ब्राह्मणवादी आचार संहिता बनाम संवैधानिक नैतिकता: जाति सर्वोच्चता बनाम संवैधानिक बराबरी 

(इन तरह के प्रयासों से संघ परिवार संविधान की वैधता पर प्रश्न लगा कर सामाजिक समावेशन और आरक्षण जैसे उपायों को निरस्त करने की दिशा में बढ़ रहा है। इसमें यह कोशिश है कि सामाजिक श्रेणी क्रम (वर्ण-जाति आधारित श्रेणीक्रम) को कानूनी मान्यता दी जाए।)

अक्टूबर, 2025 में तीन अलग-अलग वारदातें व्यापक बहस और आक्रोश का मुद्दा बनीं। पहली वारदात 2 अक्टूबर को हरिओम वाल्मीकि की निर्मम हत्या, दूसरी वारदात 6 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई पर हमला, और तीसरी वारदात 7 अक्टूबर को हरियाणा के आईपीएस अधिकारी वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या के रूप में सामने आई। इन तीनों वारदातों को दो सूत्र आपस में जोड़ते हैं। पहला, तीनों में पीड़ित दलित थे; और दूसरा, इन घटनाओं के बाद एक संगठित प्रयास यह दिखाने का किया गया कि इनमें जाति की कोई भूमिका नहीं थी, बल्कि ये “खास परिस्थितियों” के परिणाम थे।

भारतीय राज्य और मुख्यधारा की मीडिया के बड़े हिस्से ने इन तीनों वारदातों को इस तरह पेश किया जैसे इन वारदातों में जाति के कारक की भूमिका बहुत कम रही हो, परिस्थितिजन्य कारण मुख्य थे। इस प्रक्रिया में इन घटनाओं के वास्तविक कारणों को छिपाने की कोशिश की गई। इस तरह इन वारदातों को अप्रत्यक्ष तरीके से ही सही परिस्थितियों के आधार पर जायज ठहराने की कोशिश की गई। 

हरिओम वाल्मीकि के मामले में यह तर्क दिया गया कि वह मानसिक तौर पर बीमार था और उसे चोर समझ गलती से मार दिया गया। मुख्य न्यायाधीश गवई के मामले में उनकी पुरानी टिप्पणी (भगवान की खंडित मूर्ति) के आधार पर जायज ठहराने की कोशिश हुई। दलित आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार के मामले में भ्रष्टाचार के आधार पर इसे तर्कसंगत ठहराने की कोशिश हुई। इन तीनों मामले में परिस्थितियों को मुख्य कारण चिन्हित किया गया। पूरन कुमार के मामले में आत्महत्या से पहले उनके द्वारा लिखे गए आठ पन्नों के सुसाइड नोट को चर्चा का मुख्य विषय नहीं बनाया गया। जिस नोट में उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को अपनी आत्महत्या के लिए दोषी ठहराया था। जिसमें हरियाणा के डीजीपी भी शामिल थे।

इस नोट में जातिगत भेदभाव, मानिसक उत्पीड़न, सार्वजनिक तौर पर अपमान और अत्याचार के आरोप लगाए गए थे। गवई के मामले में उस नारे को भुला देने की कोशिश की गई, जिसमें जूता फेंकने वाले ने लगाए थे। जो एक निश्चित विचारधारा से प्रेरित थे। इस व्यक्ति के जूता फेंकने और नारे के समर्थन में गवई के खिलाफ घृणित और जातिवादी अभियान चलाया गया। हरिओम वाल्मीकि के मामले में साफ तौर पर रायबरेली के पुलिस अधीक्षक ने कहा कि वाल्मीकि की हत्या के मामले में कोई जातिगत एंगल और मकसद नहीं था। उन्होंने इसके साथ यह भी धमकी दी कि जो कोई इस मामले में जातिगत एंगल और मकसद की बात करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सवाल यह है कि यदि हरिओम वाल्मीकि के आगे किसी तथाकथित ऊंची जाति का सरनेम होता, तो उसकी इतनी बेरहमी से हत्या की जाती? यह वारदात तब भी ज़रूर ही होती?

कई सारे लोगों ने यह कहा कि ये घटनाएं भारतीय समाज में जाति की मजबूत उपस्थिति और उसकी निरंतरता का साक्ष्य हैं। परंतु इनका इस तरह सामने आना इस बात का संकेत है कि पिछले 75 वर्षों में संविधान के चलते जो आधा-अधूरा लोकतांत्रीकरण हुआ था, उसे पलटने का प्रयास हो रहा है। यह उन प्रतिक्रियावादी सामाजिक शक्तियों के पुनरुत्थान का संकेत है, जो एक समानांतर (अ) न्याय प्रणाली थोपना चाहती हैं। संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में बीआर आंबेडकर ने जिस ‘विरोधाभास के जीवन’ की चेतावनी दी थी। वह विरोधाभास कभी सुलझ नहीं सका। जिसके चलते भारत में दो तरह की वैधानिकताएं एक साथ ही समानांतर रूप से मौजूद रही हैं। संवैधानिक नैतिकता और ब्राह्मणवादी आचार शास्त्र।

संवैधानिक नैतिकता के लागू करने मामले में राज्य की संवैधानिक संस्थाओं ने जो ढिलाई बरती उसके चलते ब्राह्मणवादी आचार संहिता को लागू करने की चाहत रखने वाली शक्तियों को ताकत मिली। इसके चलते जातिगत सर्वोच्चता की भावना को “जातिगत अंधता” के रूप में सामने आने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है। हाल की वारदातें यह संकेत करती हैं कि राज्य की संवैधानिक संस्थाओं की लापरवाही अब वैचारिक रूप ले चुकी हैं। इसके चलते जाति आधारित भेदभाव, बहिष्कार और हिंसा के प्रति एक सचेत और योजनाबद्ध उदासीनता सामने आ रही है। 

जब एक केंद्रीय मंत्री (स्मृति ईरानी) यह तर्क देता है कि संस्थागत उत्पीड़न के बाद आत्महत्या करने वाले दलित छात्र (रोहित बेमुला) की मृत्यु को “जातिगत भेदभाव” नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि वह छात्र (रोहित बेमुला) एक अंतर्जातीय विवाह करने वाले दंपति का बेटा था। जब हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान समय में केंद्रीय मंत्री (मनोहर लाल खट्टर) यह अपील करते हैं कि पूरन कुमार की आत्महत्या को “ जातिगत मुद्दा” न बनाया जाए। इन चीजों के पीछे एक निहित संकेत है कि पूर्वाग्रहों (जातिगत) से प्रेरित अपराधों को “बिना किसी उद्देश्य की वारदातें” घोषित कर दिया जाए। ताकि वे कानूनी प्रक्रिया में धीरे-धीरे समाप्त हो जाएं। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की क्राइम इन इंडिया 2023 रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज मामलों की संख्या लगातार बढ़ी है, परंतु सजा की दर बेहद कम रही है। न्यायालयों में लंबित कुल मामलों में से केवल 1.68% मामलों में ही 2023 में दोष सिद्ध हुआ। यह संस्थागत उदासीनता की हिमशिला का केवल ऊपरी हिस्सा है। जो हर बार जाति की उपस्थिति के इनकार और टालमटोल से और सुदृढ़ हुई है।

न्यायमूर्ति गवई पर हुआ हमला शारीरिक क्षति पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि अपमानित करने के लिए था। यह कृत्य सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक भाषा में व्यक्त किया गया। जिसमें हमलावर की जातिगत पहचान, उसकी विचारधारात्मक निष्ठा, और न्यायमूर्ति गवई को उस वस्तु ( जूते से) से निशाना बनाना शामिल था, जिसे ब्राह्मणवादी संहिताएं “अशुद्ध” मानती हैं। इस घटना का उद्देश्य स्पष्ट है। मुख्य न्यायाधीश ने “उदारता” दिखाते हुए हमलावर को क्षमा कर दिया, जबकि अटॉर्नी जनरल ने उसके खिलाफ अदालती अवमानना की अनुमति दी। पहले दृष्टिकोण में इसे व्यक्ति पर हमला माना गया, जबकि दूसरे में संस्था पर। परंतु दोनों ही दृष्टिकोण जाति की केन्द्रीयता और इसे लागू करने के संगठित प्रयासों को नजरअंदाज करते हैं।

इन तरह के प्रयासों से संघ परिवार संविधान की वैधता पर प्रश्न लगा कर सामाजिक समावेशन और आरक्षण जैसे उपायों को निरस्त करने की दिशा में बढ़ रहा है। इसमें यह कोशिश है कि सामाजिक श्रेणीक्रम (वर्ण-जाति आधारित श्रेणीक्रम) को कानूनी मान्यता दी जाए। संघ परिवार के इन प्रयासों को नकारना इसके पीछे की राजनीतिक और संगठित पृष्ठभूमि को नकारना है। यह नकार “ नए भारत” की जाति-अंधता की रेत में सिर गाड़ लेने जैसा है। यह मान लेने जैसा है कि जाति अब मौजूद नहीं है। 

(EPW, संपादकीय (18 अक्टूबर, 2025) अनुवाद-सिद्धार्थ रामू)

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