प्रभावशाली सिनेमा केवल तकनीक से नहीं, बल्कि दृष्टि, संवेदना और फ्रेम की समझ से निर्मित होता है : कौस्तुभ मुखर्जी

नई दिल्ली। प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर एवं विजुअल स्टोरीटेलर कौस्तुभ मुखर्जी के अनुसार प्रभावशाली सिनेमा केवल तकनीक से नहीं, बल्कि दृष्टि, संवेदना और फ्रेम की समझ से निर्मित होता है।

मुखर्जी न्यू दिल्ली फ़िल्म फाउंडेशन द्वारा आयोजित मासिक सिनेमा संवाद श्रृंखला ‘टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के जुलाई चैप्टर के अवसर पर बोल रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी तथा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट स्किल काउंसिल के सहयोग से शनिवार को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स, लाजपत नगर में हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए एनडीएफएफ के आशीष सिंह ने कहा कि एनडीएफएफ का उद्देश्य सार्थक सिनेमा के लिए एक जीवंत संवाद और सीखने की संस्कृति विकसित करना है।

मुखर्जी ने विज़ुअल स्टोरीटेलंग एंड विज़ुअल कम्युनिकेशन के दो महत्वपूर्ण पक्षों दर्शक और फिल्मकार पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा किसी दृश्य को देखने का हर दर्शक का अपना दृष्टिकोण होता है और सिनेमा की यही खूबसूरती है कि एक ही फ्रेम अलग-अलग लोगों में अलग-अलग अर्थ और भावनाएँ पैदा कर सकता है। उन्होंने अच्छी सिनेमैटोग्राफी कैमरे से पहले ऑब्ज़र्वेशन से शुरू होती है और प्रभावशाली दृश्य लेखन ही दर्शकों को कहानी से गहराई से जोड़ता है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में वरिष्ठ सिनेप्रेमी एवं सिनेविद् संदीप पाहवा ने दिल्ली की बदलती सिनेमा संस्कृति, दर्शकों के अनुभव तथा सिंगल स्क्रीन से लेकर ओटीटी युग तक के सफर पर अपने संस्मरण और विचार साझा किए।

उन्होंने खासकर भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर से जुड़ी दुर्लभ स्मृतियाँ और अनुभव साझा किए। दिल्ली में सिंगल स्क्रीन के दौर के सिनेमा के बारे में कई रोचक जानकारियों के साथ-साथ उन्होने मुंबई और इंडस्ट्री के बारे में कई दिलचस्प जानकारियां दीं। उन्होंने कहा कि पहले सिनेमा समाज के हर वर्ग का साझा सांस्कृतिक अनुभव हुआ करता था, जबकि आज दर्शकों की वर्गीय संरचना और फिल्म देखने का तरीका दोनों बदल चुके हैं।

सत्र के दौरान प्रतिभागियों ने फिल्म निर्माण, बदलती दर्शक संस्कृति, विजुअल लैंग्वेज तथा सिनेमा के सामाजिक प्रभाव पर खुलकर चर्चा की।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)

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