एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 नवंबर) को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देने की आवश्यकता को आईपीसी/बीएनएस के तहत सभी अपराधों पर लागू करने का निर्णय लिया, न कि केवल पीएमएलए या यूएपीए जैसे विशेष कानूनों के तहत उत्पन्न होने वाले मामलों पर।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में न देने पर गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध हो जाएगी।
पीठ ने कहा, “भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के आलोक में गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताने की आवश्यकता महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि अनिवार्य बाध्यकारी संवैधानिक सुरक्षा है, जिसे संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों के अंतर्गत शामिल किया गया। इस प्रकार, यदि किसी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार के बारे में यथाशीघ्र सूचित नहीं किया जाता है तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा, जिससे भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन होगा और गिरफ्तारी अवैध हो जाएगी।”
कोर्ट द्वारा संक्षेप में प्रस्तुत किए गए महत्वपूर्ण बिंदु:
“i) गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताना संवैधानिक आदेश है, जो सभी क़ानूनों के अंतर्गत आने वाले सभी अपराधों में अनिवार्य है, जिसमें आईपीसी 1860 (अब बीएनएस 2023) के अंतर्गत आने वाले अपराध भी शामिल हैं।
ii) गिरफ्तारी के आधार गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में लिखित रूप में बताए जाने चाहिए।
iii) ऐसे मामलों में जहां गिरफ्तार करने वाला अधिकारी/व्यक्ति गिरफ्तारी के समय या उसके तुरंत बाद गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताने में असमर्थ हो, मौखिक रूप से ऐसा किया जाना चाहिए। उक्त आधारों को उचित समय के भीतर और किसी भी स्थिति में मजिस्ट्रेट के समक्ष रिमांड कार्यवाही के लिए गिरफ्तार व्यक्ति को पेश करने से कम से कम दो घंटे पहले लिखित रूप में बताया जाना चाहिए।
iv) उपरोक्त का पालन न करने की स्थिति में गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध मानी जाएगी और व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है।”
पीठ ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध न कराने पर गिरफ्तारी और उसके बाद रिमांड अवैध हो जाती है।
पीठ ने कहा, “गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा न समझी जाने वाली भाषा में आधारों का केवल संप्रेषण ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत संवैधानिक आदेश को पूरा नहीं करता। गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा समझी जाने वाली भाषा में ऐसे आधार प्रदान न करने से संवैधानिक सुरक्षा उपाय भ्रामक हो जाते हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्रदत्त व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है।
संवैधानिक आदेश का उद्देश्य व्यक्ति को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों के आधार को समझने की स्थिति में लाना है और यह तभी संभव है जब आधार व्यक्ति द्वारा समझी जाने वाली भाषा में प्रस्तुत किए जाएं, जिससे वह अपने अधिकारों का प्रभावी ढंग से प्रयोग कर सके।”
इस फैसले में आईपीसी/बीएनएस के तहत किए गए सभी अपराधों के लिए गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के लिखित आधार प्रस्तुत करने के अधिकार को बढ़ा दिया गया, जैसा कि पहले पीएमएलए या यूएपीए अपराधों तक सीमित था।
पीठ ने कहा, “गिरफ्तारी के आधार गिरफ्तार व्यक्ति को इस तरह से बताए जाने चाहिए कि आधार बनाने वाले तथ्यों की पर्याप्त जानकारी गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में प्रभावी ढंग से दी और बताई जा सके। संप्रेषण का तरीका ऐसा होना चाहिए कि वह संवैधानिक सुरक्षा के इच्छित उद्देश्य को प्राप्त करे।
गिरफ्तार व्यक्ति को केवल आधार पढ़कर सुना देने से संवैधानिक अधिदेश का उद्देश्य पूरा नहीं होगा, ऐसा दृष्टिकोण अनुच्छेद 22(1) के उद्देश्य के विपरीत होगा। गिरफ्तार व्यक्ति की समझ में आने वाली भाषा में गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देने में कोई बुराई नहीं है।
यह दृष्टिकोण न केवल संवैधानिक अधिदेश के वास्तविक उद्देश्य को पूरा करेगा, बल्कि जांच एजेंसी के लिए यह साबित करने में भी लाभदायक होगा कि गिरफ्तारी के आधार न दिए जाने की दलील पर गिरफ्तारी को चुनौती दिए जाने पर गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताए गए।”
मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य मामले में पीठ ने फैसला सुनते हुए कहा कि इस न्यायालय की राय है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के संवैधानिक अधिदेश के इच्छित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए गिरफ्तारी के आधारों को बिना किसी अपवाद के प्रत्येक मामले में गिरफ्तार व्यक्ति को सूचित किया जाना चाहिए और ऐसे आधारों के संचार का तरीका उस भाषा में लिखित रूप में होना चाहिए जिसे वह समझता है।