सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को व्हाट्सऐप और उसकी पैरेंट कंपनी मेटा को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि भारत के नागरिकों की प्राइवेसी से खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा। अगर कंपनी भारत के क़ानूनों का पालन नहीं कर सकती है तो भारत छोड़कर चली जाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ कहा, ‘आप हमारे देश की प्राइवेसी से खेल नहीं सकते। हम आपके एक भी डिजिट को शेयर नहीं करने देंगे।’
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। मेटा की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और व्हाट्सऐप की ओर से अखिल सिब्बल पेश हुए। दोनों ने बताया कि जुर्माने की राशि जमा कर दी गई है। सीजेआई सूर्य कांत ने प्राइवेसी पॉलिसी पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “हम आपको एक भी जानकारी साझा करने की अनुमति नहीं देंगे। आप इस देश के नागरिकों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते।”
सीजेआई ने कहा कि व्हाट्सऐप की स्थिति एकाधिकार जैसी है और उपभोक्ता के पास कोई वास्तविक विकल्प नहीं है। “आप देश के संवैधानिक मूल्यों का मज़ाक बना रहे हैं। लोगों के निजता के अधिकार से आप ऐसे कैसे खेल सकते हैं?” जब यह कहा गया कि पॉलिसी से बाहर निकलने का विकल्प है, तो सीजेआई ने उसकी व्यवहारिकता पर सवाल उठाया: “क्या सड़क पर फल बेचने वाली गरीब महिला आपकी शर्तें समझ पाएगी? यह निजी जानकारी की चोरी का एक सभ्य तरीका है—और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे।”
सीजेआई ने स्पष्ट किया कि जब तक मेटा और व्हाट्सऐप यह लिखित आश्वासन नहीं देते कि यूज़र्स का निजी डेटा इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, तब तक अदालत मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ाएगी।
इस पर रोहतगी ने बताया कि एक संविधान पीठ के समक्ष चल रहे मामले में यह आश्वासन दिया गया था कि 2021 की पॉलिसी न मानने पर किसी यूज़र को व्हाट्सऐप से बाहर नहीं किया जाएगा। उन्होंने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 का भी हवाला दिया, जिस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि व्यक्तिगत डेटा सिर्फ बेचा ही नहीं जाता, बल्कि व्यावसायिक रूप से शोषित किया जाता है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत यह देखना चाहती है कि डेटा को कैसे “किराए पर” दिया जाता है और व्यवहारिक रुझानों के आधार पर विज्ञापनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सीजेआई ने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि ह्वाट्सऐप पर डॉक्टर से बातचीत के बाद तुरंत उसी से जुड़े विज्ञापन दिखने लगते हैं।
मेटा और व्हाट्सऐप की ओर से यह दोहराया गया कि संदेश एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड हैं और कंपनी संदेश नहीं पढ़ सकती। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यूरोपीय नियमों के विपरीत, भारतीय कानून डेटा साझा करने के मूल्य के सवाल को स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं करता। सीसीआई की ओर से सीनियर एडवोकेट समर बंसल ने कहा, “इनकी पूरी कमाई विज्ञापनों से होती है। हम ही उत्पाद हैं। सेवा मुफ्त इसलिए है।”
अदालत के सवालों के बाद मेटा ने हलफनामा दाखिल करने का प्रस्ताव रखा। इसे स्वीकार करते हुए अदालत ने मामला अगले सोमवार तक के लिए स्थगित कर दिया और इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया।
यह सुनवाई व्हाट्सऐप की 2021 वाली प्राइवेसी पॉलिसी से जुड़ी है। इस पॉलिसी में यूजर्स के डेटा को मेटा और अन्य कंपनियों के साथ शेयर करने की बात है, जिसका इस्तेमाल विज्ञापन और कमर्शियल कामों के लिए किया जाता है। नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलएटी ने जनवरी 2025 में एक आदेश दिया था, जिसमें कॉम्पिटिशन कमीशन ऑफ इंडिया द्वारा लगाई गई 213 करोड़ रुपये की पेनल्टी को बरकरार रखा गया था। मेटा और व्हाट्सऐप ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कंपनी की ओर से दिए गए ‘इनफॉर्म्ड कंसेंट’ यानी सहमति के दावे पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लाखों यूजर्स, जैसे सड़क किनारे ठेला लगाने वाले, ग्रामीण लोग या सिर्फ तमिल बोलने वाले, इन जटिल प्राइवेसी पॉलिसी को समझ ही नहीं पाते। कोर्ट ने टिप्पणी की, ‘शेर और भेड़ के बीच चुनाव जैसा है। या तो आप लिखित हलफनामा दें कि कोई डेटा शेयर नहीं होगा, या हम आपका केस खारिज कर देंगे।’
कोर्ट ने मिसाल देते हुए कहा कि कई बार यूजर्स डॉक्टर से चैट करने के तुरंत बाद दवाइयों के टारगेटेड विज्ञापन मिलते हैं। इससे साफ होता है कि चैट ट्रेंड्स के आधार पर यूजर्स का व्यवहार ट्रैक किया जाता है और डेटा का कमर्शियल इस्तेमाल होता है, जो यूजर्स के अधिकारों का उल्लंघन है।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह पॉलिसी शोषणकारी है। सीजेआई ने कहा, ‘आपकी पॉलिसी इतनी चालाकी से लिखी गई है कि हमें भी समझने में दिक्कत होती है… तो बिहार के गांवों में रहने वाले लोग कैसे समझेंगे?’ उन्होंने आगे कहा, ‘अगर आप हमारे संविधान का पालन नहीं कर सकते, तो भारत छोड़ दें। हम किसी नागरिक की प्राइवेसी से समझौता नहीं करेंगे।’
व्हाट्सऐप की ओर से वकील ने कहा कि उनकी पॉलिसी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार है और डेटा शेयरिंग सिर्फ पैरेंट कंपनी तक सीमित है। लेकिन कोर्ट ने इसे नहीं माना और यूजर डेटा के व्यवहारिक और कमर्शियल शोषण पर जोर दिया।
अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सऐप को निर्देश दिया है कि मामले की पूरी सुनवाई तक किसी भी यूजर की जानकारी मेटा के साथ शेयर न की जाए। अगली सुनवाई के लिए मामले को 9 फरवरी को बड़ी बेंच के सामने लिस्ट किया गया है।
नवंबर 2024 में सीसीआई ने पाया था कि व्हाट्सऐप ने भारत में अपनी प्रमुख स्थिति का दुरुपयोग करते हुए 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी के जरिए “ले लो या छोड़ दो” ढांचा लागू किया और सेवा की निरंतरता को डेटा साझा करने से जोड़ा। इसे प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 का उल्लंघन मानते हुए ₹213.14 करोड़ का जुर्माना लगाया गया और यूज़र की पसंद बहाल करने के निर्देश दिए गए।
जनवरी 2025 में मेटा और व्हाट्सऐप ने एनसीएलएटी में चुनौती दी। नवंबर 2025 में एनसीएलएटी ने विज्ञापन से जुड़े डेटा साझा करने पर पांच साल की रोक हटाई और कुछ निष्कर्ष पलटे, लेकिन जुर्माने को बरकरार रखा।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)