मार्क्सवादी इतिहासकार केएन पणिक्कर हमारे बीच नहीं रहे। 90 साल की आयु में वह तिरुवनंतपुरम में रह रहे थे, वहीं सोमवार को उनका देहांत हुआ। वह उन इतिहासकारों में थे जिन्होंने भारत में धार्मिक रंग में रंगे संघर्षों के उन मूल्यों को सामने लाया जो अक्सर राजनीति के गर्दो-गुबार में ढंक जाते हैं।
उन्होंने मालाबार में मोपला विद्रोह का जमीनी अध्ययन कर ‘अगेंस्ट लार्ड एण्ड स्टेट: रीलिजन एण्ड पीजेन्ट अपराईजिंग्स इन मालाबार’ लिखकर धर्म के गर्दो-गुबार के नीचे दबी सच्चाईयों को सामने लाकर इतिहास अध्ययन में एक बड़ा योगदान दिया। धर्म और अर्थव्यवस्था के बीच के संबंधों की पड़ताल करती इस पुस्तक ने भारत में सांस्कृतिक मूल्यों को गहरे तरीके से रेखांकित किया। उनके इस अध्ययन ने भारत में इतिहास लेखन में सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका को गहरे से दर्शाया।यह उनकी एक पहचान भी बन गई।
उनकी हिंदी में एक पुस्तक ‘औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष’ ग्रंथ शिल्पी से छपकर आई थी। यह पुस्तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विचारधारा, धर्म, जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक उद्देश्यों को केंद्र में रखकर लिखी गई थी। इस पुस्तक में वह पुनर्जागरण जैसे दावे की गहरी पड़ताल करते हैं और धार्मिक आग्रहों और प्रतीकों के प्रयोग में छिपी आर्थिक संरचनाओं को मार्क्सवादी पद्धति के साथ परखते हैं।
उनकी इतिहास अध्ययन और लेखन की पद्धति पर निश्चित ही डी.डी. कोसाम्बी के प्रभाव को देखा जा सकता है। हम जानते हैं कि डी.डी. कोसाम्बी ने सांस्कृतिक, खासकर धार्मिक प्रतीकों के पीछे खड़ी सामाजिक संरचना और उसके आर्थिक आधार को अपने इतिहास लेखन का आधार बना दिया। वह इन पद्धतियों को पुरातत्व के अध्ययन की ओर ले जाने पर काफी जोर देते रहे। इस मसले पर उनका एच.डी. संकालिया के साथ विवाद काफी चर्चित रहा।
डी.डी. कोसाम्बी के इतिहास लेखन की पद्धति को लेकर इतिहासकारों ने कई रुख अख्तियार किए। ज्यादातर इतिहासकारों ने राज्य और समाज की संरचनाओं पर जोर देना शुरू किया। इस दिशा में आर.एस. शर्मा की पुस्तक ‘भारत में नगरों का पतन’ धर्म पर आर्थिक कारणों की प्रधानता आंकड़ों के साथ रेखांकित करती है। भारत के इतिहास लेखन के विकास में ये विवाद कई रूपों में बनते रहे हैं और इससे इतिहास के बहुत सारे पक्ष हमारे सामने आये।
पणिक्कर का इतिहास लेखन अपने समय की चुनौतियों को सांस्कृतिक पक्ष से देखने और राज्य के व्यवहार में इसे परखने की ओर अधिक रहा।
वह ‘औपनिवेशिक भारत में सांस्कृतिक और विचारधारात्मक संघर्ष’ की प्रस्तावना में लिखते हैं: ‘‘दामोदर धर्मानन्द कोसाम्बी के प्रबोध मुहावरों में कहें तो अपने इतिहास के इस दौर में भारत के लोग ‘रचनात्मक आत्मनिरीक्षण’ में रत थे, जिसका मतलब केवल देशी ज्ञानशास्त्रीय परम्परा की शक्ति का अवगाहन नहीं बल्कि उसे पश्चिमी दुनिया द्वारा की गई प्रगति के संदर्भ में परखना भी था।’’
पणिक्कर ने इस आधार वाक्य को एक आलोचनात्मक नजरिये के साथ अख्तियार किया और अपने समय के इतिहास लेखन के प्रति सतर्क भी रहे। वह ‘इतिहास लेखन तथा अवधारणा संबंधी प्रश्न’ पर लिखते हैं: ‘‘मार्क्सवादी इतिहास लेखन में मुख्य रूप से यह दर्शाने का प्रयत्न किया गया है कि उन्नीसवीं सदी के भारत में राजनीतिक-आर्थिक सरंचनाओं ने किस प्रकार बौद्धिक परिघटनाओं को आवेष्ठित कर रखा था।
हालांकि कहीं-कहीं उसमें बहुत खींचतान की गई है और नियतिवाद-डिटरमिनिज्म का सहारा लिया गया है। फिर भी उसमें बौद्धिक प्रयास के प्रतिमानों को अवश्य परिभाषित किया गया है, और इस प्रकार यह स्पष्ट किया है कि उन्नसवीं सदी के बौद्धिक जनों को अपने सामाजिक-आर्थिक प्रयत्नों में क्यों अवश्यम्भावी पराजय और त्रासदी का सामना करना पड़ा।’’
वह साफ तौर पर लिखते हैं कि इन पराजयों और त्रासदियों के पीछे ‘राज्य’ को देखने का वह नजरिया था जिसे देशी और विदेशी के विभाजन में परखने की कमी थी या उसे सिर्फ एक ‘राज्य’ की तरह देखने का नजरिया था। इस संदर्भ में वह अम्ल्किर कबराल के संघर्षों और उसमें निहित मूल्यों को वह उल्लेख करते हैं।
उनके विविध विषयों पर निबंधों का संकलन ‘हिस्ट्री एज ए साइट ऑफ़ स्ट्रगल’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। थ्री एस्सै प्रकाशन द्वारा छपी यह पुस्तक उनकी एक मुक्कमल किताब है जो उनके इतिहास लेखन को सामने लाती है। इस पुस्तक में उनका एक निबंध है ‘प्रोग्रेसिव कल्चरल मूवमेंट इन इंडिया: अ क्रिटिकल अप्रैजल’।
वह प्रलेस के 75 साल और इप्टा के 70 साल पूरा होने का उल्लेख करते हुए बार-बार उस इतिहास की याद कराते हैं जब इन संगठनों ने प्रगतिशील मूल्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। वह इसे याद कराते हुए यह चेतावनी भी देते हैं कि आज हमारे सामने किस तरह की चुनौतियां हैं। वह इन चुनौतियों को समझने पर काफी जोर देते हैं। वह प्रतिरोध के लिए मूल्यों के चुनाव के संदर्भ में पुनर्सर्जना और प्रगतिशील मूल्यों के निर्माण और रेखांकन के लिए कठिन प्रयास की मांग करते हैं।
इस संदर्भ में वह ग्लोबलाईजेशन को साम्राज्यवाद के नये हमले की ओर ध्यान ले जाते हैं और इसकी आर्थिक संरचना और तेजी से बदल रही सामाजिक सरंचना की समझ बनाने का प्रस्ताव रखते हैं।
मैंने पणिक्कर की मुख्यतः दो ही रचनाओं को पढ़ा है। कुछ छिटपुट लेख पढ़े हैं। भारतीय इतिहास लेखन में ‘बाबरी मस्जिद का ध्वंस’ एक निर्णायक घटना थी और यहां से इतिहास के मोर्चे पर सांस्कृतिक लेखन का सिलसिला एक बार फिर से बनना शुरू हुआ। इतिहास के मोर्चे पर यह भिड़ंत अंततः इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में ‘राज्य’ की ओर किया गया हस्तक्षेप और अंततः उसे बदल देना था। यह बदलाव इतिहास के उन मूल्यों को लेकर था जिसे हिंदुत्व की राजनीति मिटा देने पर तुली हुई है।
आज इतिहास का अध्ययन और पुरातत्व का अध्ययन भी एक ठोस हिंसक झड़पों में बदलता हुआ दिख रहा है। ये झड़पें निश्चित ही हमारे वर्तमान में हो रही है। इतिहास का अध्ययन वर्तमान को समझने और भविष्य को गढ़ने में अहम् भूमिका निभाता है। इसमें सांस्कृतिक मूल्य सीधे हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं और हमारी सामाजिक जीवन को प्रभावित करते होते हैं। पणिक्कर ने अपने इतिहास लेखन से इतिहास के उन सांस्कृति पहलुओं से रूबरू कराया जो आज हमारे सामने खड़े हैं। ये दोनों ही रूपों में हैं।
प्रगतिशील परम्परा के तौर पर एक उम्मीद बनकर हमारे साथ हैं और एक प्रतिक्रियावादी मूल्य के तौर पर जो एक चुनौती बनकर खड़ा है। हमें अपनी प्रगतिशील परम्परा को इतिहास के प्रसंगों में रखकर उसे फिर से सृजित करना है और उसे प्रतिरोध की ताकत में बदल देना है। पणिक्कर का इतिहास लेखन इतिहास को इसी पद्धति से देखने और समझने की ताकत देता है।
पणिक्कर को याद करते हुए हमें जरूर प्रसिद्ध समाजशास्त्री आंद्रे बितायी को याद करना चाहिए। जो अभी हाल ही में हमारे बीच नहीं रहे। वह समाजशास्त्रीय चिंतन में लगातार उन वर्गों और समुदायों को चिन्हित करते रहे जो भविष्य के निर्माता थे और उन पर अतीत का बोझ कम था।
वह यह तलाश उन सामाजिक मूल्यों के संदर्भ में ही कर रहे थे जिनकी जड़े अतीत की गहराइयों में जाकर फंसी हुई थीं और औपनिवेशिक अध्ययन पद्धतियों ने उन्हें उसी में उलझा दिया था और अतीतग्रस्तता को एक ‘अनोखे मूल्य’ में ढाल दिया था।
आदिवासी, जाति, धर्म, टोटेम जैसे वर्गीकरण को वह बेहद आलोचनात्मक नजरिये से परखते रहे और भारतीय समाज की गतिशीलता में एक नये समूह की ओर चिन्हित करने में प्रयासरत रहे। वह कृषक, श्रमिक जैसी नई संरचनाओं और उसकी सामाजिक भूमिका को लेकर काफी उत्साहित थे और इस दिशा में समझ बनाते हुए लेख और पुस्तकें लिखीं। वह नागरिक अवधारणा को लेकर एक नई दृष्टि से सोच रहे थे और उसे भारत की सामाजिक पृष्ठभूमि में रखकर पेश कर रहे थे।
1970-80 के दशक में भारत का प्रगतिशील बौद्धिक वर्ग एक नई अवधारणा और व्याख्या की नई ताजगी के साथ इतिहास, समाज, संस्कृति के नये मूल्यों को पेश कर रहा था। उस दौर का हमारा यह बुद्धिजीवी वर्ग अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर आ गया है। इसमें से बहुतों ने हमसे विदा ले लिया है। आज हमारे सामने जिस तरह की चुनौतियां खड़ी हैं, उसमें ऐसे वरिष्ठ बुद्धिजीवियों का जाना एक अपूरणीय क्षति है।
इन चुनौतियों के सामने खड़े होने के लिए जिस तरह की बौद्धिक ईमानदारी, मार्क्सवाद की समझ और जन पक्षधरता की जरूरत है, वह निश्चित ही कमजोर अवस्था में है। आज जरूरत है, इस चुनौतियों को समझना, प्रगतिशील मूल्यों की सर्जना और उन मूल्यों के साथ आगे बढ़ना। पणिक्कर को सबसे शानदार श्रद्धांजली उनके इतिहास लेखन की पद्धतियों को समझना और उस परम्परा को आगे बढ़ाना होगा जिससे एक प्रगतिशील मूल्यों वाला समाज रचा जा सके।
(अंजनी कुमार लेखक, राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)