अब जबकि सत्ताधारी गठबंधन एनडीए और विपक्षी महागठबंधन ने अपना-अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी कर दिया है, सवाल है कि सत्ता पर 14 नवबंर को कौन सा गठजोड़ सत्तासीन होगा?
महागठबंधन, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, वामपंथी दल (सीपीआई,सीपीएम व सीपीआईएमएल), विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और इंडियन इंक्लुसिव पार्टी (आई आई पी) है, में शुरुआती खींचतान के बाद तेजस्वी यादव को अंततः कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत की उपस्थिति में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया गया, जबकि एनडीए गठबंधन शुरु से नीतीश कुमार के नाम पर चुनाव लड़ने की बात करती रही है, लेकिन चुनाव के बाद मुख्यमंत्री वही होंगे, यह स्पष्ट रुप से बताने में देर करती चली गयी।
परिणामस्वरुप जब एनडीए का चुनावी घोषणापत्र जारी किया गया तब महज 26 सेकेन्ड के लिए नीतीश कुमार मंच पर आए और बिना कुछ बोले मंच से उतरकर चले गए।
इन सब बातों के इतर भी कई ऐसी बातें हैं जिसपर कोई बात नहीं हो रही है, जिसकी जरूरत है. बिहार की राजनीति के सभी जानकार एक सेट पैटर्न पर बात करते हैं। सेट पैटर्न और उसके आधार पर हो रही बातचीत का लब्बोलुबाब यह है कि जातीय और सामाजिक समीकरण एनडीए के पक्ष में है, इसलिए चुनावी परिणाम भी एनडीए के पक्ष में ही जाएगा।
सेट पैटर्न को तोड़ने या समझने की कोई कोशिश आपको दिखाई नहीं पड़ती है और उसी पुराने जोड़-घटाव के आधार पर वे एनडीए को अपर हैंड दे देते हैं। समान्यतया माना जाता है कि नीतीश कुमार के साथ अतिपिछड़ा वोट के अलावा सवर्णों का वोट है जो उसे कई चुनावों से विजयी बनाता रहा है, इसलिए उसकी जीत तय सी लग रही है। राजनीतिक टिप्पणीकार पांच वर्षों में बदले राजनीतिक और सामाजिक समीकरण के बारे में बात नहीं करना चाहते।
2020 के चुनाव से लेकर मौजूदा संपन्न हो रहे चुनाव पर नजर डालने से एनडीए का वह समीकरण खिसका हुआ लगता है। अगर इसे बारीकी से समझने की कोशिश करें तो कई चीजें सेट पैटर्न से अलग दिखने लगेंगी।
उदाहरण के लिए 2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही घोषणा के बीच से वीआईपी के मुकेश साहनी मंच से उठकर चले गए थे और वह एनडीए के साथ जाकर चुनाव लड़े थे। मल्लाह बिहार की आबादी का 2.6 फीसदी है, जिसने पिछली बार एनडीए को वोट दिया था। इस बार मुकेश साहनी महागठबंधन का हिस्सा हैं जिसे सरकार बनने पर उपमुख्यमंत्री बनाने का वायदा किया गया है।
इसी तरह आई पी गुप्ता वाली इंडियन इंक्लुसिव पार्टी (आई आई पी) को तीन सीट देकर महागठबंधन में रखा गया है। आई पी गुप्ता का पान समाज- ततमा, तांती, ततवा, कोली (तातमे खोली, खतवे खोली, पटवे खोली) के नेता हैं। आई पी गुप्ता के अनुसार बिहार के 38 जिलों में से 35 जिलों में उनकी उपस्थिति है जो कुल आबादी का लगभग 80 लाख है।
गुप्ता के अनुसार ये जातियां 20 लोकसभा क्षेत्रों में कम से दो या दो लाख या उससे अधिक संख्या में हैं। आई पी गुप्ता का कहना है कि मधेपुरा में यादवों के बाद दूसरी सबसे बड़ी आबादी उनकी है जबकि समस्तीपुर में वे 4 लाख 65 हजार हैं। उसी तरह 150 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां उनकी आबाद 50 हजार से 10 हजार के बीच है।
इसी जुलाई में आई पी गुप्ता राजनीतिक समझौते की तलाश में दिल्ली में थे। वह चाहते थे कि भाजपा के साथ उनकी पार्टी का गठबंधन हो जाय। आई पी गुप्ता की समझदारी थी कि उनका वोटर पूरी तरह भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है इसलिए भाजपा के साथ जाना अपने नेचुरल अलायंस के साथ जाना है, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने उनके साथ समझौता करने से मना कर दिया था। अंतिम समय में उनका समझौता महागठबंधन के साथ हो हुआ और आज वह महागठबंधन का स्टार प्रचारक हैं।
इस तरह 2020 के विधानसभा चुनाव में जो समूह एनडीए के साथ था, अब महागठबंधन के साथ है। अगर इस गणित को ठीक से समझा जाय तो सेट नैरैटिव उलट जा सकता है।
मतलब मुकेश साहनी की जाति का 2.6 फीसदी एनडीए को पड़ा वोट अगर इस बार महागठबंधन को पड़ जाता है तो एनडीए को सवा पांच फीसदी वोट का नुकसान होगा। मतलब एनडीए को 2.6 फीसदी कम और महागठबंधन को 2.6 फीसदी का लाभ। इसी तरह आई पी गुप्ता का का 1.72 फीसदी वोट महागठबंधन को पड़ने से साढ़े तीन फीसदी का नुकसान एनडीए को हो सकता है। कुल मिलाकर एनडीए में से सिर्फ इन्हीं दो जातियों का वोट अलग हो जाने से पौने आठ फीसदी का नुकसान हो सकता है।
इससे अलग एनडीए के पक्ष में भी चिराग पासवान के जाने का समीकरण है जो 29 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं और उनके पास भी साढ़े पांच (5.5) फीसदी वोट है। गणित के हिसाब से चिराग के वोट जुड़ने के बावजूद एनडीए को उतना लाभ नहीं हो पा रहा है जितना साहनी और गुप्ता के जुड़ने से महागठबंधन को लाभ हो सकता है।
हमें एक बात को नहीं भूलना चाहिए कि पिछले दो चुनाव से मुकेश साहनी मल्लाहों के सर्वमान्य नेता नहीं रह गए थे लेकिन तकनीकी रुप से जब से उन्हें उपमुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया गया है उससे मल्लाहों का ध्रुवीकरण गठबंधन के पक्ष में होने की उम्मीद है। यही बात आई पी गुप्ता के बारे में कही जाती है। आई पी गुप्ता का कहना है कि आजादी के 78 साल के भी उनकी जाति का कोई प्रतिनिधि विधानसभा या लोकसभा नहीं पहुंचा है।
2020 का चुनाव मौजूदा चुनाव से और दो-तीन कारणों से अलग है। पिछले चुनाव में पूर्व केन्द्रीय मंत्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (जिनका मिथिलाचंल में प्रभाव था), पूर्व केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा, सांसद पप्पु यादव (जिनका सीमांचल में प्रभाव है) और अस्सुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-एत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमएएम) जिनका मुसलमानों, खासकर युवा मुसलमानों पर अच्छा खासा असर है, एक साथ मिलकर चुनाव लड़े थे और कुल मिलाकर महागठबंधन को कम से कम 30 सीटों पर नुकसान पहुंचाया था।
लेकिन इस बार देवेन्द्र प्रसाद यादव जन सुराज के साथ हैं और अपने बेटे को बाबुबरही से चुनाव लड़वा रहे हैं। उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए के साथ हैं, पप्पु यादव गठबंधन में चले गए हैं जबकि ओवैसी की चमक इस बार मद्धिम पड़ गई है।
चुनाव में जिन अन्य फैक्टरों का काफी असर पड़ सकता है वह है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पूरी तरह स्वस्थ्य नहीं होना। इस फैक्टर को सिर्फ नीतीश के अस्वस्थ होने से देखने से तस्वीर मुक्कमल नहीं हो सकती है। इसका दीर्घकालीन असर है।
पहले नीतीश कुमार की निजी छवि के कारण मुसलमानों का एक छोटा सा तबका जनता दल यू को वोट करता था, भले ही वह 15 से 20 फीसदी ही हो। इस बार उनकी अस्वस्थ्ता ने मुसलमानों में अतिरिक्त भय पैदा कर दिया है और मुसलमानों का एकमुश्त वोट महागठबंधन को जाने की संभावना है।
2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत में कोरोना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रवासी मजदूर के रुप में काम करने वाले अधिकांश बिहारी एनडीए के वोटर हैं क्योंकि जातीय रुप से वे अतिपिछड़े श्रेणी में आते हैं। प्रवासी मजदूरों का मानना था कि लॉकडाउन के बाद जितना “बेहतर ढ़ंग” से मोदी सरकार कोरोना से निपटने में कारगर रही थी, उसके चलते एनडीए को थोक में वोट दिया गया था।
लेकिन इस बार पहले चरण से दस दिन छठ पर्व बीत गया। प्रवासी जहां भी काम करते हैं, उन्हें इतने लंबे समय तक अवकाश नहीं मिल सकता है या फिर अवकाश मिलेगा तो तनख्वाह कट जाएगी, परिणामस्वरुप तमाम बिहारी श्रमिक तेजी से अपने काम पर लौट चुके हैं या लौट रहे हैं। इसका प्रमाण यह बिहार से बाहर जाने वाली सभी लंबी दूरी की ट्रेन में वेटिंग सीट भी उपलब्ध नहीं है। मतलब यह कि छठ में आए बिहारी मजदूर वोट डालने का इंतजार में रुके नहीं हैं, बल्कि बिहार से बाहर जा रहे हैं।
अधिकांश प्रवासी बिहारी मजदूरों के वोट दिए जाने से भी एनडीए मामूली बढ़त ही बना पायी थी और कुल मिलाकर विजेता एनडीए को महागठबंधन की तुलना में मात्र 12,700 अधिक वोट मिले थे।
बिहार में लोकतंत्र के लिए चिंता का सबसे बड़ा सबब यह है कि राज्य के कुल 214 जातियों में से 98 अतिपिछड़ी जातियों को किसी भी पार्टी ने उम्मीदवार बनाना उचित नहीं समझा। इसे यह भी कह सकते हैं कि 98 जातियों में एक भी आदमी ऐसा नहीं है जिसने स्वतंत्र उम्मीदवार के रुप में नामांकन भी किया हो। इन 98 अतिपिछड़ी जातियों की कुल आबादी 1 करोड़ 76 लाख 16 हजार 978 है।
जबकि बिहार विधान सभा कुल 243 सीटों के लिए राजद ने 143 पर उम्मीदवार ऊतारे हैँ। 100 सीटें गठबंधन के अन्य दलों के लिए छोड़ी हैं। राजद के 143 सीटों में एक अनुसूचित जनजाति, 20 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है; जबकि 18 उम्मीदवार मुसलमान हैं। बची 104 सीटों में 52 सिर्फ यादव जाति के उम्मीदवार हैं। जबकि एनडीए ने कुछ ऐसा ही तथाकथित ऊंची जातियों के मामले में किया है। कुल 243 सीटों में आरक्षित सीटें 39 हैँ। सामान्य 204 सीटों में से 05 पर मुस्लिम उम्मीदवार हैँ। शेष बची सीटें हैँ 199। इनमें 85 सीटों पर सवर्ण हिन्दू उम्मीदवार हैं जिनकी संख्या 10 फीसद से थोड़ी अधिक है यानि लगभग चार गुना ज्यादा।
इस बार एनडीए ने 84 टिकट चार सवर्ण जातियों को बांटे हैं. जो पिछले चुनाव से सात ज्यादा हैं। इनमें भाजपा ने 49, जदयू ने 22, लोजपा ने 10, आरएलएम और हम ने 2-2 सीटों पर सवर्णों को मौका दिया है। इनमें सर्वाधिक 37 उम्मीदवार राजपूत हैं जबकि गठबंधन ने 34 भूमिहार, 14 ब्राह्मण और 2 कायस्थ उम्मीदवार उतारे हैं. इनमें भूमिहारों को सभी पांच दलों में प्रतिनिधित्व मिला है। भाजपा ने तो सारी ह्दें पार कर दी हैं। उसके कुल 101 उम्मीदवारों में 12 दलित हैँ जो संवैधानिक व्यवस्था है। उसने किसी मुसलमान को उम्मीदवार नहीं बनाया है। गैर दलित कुल 89 उम्मीदवारों में 49 तथाकथित ऊँची जाति के हैँ यानि उसके सामान्य उम्मीदवारों में 55 फीसद सवर्ण हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में एक महत्वपूर्ण फैक्टर प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जन सुराज हो सकता था जिसने सबसे अधिक 236 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। प्रशांत किशोर पिछले ढ़ाई साल से लगातार बिहार की सड़कों पर खाक छानते रहे हैं और मुद्दारहित बिहार को मुद्दा पर लाने की कोशिश करते रहे हैं।
दो महीने पहले तक जनसुराज की उपस्थिति हर जगह महसूस की जा रही थी लेकिन जब चुनाव अपने शबाब पर है तो वह वोटकटवा के रुप में दिखने लगे हैं। वह जिस भी रणनीति के तहत चुनाव में उतरे हों, लेकिन फील्ड में कई जगह भाजपा को नुकसान पहुंचते दिख रहे हैं।
हां, महागठबंधन और एनडीए, दोनों ने ही आरक्षण सीमा को बढ़ाने की बात की है, अगर यह बात नीचे तक चली गई तो जन सुराज भाजपा को और अधिक नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि सवर्णो के लिए आरक्षण का मसला एक मात्र इमोशनल मसला होता है, भले ही वह हर तरह से अलग तरह से आरक्षण का लाभ लेता रहा हो!