गंगा किनारे बसा वाराणसी जहां हर घाट, हर गली और हर मोड़ किसी न किसी कहानी का हिस्सा है। यह शहर जितना प्राचीन, उतना ही जीवंत है। मंदिरों की घंटियों के बीच, अगरबत्ती की खुशबू में, और ठेठ बनारसी बोली की मिठास में अनगिनत किस्से तैरते हैं। उन्हीं कहानियों में से एक हैं प्रतिभा सिंह। प्रतिभा एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने उन बच्चों के लिए रास्ता खोला जो कल तक कटोरा लिए “कुछ दे दो” कहते थे और आज वो अंग्रेजी में कविताएं सुनाकर सपनों की नई दुनिया रच रहे हैं।
सर्दियों की ठिठुरती सुबह थी। कोहरा घाटों पर उतर आया था और हवा में गंगा की नमी थी। प्रतिभा जब नटों की बस्ती में कंबल बांटने पहुंचीं, तो उनकी नजर एक छोटे बच्चे पर पड़ी-फटे पुराने स्वेटर में लिपटा गोपाल। ठंड से नीले पड़े होंठ, सूनी आंखें और हाथ में एक पुराना कटोरा। वह लोगों के पीछे-पीछे घूमते हुए बुदबुदा रहा था, “कुछ दे दो…।”
प्रतिभा ने झुककर पूछा, “गोपाल, तुम स्कूल क्यों नहीं जाते?”
गोपाल ने सिर झुकाए मासूमियत से कहा, “मैडम जी, स्कूल जाने से घर का पेट थोड़ी भर जाएगा। मम्मी कहती हैं पैसा ला, तभी खाना मिलेगा।”
यह जवाब प्रतिभा के दिल में किसी तीर की तरह धँस गया। उसी पल उन्होंने तय कर लिया कि अगर इस बच्चे के पास किताब नहीं है, तो किताब उसके पास जाएगी।
एक कमरे से शुरू हुई क्रांति
उसी शाम, शहर के एक छोटे से कमरे में पांच बच्चे इकट्ठा हुए-नेहा, नैना, पवन, शिवानी और गोपाल। जगह थी उर्मिला देवी फाउंडेशन का छोटा कमरा। कमरे में न लक्ज़री थी, न स्मार्ट ब्लैकबोर्ड। बस एक श्यामपट, कुछ स्लेट और प्रतिभा की दृढ़ आंखें।
उन्होंने स्लेट पर चॉक से ‘अ’ लिखा और कहा, “बच्चों, यह है ‘अ’। इसी से ‘अनार’ बनता है।”
नैना ने झिझकते हुए पूछा, “मैडम जी, अनार… वो लाल-लाल फल?”
प्रतिभा मुस्कुराईं, “हां, वही। और एक दिन तुम सब इतने पढ़ोगे कि दुनिया तुम्हें पहचान से जानेगी।”
वह क्षण साधारण नहीं था। वह उन बस्तियों में ज्ञान का पहला दीप जलने जैसा था, जहां अब तक अंधेरे ने ही ठिकाना बना रखा था।
बदलती ज़िंदगियों की आवाज़
धीरे-धीरे यह छोटा कमरा बच्चों के सपनों का आंगन बन गया। नेहा को अंग्रेजी कविताएं पसंद आने लगीं। एक दिन उसने आत्मविश्वास से खड़े होकर कहा-
“Twinkle, Twinkle, Little Star,
How I Wonder What You Are…”
कमरे में तालियों की गूंज उठी।शिवानी हंसकर कहती है, “पहले दादी मुझे भीख मांगने ले जाती थीं। अब कहती हैं, ‘जा, मैडम जी के पास पढ़ने जा।’ अब तो मन ही नहीं करता हाथ फैलाने का।”
पवन की कहानी और भी गहरी है। कभी वह घाटों पर फूल बेचता था, लोगों के चरणों में चढ़े मुरझाए फूल समेटता था। लेकिन अब जब वही बच्चा कॉपी-किताब लेकर बैठता है, तो उसकी आंखों में एक नई चमक दिखाई देती है। वह मुस्कुराकर कहता है, “मैडम जी, मैं बड़ा होकर टीचर बनूंगा ताकि और बच्चों को पढ़ा सकूं।”
अभावों के बीच उम्मीद की लौ
प्रतिभा के लिए यह सफर आसान नहीं था। कभी घर की रसोई में आटा कम पड़ा, तो कभी खुद के लिए दवा नहीं खरीदी, पर बच्चों की कॉपियां कभी नहीं रुकीं। एक दिन गोपाल ने पूछा, “मैडम जी, कल खाना कम था, फिर भी आपने हमें ज्यादा रोटियां क्यों दे दीं?”
प्रतिभा की आंखें भर आईं। उन्होंने बस इतना कहा, “बेटा, तुम्हारा पेट भरेगा तभी तुम्हारा दिमाग पढ़ाई में लगेगा।”
धीरे-धीरे समाज के लोग इस मुहिम से जुड़ने लगे। किसी ने यूनिफॉर्म दी, किसी ने फीस भरवाई, किसी ने कॉपियां दान कीं। कुछ स्कूलों ने दरवाजे खोले और कहा—“इन बच्चों की फीस हमारी ओर से।”
आज नेहा जैसी बच्चियां नामी स्कूलों में पढ़ रही हैं। वे मां-बाप जो कभी बच्चों को भीख मंगवाने पर मजबूर करते थे, अब कहते हैं,“हम तो अनपढ़ रह गए, पर हमारी बेटियां हमें भी समझा रही हैं कि पढ़ाई क्या होती है।”
प्रशासन से संघर्ष और समाज की उदासी
प्रतिभा कई बार प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर लगाती रहीं। कभी आवेदन, कभी फाइलें, कभी वादे। हर बार वही जवाब—“देखेंगे।” वह कहती हैं, “अगर सरकार सच में चाहे तो भिक्षावृत्ति खत्म हो सकती है। पर अब तक कोई भी हमारे साथ खड़ा नहीं हुआ।”
फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। हर सुबह जब उनकी पाठशाला में प्रार्थना होती है, तो पहले गायत्री मंत्र की गूंज होती है, फिर राष्ट्रगान, और फिर पढ़ाई शुरू होती है। बच्चे अब सवाल पूछते हैं, “मैडम जी, हम इंग्लिश में पोयम क्यों पढ़ते हैं?”प्रतिभा मुस्कुराकर जवाब देती हैं, “क्योंकि एक दिन तुम सब बड़े स्कूलों में जाओगे और आत्मविश्वास से बोलोगे।”
वो बस्तियां, जहां कभी शराब की बोतलें और सिक्कों की छनक सुनाई देती थी, अब वहां बच्चों की हंसी और किताबों की सरसराहट है। बनारस के नट बस्ती की औरतें कहती हैं, “मैडम जी ने हमारे बच्चों की किस्मत बदल दी। पहले हम समझते थे पढ़ाई अमीरों का खेल है, अब हमारे बच्चे हमें भी अक्षर सिखाते हैं।”
लंबी जंग, अधूरी मंज़िल
प्रतिभा का सफर फिर भी अधूरा है। अब भी सैकड़ों बच्चे सड़कों पर हैं-नंगे पांव, सूनी आंखों के साथ, जिनकी हथेलियां फैली हुई हैं। कई गोपाल, कई नेहा, कई पवन अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। प्रतिभा कहती हैं, “यह जंग लंबी है। लेकिन उनके विश्वास की लौ बुझी नहीं। उनके लिए हर बच्चे का मुस्कुराना, हर नया अक्षर, हर नई कविता-एक जीत है।”
बनारस की समाजसेवी भारती मिश्रा कहती हैं, “आज के बच्चे मोबाइल और टीवी की चकाचौंध में उलझ रहे हैं, संस्कार और जीवन-मूल्य धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं। दूसरी तरफ, गरीब परिवारों के बच्चे भूख और मजबूरी से शिक्षा से दूर हो रहे हैं। ऐसे समय में जब कोई महिला अपने घर के आंगन को पाठशाला बना दे तो यह कोई साधारण बात नहीं। यह त्याग, सेवा और समर्पण की जीवंत मिसाल है। प्रतिभा ने सिर्फ अक्षर नहीं सिखाए, बल्कि उन बच्चों के जीवन में उम्मीद की लौ जलाई है, जिन्हें समाज अक्सर किनारे कर देता है।”
वह आगे जोड़ती हैं, “प्रतिभा सिंह ने साबित कर दिया है कि जब तक समाज में संवेदनशील लोग हैं, तब तक न सिर्फ शिक्षा बल्कि संस्कार भी अगली पीढ़ी तक पहुंचते रहेंगे। उनका यह काम केवल बच्चों का नहीं, पूरे समाज का भविष्य गढ़ने जैसा है। जब बाजारवाद और लाचारी बच्चों का बचपन निगल रही हो, ऐसे दौर में प्रतिभा का कार्य मील का पत्थर है।”
तपस्या के समान प्रयास
बालवाड़ी का निरीक्षण करने पहुंचे जगदीश त्रिपाठी कहते हैं, “प्रतिभा जी ने जो जिम्मेदारी उठाई है, वह किसी आंदोलन से कम नहीं। जिन हाथों ने अब तक भीख मांगी, उन्हें कलम पकड़ना सिखाना आसान नहीं। यह कार्य साधना और तपस्या का रूप है।”
वह आगे कहते हैं, “शिक्षा का असली उद्देश्य केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि इंसान को संस्कारवान बनाना है। प्रतिभा जिस तरह हर सुबह बच्चों से मंत्रोच्चारण और प्रार्थना करवाती हैं, वह उन्हें आत्मबल देता है। आने वाले कल में यही बच्चे समाज की रीढ़ बनेंगे। जब ये बच्चे अच्छे संस्कारों के साथ बड़े होंगे, तभी भविष्य सुरक्षित होगा। उनकी बातों में सच्चाई झलकती है, क्योंकि इन बच्चों के चेहरों पर अब डर नहीं, आत्मविश्वास है।”
प्रतिभा सिंह की बालवाड़ी में करीब 44 बच्चों का दाखिला हुआ है और इतने ही बच्चे यहां से पढ़कर दूसरे अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों में पढ़ रहे है। इन सभी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्च प्रतिभा ही उठाती हैं। शिक्षकों का वेतन भी देती हैं। कई बार उनके पास पैसे नहीं होते। फिर भी किसी के आगे हाथ नहीं फैलातीं। सरकार से भी कोई मदद नहीं लेती।
प्रतिभा कहती हैं, “कुछ दानदाता हर महीने इन बच्चों की पढ़ाई के लिए कुछ सामान और खाद्य सामग्री दे जाते हैं। कोई पाठ्य पुस्तकें दे जाता है तो कोई स्कूली ड्रेस। हम अपने बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल बनाना चाहते हैं, जहां भिक्षावृत्ति के दलदल में फंसे बच्चे पढ़ें और अपना भविष्य संवारें।”
बनारस में जब शाम ढलती है और गंगा के घाटों पर दीपों की कतारें जगमगाने लगती हैं, उसी समय इन बच्चों की आंखों में भी एक नई रोशनी जल उठती है। गोपाल, नेहा, नैना, पवन, शिवानी-जो कभी भूख और मजबूरी से भीख मांगते थे, अब कहते हैं, “हम पढ़ना चाहते हैं, हम सपने देखना चाहते हैं, हम जीना चाहते हैं।”
उनके इस परिवर्तन की धड़कन हैं प्रतिभा सिंह, जिन्हें बच्चे प्यार से “मैडम जी” कहते हैं। उनकी यह यात्रा बताती है कि जब तक समाज में एक भी संवेदनशील दिल बाकी है, तब तक अंधेरे में भी उम्मीद की लौ जल सकती है।
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं।)