनन हो रहा है, बल्कि भूमि अधिग्रहण कानून का भी खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और भाजपा सरकार किसानों को उचित मुआवजा देने के बजाय उन्हें भूमिहीन बनाने पर आमादा है।”

किसानों की जमीनों के मुआवजे के सवाल सिर्फ बिहार में ही खड़ा नहीं हुआ है। यूपी के चंदौली जिले के रेवसा, बरहुली, कठौरी, लौदा और हिरावनपुर जैसे गांवों में किसानों को उनकी उपजाऊ जमीन के बदले जो मुआवजा दिया जा रहा है, वह उनकी मेहनत और जिंदगी का अपमान है। अजय राय बताते हैं, “रेवंसा के किसानों को प्रति एकड़ मात्र ₹3.57 लाख, बरहुली के किसानों को ₹1.70 लाख, देवई के किसानों को ₹1.40 लाख और कठौरी के किसानों को ₹1.50 लाख का मुआवजा दिया जा रहा है। लौदा के किसानों को केवल ₹2.40 लाख प्रति एकड़ की दर से मुआवजा मिल रहा है। यह राशि बाजार मूल्य के सामने ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। यह किसानों के साथ छलावा है।”

सरकारी नियमों के अनुसार कृषि भूमि का न्यूनतम मूल्य ₹3 से ₹4 लाख प्रति एकड़ है। इसका चार गुना मुआवजा ₹12 लाख प्रति एकड़ होना चाहिए। जबकि चंदौली जैसे जिलों में वास्तविक बाजार दर ₹30 लाख प्रति एकड़ से कम नहीं है। ऐसे में किसानों का कहना है कि उन्हें प्रति एकड़ ₹1 करोड़ से अधिक मुआवजा मिलना चाहिए। अजय राय कहते हैं, “संसद द्वारा 2013 में बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत बाजार दर का चार गुना मुआवजा देना अनिवार्य है। साथ ही भूमि अधिग्रहण केवल अत्यधिक जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए होना चाहिए। लेकिन पिछले दस वर्षों में सर्कल रेट में कोई वृद्धि नहीं की गई। 2013 की दरों पर मूल्यांकन कर किसानों को मुआवजा दिया जा रहा है। यह सीधा अन्याय है।”

किसानों के लिए उनकी जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं है; यह उनकी पहचान, उनकी आजीविका और पीढ़ियों की मेहनत का प्रतीक है। बरहुली के किसान महेंद्र बिंद कहते हैं, “हमारी उपजाऊ जमीन, जो हमारी आजीविका का आधार है, बाजार दर के मुकाबले बेहद कम कीमत पर अधिग्रहित की जा रही है। यह हमारी मेहनत और भविष्य को नकारने जैसा है। इसके अलावा, अधिग्रहण नोटिस में बताई गई भूमि से अधिक क्षेत्र पर कब्जा किया जा रहा है। सरकार हमें धोखा दे रही है। उचित मुआवजा न देना हमारे शोषण का प्रमाण है।”

किसानों का कहना है कि भारतमाला परियोजना में भूमि अधिग्रहण न केवल उचित प्रक्रिया से नहीं हो रहा, बल्कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का खुला उल्लंघन भी हो रहा है। उनका मानना है कि सरकार को 2013 के सर्कल रेट को संशोधित कर बाजार मूल्य के अनुसार मुआवजा देना चाहिए। यह अन्याय केवल चंदौली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में किसानों के साथ हो रहा है। सरकार विकास के नाम पर उनके अधिकारों को कुचल रही है। किसानों के आंसुओं और बर्बादी पर विकास की इमारत खड़ी करने की यह कोशिश अमानवीय और निंदनीय है।

धरती की चीख़, विकास का मलबा

पूर्व जिला पंचायत सदस्य तिलकधारी बिंद कहते हैं, “सरकार को भूमि अधिग्रहण से पहले इसके सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन करना चाहिए था। पुनर्वास और मुआवजे की नीतियां प्रभावित समुदायों की जरूरतों और भविष्य को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए थीं। इस परियोजना की सफलता इसी पर निर्भर है कि इसे कितनी संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाता है।”

तिलकधारी का दर्द उनके शब्दों में साफ झलकता है, “वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे भले ही एक नई शुरुआत हो, लेकिन इसे वंचित समुदायों के आंसुओं पर नहीं लिखा जाना चाहिए। सरकार को समझना होगा कि जब एक बस्ती उजाड़ी जाती है, तो वहां के लोगों को फिर से बसने में कई पीढ़ियां गुजर जाती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन दलित परिवारों के बच्चों का भविष्य क्या होगा? वे कहां पढ़ेंगे, कहां बढ़ेंगे? “

“एक्सप्रेसवे का निर्माण ऐसा साधन होना चाहिए, जो लोगों का जीवन बेहतर बनाए। यह उन समुदायों की खुशियों और अधिकारों को कुचलकर नहीं होना चाहिए, जिनके पास पहले से ही बहुत कम है। सरकार ने पुनर्वास की कोई ठोस योजना क्यों नहीं बनाई? क्या इन गरीब किसानों और मजदूरों की जिंदगी का कोई मोल नहीं? “

तिलकधारी आगे कहते हैं, भूमि अधिग्रहण केवल जमीन लेना नहीं है, बल्कि यह परिवारों से उनकी पहचान, उनके सपने और उनकी मेहनत का फल छीन लेना है। जब तक सरकार मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया को ईमानदारी और संवेदनशीलता से लागू नहीं करती, तब तक यह परियोजना केवल कागज पर ही सफल दिखेगी, लेकिन वास्तविकता में यह प्रभावित समुदायों के लिए त्रासदी होगी।”

पूर्वांचल की मिट्टी से जुड़े किसान अब खुद को उजड़ता देख रहे हैं। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के चंदौली के अध्यक्ष आनंद सिंह कहते हैं, “भारत में औसत जोत आधे से दो एकड़ के बीच है, जबकि अमेरिका और यूरोप में यह सैकड़ों एकड़ है। यही वजह है कि भारत में उत्पादकता कम और गरीबी ज्यादा है। अब जब यह थोड़ी जमीन भी छीन ली जा रही है, तो किसान अपने भविष्य को लेकर गहरे संकट में हैं।”

“जमीन छीनने के हर कदम में पूंजीपतियों का हित जुड़ा है। किसानों को उचित मुआवजा नहीं मिला। भूमिहीन मजदूरों को तो कोई पुनर्वास भी नहीं दिया गया। मोदी सरकार ने साल 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को कमजोर कर दिया है। सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन और किसानों की सहमति जैसी अनिवार्यता हटा दी गई। इससे उद्योगपतियों को फायदा हुआ और किसानों का नुकसान।”

भाकियू नेता सतीश चौहान भी कहते हैं, “भारतमाला परियोजना के तहत दलितों और आदिवासियों की जमीन जबरन छीनी जा रही है। उनकी पीढ़ियों की मेहनत एक झटके में मिटा दी जा रही है। यह छलावा है। सरकार गरीबों की जमीन पूंजीपतियों को सौंप रही है। भाजपा सरकार का यह खेल नया नहीं है। सत्ता में बने रहने के लिए कारपोरेट घरानों को उपकृत किया जा रहा है। जो जमीन किसान की जान है, वही अब उद्योगपतियों का हथियार बन चुकी है। दलितों और आदिवासियों की बर्बादी इस विकास की कीमत बन चुकी है।”

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं।)

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