महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले शुरू की गई “मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन” (मुख्यमंत्री मेरी लाड़ली बहन) योजना का लाभ बारह हज़ार से ज़्यादा पुरुषों (12431) को भी मिला!
यह जानकारी इंडियन एक्सप्रेस ने सूचना के अधिकार के जरिए जुटाई है।
चुनावी लाभ पाने के लिए पिछले साल पिछली एकनाथ शिंदे सरकार की शुरू की गई योजना के तहत 21 से 65 वर्ष की आयु की महिलाओं, पारिवारिक आय ढाई लाख (वार्षिक) से कम, को प्रति माह 1500 रुपए प्रतिमाह दिए जाने शुरू किए गए थे। योजना के तहत आज की तारीख में दो करोड़ 41 लाख महिलाओं को 3700 करोड़ रुपये प्रति माह दिए जा रहे हैं।
महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अनुसार अब लाभार्थियों की सूची से पुरुषों को हटा दिया गया है लेकिन जुलाई 2025 तक यानि 13 महीने इन्हें पैसे दिए गए।
इसके अलावा महीनों तक 77, 980 अपात्र महिलाओं को भी इस योजना का लाभ मिलने की सूचना है।
अपात्र महिलाओं और पुरुषों को योजना के तहत पैसे बांटने से सरकारी खजाने को एक साल में लगभग 165 करोड़ रुपए की चपत लगी है।
योजना जून 2024 में लागू की गई थी। विधानसभा चुनावों से चार महीने पहले शुरू की गई इस योजना के केवल प्रचार पर 200 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे।
यह भी पता चला है कि बहती गंगा में हाथ धोने के लिए योजना का अनुचित लाभ 2400 सरकारी कर्मचारियों ने भी उठाया। अब सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है।
यह स्पष्ट नहीं है कि गलत तरीके से बांटे गए पैसे की वसूली कैसे की जाएगी या की जाएगी भी या नहीं।
चुनाव जीतने के लिए चुनाव से ऐन पहले महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए पैसे बांटने का यह खेल भाजपा नीत एनडीए ने अब बिहार में दोहराया है जहां स्वरोजगार के लिए महिलाओं के खातों में दस-दस हजार रुपए डालने के बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया गया।
कुल मिलाकर क्या यह कहना गलत होगा कि यह एक तरह से घोटाला ही है? चुनाव से पहले सत्तारूढ़ पार्टी/गठजोड़ का वोट पाने के लिए सरकारी खजाना लुटाना क्या जनता के साथ छल नहीं है?