25 जुलाई की रात। ग्यारह बज चुके हैं। मैं मंजू के साथ जंतर-मंतर पर बैठा हुआ हूँ। हमारे चारों ओर हज़ारों युवाओं की भीड़ है। यह भीड़ नारे लगा रही है, खिलखिला रही है, हँस रही है। हमारे ठीक सामने से युवाओं का एक जत्था एक बहुत बड़े केक को अपने हाथों में ऊपर की ओर उठाए तेज़ी के साथ मंच की तरफ़ बढ़ रहा है।
क्या आज उनमें से किसी का जन्मदिन है, जिसे मनाने के लिए वे इतने बड़े आकार का केक बनवा कर लाए हैं? ये युवा आज लोकतंत्र का जन्मदिन मना रहे हैं—वह लोकतंत्र, जिसके पैदा होने की उम्मीद पिछले 11 सालों से की जा रही थी। आज की जीत में ये युवा लोकतंत्र को फिर से पैदा होते हुए देख रहे हैं। एक ऐसा लोकतंत्र, जिसकी प्रसव-पीड़ा इन्होंने पिछले अनेक दिनों से सही है। इनकी समझ में आज लोकतंत्र पैदा हुआ है, इसलिए ये केक काटकर जश्न मना रहे हैं।
यहाँ पर दिखता हर युवा ऐसे चल रहा है मानो किसी के अहंकार को अपने जूते से ठोकर मार रहा हो।
जंतर-मंतर पर बैठा मैं लोकतंत्र के बाग़ को हरा होता हुआ देख रहा हूँ। हिंदी सिनेमा के भदेस गानों पर नाचने वाला युवा, आज लोकतंत्र की जीत पर नाच रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र और किसी लोकतांत्रिक व्यक्ति के लिए ऐसा पल उसकी ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत पलों में से एक होता है।
इसी तरह के पलों की कल्पना करके फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लिखा था :
“जब तख़्त गिराए जाएँगे, जब ताज उछाले जाएँगे” I
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने उस पल की कल्पना की थी, लेकिन यहाँ तो किसी का तख़्त छीन लिया गया है और किसी अहंकारी के ताज को हर नारे के साथ हवा में उछाला जा रहा है। ये युवा लोकतंत्र का जश्न मना सकें, इसके लिए इन्होंने लाठियाँ खाईं, आँसू गैस के गोले और पेलेट गन की गोलियाँ झेलीं। इस जश्न के लिए इन्होंने ‘देशद्रोही’ कहे जाने का अपमान सहा।
“जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ, रुई की तरह उड़ जाएँगे”
शासकों का ज़ुल्म और उनका अहंकार चाहे जितना भी भारी और पहाड़ जैसा अटूट क्यों न दिखाई दे, वह शाश्वत नहीं होता। जब जनता में चेतना और इंक़लाब की लहर उठती है, तो अत्याचार का वह विशाल पहाड़ रुई के फाहे की तरह हल्का होकर हवा में उड़ जाता है। जनता की ऐसी ही ताक़त को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी नज़्म में व्यक्त किया है। ‘कोह-ए-गिराँ’ यानी मज़बूत पहाड़। इस समय मेरी आँखों के सामने ये नौजवान किसी के पहाड़ जैसे मज़बूत अहंकार को कागज़ के जहाज़ की तरह हवा में उड़ा रहे हैं।
यह अहंकार के टूटने और लोकतांत्रिक विश्वासों के बनने का क्षण है। इस समय मैं ऐसे ही एक क्षण का साक्षी बन रहा हूँ—एक ऐसा क्षण जब:
“महकूमों के पाँव तले धरती धड़-धड़ धड़केगी”
और “अहल-ए-हकम के सर ऊपर बिजली कड़कड़ कड़केगी”
‘महकूम’ यानी दबी-कुचली और शोषित जनता। इस क्षण महकूमों के एकजुट होने और सड़क पर उतरकर अपने अधिकारों के लिए एक साथ क़दम बढ़ाकर चलने की आवाज़ से उनके पाँव के नीचे की ज़मीन काँप रही है। इस कंपन ने सत्ताधीशों के दिल में वैसा डर पैदा कर दिया है, जो सिर के ठीक ऊपर बिजली कड़कने से पैदा होता है।
20 जुलाई के दिन भी मैं जंतर-मंतर पर था। इन दो दिनों में मुझे यहाँ जनता दिखाई दी—वह जनता, जिससे उसका ‘जनता होना’ छीन लिया गया था। वही जनता, अब फिर से जनता हो रही थी। इस जनता के पास अपने मुद्दे थे—ठोस और सच्चे मुद्दे। इसीलिए हुक्मरान डरे हुए थे कि जिस जनता को अरबों रुपये ख़र्च करके “भक्त” बनाया गया था, वह कहीं फिर से जनता न बन जाए।
यह बात काबिलेतारीफ़ है कि धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने कहा कि इस काम के लिए उन्हें हीरो मत बनाइए I क्योंकि यह देश एक व्यक्ति को हीरो बनाने की सजा भुगत रहा है I
हमें याद रखना चाहिए कि 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर ने भारत को सावधान किया था कि लोकतंत्र में ‘भक्ति’ बर्बादी की तरफ़ बढ़ने का रास्ता है। फ़िलहाल के लिए ही सही, लेकिन वहाँ जंतर-मंतर पर बैठकर ऐसा लग रहा था कि लोगों को “भक्त” बनने के बुरे प्रभावों के बारे में कुछ तो पता चल गया है।
जनता को फिर से जनता बनते देखकर सत्ताधीशों को कितनी तकलीफ़ हुई होगी, इस बात को बीबीसी का एक कार्टून बहुत अच्छी तरह से व्यक्त करता है जिसमें एक नेता मीडिया से कह रहा है, “बेहद तकलीफदेह है ये सब। जात-पात और धर्म की राजनीति के बीच शिक्षा और छात्रों के मुद्दों से मुझे घुटन और बेचैनी हो रही है।”
इनको घुटन हो रही है। इनको इस बात से घुटन हो रही है कि नौजवान अपने मुद्दों की बात क्यों कर रहे हैं। इनको तकलीफ़ इस बात की है कि नौजवान हिंदू-मुसलमान के कृत्रिम मुद्दों की गिरफ़्त से बाहर कैसे निकल गए? इनको तकलीफ़ है कि इनके उठाए हुए ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘पापुलेशन जिहाद’, ‘यूपीएससी जिहाद’ जैसे फेक नैरेटिव काम नहीं कर रहे हैं। इसी तरह के नेताओं के लिए धूमिल ने लिखा था:
“ख़बरदार! उसने तुम्हारे परिवार को नफ़रत के उस मुक़ाम पर ला खड़ा किया है कि कल तुम्हारा सबसे छोटा लड़का भी तुम्हारे पड़ोसी का गला अचानक अपनी स्लेट से काट सकता है।”
उसने छोटे बच्चों तक को नफ़रत का वह पाठ पढ़ा दिया—ऐसा पाठ कि वे अपनी पढ़ाई का उपयोग अपने और अपने क़रीबी लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने में कर रहे हैं। यहाँ जंतर-मंतर पर युवा नफ़रत की पाठशाला और उसके प्रिंसिपल की सिखाई बातों को नकारते हुए एक-दूसरे के साथ जुड़ रहे हैं, एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं।
इसी बीच ख़बर आई है कि उसने युवाओं को “फ़्रेंड्स” कहा है। तो युवाओ! ऐसा तो नहीं कि उसकी आँखों में दिखने वाला “भाईचारा” आपके चेहरे की हरियाली को चाट जाने के लिए हो? लेकिन इस पर तो आपको ही सोचना है। जिस वक़्त आपको “दोस्त” कहा जा रहा है, ठीक उसी वक़्त उसके मस्तिष्क में एक भेड़ की तस्वीर उभरती है, जो कि आप हैं। और “दोस्त” बोलने वाले को भेड़ की पीठ पर उगी हुई ऊन दिख रही है, जिससे वह अपनी ठंड दूर करेगा।
इसलिए “उनके साथ दोस्ती नहीं, जो नहीं जानते कि दोस्ती होती क्या है।” जिस वक्त वो आपको दोस्त कह रहा है, उस वक्त मैं उसके मुँह में भर आई लार को देख पा रहा हूँI उसे अब भी भरोसा है कि “भेड़ों” की पीठ पर उगी हुई ऊन को वो अब भी पा सकता है I
युवाओं को अभी क्या-क्या करना है
जंतर-मंतर पर बैठे हुए मैं यह भी सोच रहा था कि इन युवाओं के लिए शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा तात्कालिक मुद्दा होना चाहिए I क्योंकि इनके सामने शिक्षा के ज्यादा गंभीर मुद्दे जस के तस खड़े हैं। उनमें से सबसे बड़ा और व्यापक मुद्दा शिक्षा को प्राइवेट हाथों में सौंपने का हैI अब हायर एजुकेशन तो छोड़िए, प्राइमरी और प्री-प्राइमरी एजुकेशन का बहुत तेजी के साथ निजीकरण किया जा रहा हैI
निजीकरण का सबसे बुरा असर गरीब तबके पर पड़ रहा हैI उनमें से भी लड़कियों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ रहा हैI क्योंकि आज भी अधिकांश परिवार लड़कियों की शिक्षा पर खर्च नहीं करतेI इसलिए भारत की आधी आबादी की शिक्षा के लिए, शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी खर्च को बढ़ाना बेहद जरुरी हैI और इसके लिए युवाओं को सरकारों पर दवाब बढ़ाना होगाI
आपको खोजना होगा कि केंद्र सरकार ने शिक्षा के बजट में 44% की कटौती क्यों की है? 2014 में शिक्षा का बजट केंद्र सरकार की जीडीपी का 0.66% था, जिसे 2024 में घटाकर महज 0.37% कर दिया गया। इसका अर्थ यह है कि 2014 की तुलना में 2024 में, जीडीपी के संदर्भ में शिक्षा के बजट में 44% की कटौती की गई है।
आपको यह भी जानना होगा कि केंद्र सरकार ने अपने कुल बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी को क्यों 46% कम किया है? 2014-15 में शिक्षा को केंद्र सरकार के कुल बजट का 4.6% मिला था, जिसे 2024-25 में काफी कम करके मात्र 2.5% दिया गया। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि 2014 से 2024 के 10 सालों में सरकार ने कुल बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी को 46% कम कर दिया है।
ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें जानकर आप अपनी लड़ाई को और भी व्यापक और जनपक्षीय बना सकते होI
नई शिक्षा नीति – 2020 की नीतियों के कारण भी शिक्षा के निजीकरण को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है I इसलिए युवाओं के सामने यह एक जरुरी काम है कि वे इस नीति को आलोचनात्मक नजरिये से समझेंI यह समझें कि इस नीति ने भारत का कितना और किस-किस रूप में नुकसान किया हैI
यही वो नीति है जो आपको वो नहीं होने देना चाहती, जो जंतर-मंतर के प्रोटेस्ट के दौरान आप हो गये I आप आपस में एक दूसरे के साथी हो गयेI और साथी होते हुए आपने किसी से उसका धर्म नहीं पूछाI बस आप साथी हो गयेI नई शिक्षा नीति नहीं चाहती कि आप साथी बने, साथी बनाएंI यह नीति बंटवारे की नीति हैI कैसे है? यही तो आपके लिए एक जरुरी काम है, जो अभी करना बाकी हैI
यहां जंतर-मंतर पर अनेक लोगों के हाथ में ऐसे प्ले-कार्ड हैं जिन पर लिखा हुआ है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को भंग किया जाएI यह सही है कि यह एजेंसी पैसा कमाने और उसका एक भाग सत्ताधारी दल को देने के लिए बनाई गयी होगी! ताकि उस पैसे का उपयोग गैर-लोकतान्त्रिक हरकतों को अंजाम देने के लिए किया जा सकेI लेकिन इस एजेंसी को इसलिए भी रद्द किया जाना चाहिए क्योंकि यह देश के फेडरल ढांचे को भी सूट नहीं करताI हर राज्य की मेडिकल जरूरतों के अनुसार उसको अपने टेस्ट कंडक्ट करवाने की आजादी होनी चाहिएI
एक और मुद्दा है जिसे कॉकरोच जनता पार्टी ने तो नहीं उठाया लेकिन वहां बैठे आइसा, एसएफआई और केवायएस जैसे विद्यार्थी संगठन उठा रहे थेI लेकिन वो मुद्दा बेहद महत्त्वपूर्ण हैI और वो मुद्दा है शिक्षा को आरएसएस की सोच से आजाद करवानाI वो सोच जो अ-लोकतान्त्रिक, दकियानूसी, साम्प्रदायिक, वैज्ञानिक चेतना विरोधी, तर्क विरोधी, तथा संविधान विरोधी हैI ये तमाम आरएसएस की सोच की विशेषताएं हैंI इसलिए युवाओं की आगे की राह जन्तर-मंतर से भी कठिन है क्योंकि उस राह पर चलकर उन्हें शिक्षा के हर पहलू को संवैधानिक मूल्यों से ओतप्रोत करना होगाI
जंतर-मंतर पर केक काटकर मनाया जाने वाला यह जश्न केवल एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं। युवाओं ने अपनी एकजुटता से ‘अहंकार के पहाड़’ को रुई की तरह उड़ाकर यह साबित कर दिया है कि जब जनता ‘भक्त’ होने की केंचुल उतारकर फिर से ‘सच्ची जनता’ बनती है, तो सत्ता की नींव हिल जाती है।
लेकिन असली चुनौती इस जीत को टिकाऊ बनाने की है। युवाओं की आगे की राह जंतर-मंतर के इस विरोध प्रदर्शन से भी कहीं अधिक कठिन है। उन्हें अब शिक्षा के निजीकरण, बजट में की गई भारी कटौती (44-46%) और एनईपी-2020 जैसी नीतियों के खिलाफ एक लंबी वैचारिक लड़ाई लड़नी होगी।
सच्ची जीत तब होगी जब शिक्षा केवल मुनाफ़े का साधन न रहकर एक सार्वजनिक अधिकार बने और उसे साम्प्रदायिक व वैज्ञानिक चेतना विरोधी सोच के चंगुल से आज़ाद कराया जा सके। युवाओं को उस ‘भाईचारे’ के पीछे छिपी सत्ता की लार को पहचानना होगा जो उन्हें ‘नागरिक’ के बजाय केवल ‘भेड़’ समझती है। जंतर-मंतर की यह रात लोकतंत्र के पुनर्जन्म की गवाह बनी है, लेकिन इस लोकतंत्र को जीवित रखने की ज़िम्मेदारी अब उन युवाओं के कंधों पर है जो धर्म और नफ़रत के कृत्रिम मुद्दों को नकार कर एक-दूसरे के ‘साथी’ बन चुके हैंI
(बीरेंद्र सिंह रावत का लेख। रावत दिल्ली-विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग से संबद्ध थे।)