लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत की गई गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सोमवार, 12 जनवरी को उनके वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया बल्कि एसएसपी की रिपोर्ट कॉपी-पेस्ट कर दी।
यह याचिका उनकी पत्नी डॉ. गीताांजली आंग्मो ने दाखिल की है, जिसमें वांगचुक की हिरासत को अवैध बताया गया है।
वांगचुक को सितंबर 2025 में लद्दाख में राज्य का दर्ज़ा दिए जाने की माँग को लेकर किए गए आंदोलन के दौरान हिंसा भड़कने के बाद हिरासत में लिया गया था। इस मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की खंडपीठ कर रही है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने मुख्य रूप से तीन तर्क रखे।
पहला, उन्होंने कहा कि जिन चार वीडियो के आधार पर वांगचुक को हिरासत में लिया गया है, वे उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इससे उनका प्रभावी प्रतिनिधित्व का अधिकार प्रभावित हुआ है, जो न केवल एनएसए की सलाहकार बोर्ड के समक्ष बल्कि सरकार के सामने भी उपलब्ध होना चाहिए।
उन्होंने अनुच्छेद 22(1) और 22(5) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने पर उसे उसके विरुद्ध कारण बताए जाने चाहिए और उसे कानूनी सलाहकार से परामर्श का अधिकार दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि “कानूनी सलाहकार” का अर्थ केवल वकील नहीं बल्कि मित्र या जीवनसाथी भी हो सकता है — इस मामले में वांगचुक की पत्नी।
उन्होंने यह भी बताया कि जबकि हिरासत के आधार 29 सितंबर को दिए गए थे, लेकिन जिन चार वीडियो पर मुख्य रूप से हिरासत आधारित है, वे नहीं दिए गए। इसके अलावा, हिरासत के आधार देने में 28 दिनों की देरी हुई।
सिब्बल ने कहा कि सरकार एनएसए की धारा 5ए पर भरोसा नहीं कर सकती, क्योंकि यह संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 22) को खत्म नहीं कर सकती। धारा 5ए यह कहती है कि यदि हिरासत कई आधारों पर आधारित हो और कुछ आधार गलत पाए जाएं, तो भी हिरासत वैध रहेगी।
इस पर सिब्बल ने कहा—“मेरे संविधानिक अधिकार को धारा 5ए के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। यदि चार वीडियो हटा दिए जाएं, तो हिरासत कैसे बनी रह सकती है?” उन्होंने वैकल्पिक रूप से यह भी कहा कि धारा 5ए तभी लागू हो सकती है जब सभी सामग्री और आधार पहले उपलब्ध कराए गए हों।
दूसरा, सिब्बल ने तर्क दिया कि जिला मजिस्ट्रेट ने हिरासत का आदेश देते समय स्वतंत्र रूप से मनन नहीं किया, बल्कि केवल एसएसपी की सिफारिशों की नकल (कॉपी-पेस्ट) कर दी। उन्होंने बताया कि 26 सितंबर 2025 की एसएसपी की रिपोर्ट का केवल पहला पृष्ठ ही उन्हें मिला है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जिला मजिस्ट्रेट ने अपना दिमाग नहीं लगाया।
तीसरा, उन्होंने कहा कि हिरासत के समर्थन में प्रयुक्त कई सामग्री 2024 की पुरानी हैं और कुछ एफआईआर अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज हैं, जबकि सितंबर 2025 की हिंसा से जुड़ी एफआईआर पर कोई प्रगति नहीं हुई।
एक वीडियो में वांगचुक द्वारा आत्मदाह का उल्लेख किए जाने पर सिब्बल ने स्पष्ट किया कि वांगचुक ने यह बात केवल अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों के संदर्भ में कही थी और अंततः उन्होंने गांधीवादी अहिंसक आंदोलन — भूख हड़ताल — की वकालत की थी।
कोर्ट ने चार वीडियो तक पहुंच के बारे में पूछा, जिस पर सिब्बल ने कहा कि केवल एक वीडियो ऑनलाइन उपलब्ध है और वह पेन ड्राइव में बाकी वीडियो सौंपेंगे।
पिछली सुनवाई में सिब्बल ने कोर्ट में वांगचुक का एक वीडियो चलाया था जिसमें वह शांति की अपील कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इस वीडियो से यह साबित होता है कि वांगचुक राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं थे, लेकिन हिरासत देने वाले अधिकारी ने इस महत्वपूर्ण सामग्री को नजरअंदाज किया।
यह याचिका अनुच्छेद 32 के तहत हैबियस कॉर्पस के रूप में दाखिल की गई है, जिसमें जोधपुर जेल में बंद वांगचुक की रिहाई की मांग की गई है। केंद्र सरकार, लद्दाख प्रशासन और जोधपुर सेंट्रल जेल अधीक्षक प्रतिवादी हैं।
लेह जिला मजिस्ट्रेट ने हलफनामा दाखिल कर कहा कि हिरासत वैध है और आधार समयसीमा में दिए गए थे। जोधपुर जेल अधीक्षक ने कहा कि पत्नी, भाई और वकीलों को मुलाकात की अनुमति दी गई है। डॉ. आंग्मो ने अतिरिक्त आधारों में कहा है कि हिरासत आदेश अप्रासंगिक, पुराने और बाहरी तथ्यों पर आधारित है और उन्हें अब भी पूरे दस्तावेज नहीं मिले हैं। 15 अक्टूबर को कोर्ट ने वांगचुक को हिरासत को चुनौती देने के लिए बनाए गए नोट्स पत्नी को देने की अनुमति दी। 8 दिसंबर 2024 को केंद्र सरकार ने वांगचुक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई में भाग लेने की अनुमति का विरोध किया था। मामले में सुनवाई जारी रहेगी।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)