उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव के ख़िलाफ़ यूजीसी ने बनाए नए नियम

उच्च शिक्षण संस्थानों में किसी भी छात्र, कर्मचारी या शिक्षक के साथ कोई भेदभाव (खासकर जाति के आधार पर) न हो, इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने इसके लिए नए नियम बनाए हैं। नियम तत्काल प्रभाव से लागू हो चुके हैं और यह सभी कॉलेजों और यूनिवर्सिटी पर लागू होते हैं।

यूजीसी ने हाल में इस संबंध में एक अधिसूचना जारी की, जिसके तहत इसने यूजीसी नियम 2026 को मंजूरी प्रदान की गई है। ये नियम देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होंगे। उच्च शिक्षण संस्थानों में डीम्ड यूनिवर्सिटी भी आती हैं और उन पर भी ये नियम लागू होते हैं।

सरकार ने जो जानकारी दी है, उसके अनुसार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में इसका जिक्र किया गया था। इसलिए उसके अनुरूप ही इन नियमों को बनाया गया है। इसके अनुसार किसी भी शिक्षण संस्थान में धर्म, लिंग, जाति, नस्ल, जन्म स्थान या फिर शारीरिक विकलांगता के आधार पर विभेद नहीं किया जाएगा। अगर भेदभाव होता है तो संस्थान इसके लिए जवाबदेह होगा।

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते समय यूजीसी को उसके अंतर्गत आने वाले शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने और उत्पीड़न समाप्त करने के लिए कदम उठाने का आदेश दिया था। कोर्ट में रोहित वेमुला मामले की सुनवाई चल रही थी. कोर्ट ने कहा था कि यूजीसी दो महीने के भीतर नियमों को लेकर आए। यूजीसी ने उसी का पालन करते हुए नए नियमों को जारी कर दिया है।

इन नियमों में साफ तौर पर बताया गया है कि इसके जितने भी स्टेकहोल्डर्स हैं, जैसे- छात्र, शिक्षक, फैकल्टी, कर्मचारी, प्रबंध समिति वैगरह जितने भी सदस्य हैं, उनके बीच समता स्थापित की जाएगी। किसी भी आधार पर उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। शिक्षण संस्थानों में समावेशी नीति अपनानी होगी।

इसमें भेदभाव को विस्तार से बताया गया है। यहां पर भेदभाव का मतलब है- जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और दिव्यांगता के आधार पर। यानी जितने भी पक्ष हैं, सभी को समान अवसर उपलब्ध कराया जाएगा. लिंग में पुरुष, महिला और तृतीय लिंग को भी शामिल किया गया है। शिक्षण संस्थानों को समता समिति, समता हेल्पलाइन नंबर और समान अवसर केंद्र बनाने होंगे। उस शिक्षण संस्थान के प्रमुख की इसे लागू करने की जवाबदेही होगी।

रात-दिन काम करेगा हेल्पलाइन नंबर

समता हेल्पलाइन नंबर 24 घंटे काम करेगा और कोई भी छात्र इस नंबर पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। यदि उसे लगता है कि वह अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहता है, तो उसका भी प्रावधान है। संबंधित अधिकारी को लगता है कि यह मामला दंडनीय अपराध की कैटेगरी में आता है, तो उसे तुरंत इसकी सूचना पुलिस को देनी होगी। नियम में यह भी बताया गया है कि अगर किसी कारणवश कॉलेज का हेल्पलाइन नंबर वर्किंग नहीं है, तो वे उस यूनिवर्सिटी के हेल्पलाइन नंबर का उपयोग कर सकते हैं। कॉलेज की वेबसाइट पर इसे प्रमुखता से प्रकाशित करना होगा.।कॉलेज के सभी स्टाफ को एक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने होंगे, जिसमें लिखा गया है कि वे समता का लगातार संवर्धन करते रहेंगे।

हरेक कॉलेज में प्रत्येक साल जितने भी स्टूडेंट दाखिला लेते हैं, शुरुआत में ही उन्हें इन नियमों की जानकारी दी जाएगी। इसके लिए ओरिएंटेशन प्रोग्राम चलाना होगा। इस कार्यक्रम का वीडियो तैयार कर कॉलेज की वेबसाइट पर इसे प्रमुखता से प्रकाशित करना होगा। इसे हॉस्टल में भी प्रमुखता से लागू किया जाएगा। वहां पर भी इसी तरह की व्यवस्था अपनानी होगी। हरेक फैकल्टी में उसके प्रमुख इसे सुनिश्चित करने का काम करेंगे।

नए नियम के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (ईओसी) की स्थापना अनिवार्य की गई है। यह भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगा और उनका समाधान भी करेगा। यह ईओसी की प्रमुख जिम्मेदारी होगी। इसका काम सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच को-ओर्डिनेटर का काम करना है। वह लोकल मीडिया, सिविल सोसाइटी, पुलिस, जिला प्रशासन और सभी कर्मचारियों के साथ तालमेल बिठाकर रखेंगे। उन्हें जरूरत महसूस हुई, तो वे राज्य विधिक सेवा की भी मदद प्राप्त कर सकते हैं। संस्थान का कोई प्रोफेसर या फिर सीनियर फैकल्टी मेंबर या कार्यकारी परिषद के सदस्य समन्वयक की भूमिका निभा सकते हैं। किसी भी स्तर पर भेदभाव न हो, इसके लिए जो भी कदम उठाए जा सकते हैं, यह उसे सुनिश्चित करेगा।

समता समिति में संस्थान प्रमुख पदेन अध्यक्ष होंगे। तीन प्रोफेसर या वरिष्ठ संकाय सदस्य इसके सदस्य रहेंगे। इनमें एक गैर-शिक्षक कर्मचारी भी सदस्य के रूप में काम करेगा। साथ ही सिविल सोसाइटी के दो अनुभवी प्रतिनिधि शामिल होंगे। छात्रों के दो प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा। वे विशेष आमंत्रित सदस्य होंगे। को-ऑोर्डिनेटर सदस्य सचिव की भूमिका निभाएगा। सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होगा। विशेष आमंत्रित सदस्यों का कार्यकाल एक साल का होगा। समिति की कम के कम एक साल में दो बार बैठक होगी। कोरम सदस्य चार का है।

समान अवसर केंद्र के प्रमुख कार्य-

समता और समान अवसर सुनिश्चित करना, कौन-कौन सी गतिविधियां हैं, जिन्हें भेदभाव की कैटेगरी में डाला जा सकता है, इसकी सूची तैयार करना, वंचित समूह के छात्रों के लिए समावेशी प्रक्रियाएं बनाना, शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच समता स्थापित करना, शिकायतकर्ता का बचाव और उसकी गोपनीयता का ख्याल रखना, ऑनलाइन पोर्टल पर सूचनाओं को अपडेट करना, सरकार की एजेंसियों के साथ तालमेल स्थापित करना।

नियमानुसार कोई शिकायत मिलने पर संबंधित अधिकारी इस पर तुरंत एक्शन लेंगे। वे इस शिकायत को ऑनलाइन पोर्टल पर प्रकाशित करेंगे। उसके बाद उन्हें समान अवसर केंद्र के कॉ-ऑर्डिनेटर को इस संबंध में ईमेल भेजना होगा। जाहिर है, ऐसा करने के दौरान पहचान सार्वजनिक न हो, इसका भी ख्याल रखा जाएगा। शिकायतकर्ता चाहें तो समता हेल्पलाइन नंबर के जरिए या फिर समान अवसर केंद्र में जाकर शिकायत कर सकते हैं। समता समिति का यह दायित्व होगा, कि वे सूचना प्राप्त करने के 24 घंटे के भीतर बैठक आयोजित करें।

समता समिति 15 दिनों के भीतर एक रिपोर्ट तैयार करेगी। उस रिपोर्ट को संस्थान प्रमुख के पास भेजना होगा। इसकी एक प्रति शिकायतकर्ता के पास भेजनी होगी। संस्थान प्रमुख एक सप्ताह के भीतर इस पर कार्रवाई करेंगे। अगर मामला दंडनीय तो इसकी सूचना पुलिस को देनी होगी। अगर शिकायत संस्थान प्रमुख के खिलाफ हो, तो समता समिति की बैठक की अध्यक्षता को-ऑर्डिनेटर करेंगे। मामला गंभीर हो तो रिपोर्ट यूजीसी को भेजी जाएगी।

यह 2026 के संशोधित नियमों की खासियतों में से एक है कि संस्थानों को सभी शिकायतों और उनके जवाब में की गई कार्रवाई का सही और अपडेटेड रिकॉर्ड रखना होगा, हर दो साल में रिपोर्ट पब्लिश करनी होगी,और यूजीसी और अन्य सभी संबंधित अधिकारियों को समान अवसर केंद्रों के कामकाज पर सालाना रिपोर्ट जमा करनी होगी।

समान अवसर केंद्र लागू करने की प्रक्रिया की निगरानी और समीक्षा को आसान बनाने के लिए, यूजीसी ने एक राष्ट्रीय निगरानी समिति बनाई है जिसमें वैधानिक परिषदों, वैधानिक आयोगों और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि संगठनों के सदस्य शामिल हैं।

नियमों का पालन न करना कानून का उल्लंघन है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पुष्टि किए गए उल्लंघनों से संस्थानों को यूजीसी योजनाओं से बाहर किया जा सकता है, डिग्री प्रोग्राम चलाने पर रोक लगाई जा सकती है, ऑनलाइन और डिस्टेंस लर्निंग मोड तक पहुंच से वंचित किया जा सकता है और गंभीर मामलों में, यूजीसी अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त संस्थानों की सूची से हटाया जा सकता है।

यूजीसी के पास राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति होगी। इसे कम से कम साल में दो बार बैठक करनी होगी। वह इस तरह की शिकायतों को लेकर समिति में चर्चा करेगी। प्रगति रिपोर्ट तैयार करेगी और इसे वार्षिक रिपोर्ट में पेश भी करेगी। इसे संबंधित कॉलेज को प्रस्तुत किया जाएगा। किसी भी संस्थान को इनकी अवहेलना करने की छूट नहीं होगी। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे, तो उनके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा। यूजीसी खुद एक्शन लेगा। वह जांच समिति का गठन करेगा और फिर आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। यूजीसी उस संस्थान को डिग्री कार्यक्रम चलाने से रोक सकती है, ऑनलाइन शिक्षा कार्यक्रम पर भी रोक लगा सकती है। कैंपस में निगरानी और भेदभाव रोकथाम के लिए समता दस्ते नाम से एक छोटी इकाई का भी गठन किया जाएगा।

अगर कोई भी शिकायतकर्ता समता समिति की रिपोर्ट को ठीक नहीं मानता है, तो वे एक महीने के भीतर लोकपाल के समक्ष अपील कर सकते हैं। लोकपाल की नियुक्ति यूजीसी के नियमों के तहत होती है। लोकपाल की जवाबदेही होगी कि वे एमिकस क्यूरी नियुक्त कर मामला को आगे बढ़ाएं। इनकी फीस संस्थान को देनी पड़ेगी। इस दौरान यूजीसी किसी भी चरण में संबंधित शिकायत की डिटेल प्राप्त कर सकता है। यूजीसी की कमेटी दौरा भी कर सकती है। उनके द्वारा दिए गए सुझावों पर संबंधित संस्थानों को कार्रवाई करनी पड़ेगी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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