सुप्रीम कोर्ट ने दिया 13 साल से कोमा में पड़े व्यक्ति को ‘सम्मान से मरने का अधिकार’

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में पहली बार एक 32 वर्षीय व्यक्ति को कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर ‘पैसिव युथनेसिया’ की बुधवार को अनुमति दे दी जो 12 साल से अधिक समय से कोमा में है।

पैसिव यूथनेसिया का अर्थ है कि किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को जीवित रखने वाली चिकित्सा सहायता को रोकने या जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति देना ताकि उसकी स्वाभाविक रूप से मौत हो सके। हर्ष राणा अगस्त 2013 में चंडीगढ़ के एक फ्लैट की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश के सिर में गंभीर चोट लग गई थी। तब से वे कोमा में हैं। 13 साल तक वे बिस्तर पर पड़े रहे। उन्हें खाना-पीना भी डॉक्टरों द्वारा ट्यूब से दिया जा रहा है।

माँ-बाप और भाई-बहन दिन-रात उनके साथ रहे। लेकिन डॉक्टरों ने बार-बार कहा कि अब कोई उम्मीद नहीं है। दिमाग पूरी तरह से काम करना बंद कर चुका है। डॉक्टरों ने बताया कि ये अब कभी ठीक नहीं हो सकते हैं। परिजनों ने भी कहा कि वह उन्हें असहाय पीड़ा में नहीं देख सकते।

डॉक्टरों की सलाह के बाद परिवार ने पैसिव यूथेनेशिया के लिए अदालतों का रुख किया। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले कहा था कि हरीश वेंटिलेटर पर नहीं हैं, इसलिए इजाजत नहीं दी जा सकती। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फ़ैसले का हवाला दिया, जिसमें पैसिव यूथेनेशिया को क़ानूनी माना गया था। परिवार ने 2024 में फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने कहा कि ज़रूरत पड़ी तो फिर आना। आखिरकार पिछले साल परिवार ने फिर याचिका दायर की।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ  ने इस पर फ़ैसला सुनाया। बेंच ने कहा, ‘क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन यानी सीएएन यानी ट्यूब से दिया जाने वाला खाना- पानी सहित चिकित्सा सहायता को रोक दिया जाए। पूरी प्रक्रिया इंसानी तरीके से होनी चाहिए।’

आम तौर पर ऐसे मामलों में लागू होने वाले 30 दिन के पुनर्विचार के नियम को इस मामले में हटा दिया गया क्योंकि डॉक्टर, परिवार और सब एकमत हैं कि अब इलाज जारी रखना सही नहीं है।

कोर्ट ने एम्स दिल्ली को आदेश दिया कि हरीश को पेलिएटिव केयर यानी दर्द कम करने वाली देखभाल विभाग में भर्ती किया जाए। वहाँ घर से उन्हें ले जाया जाएगा। एम्स को खास प्लान बनाना होगा ताकि हरीश को कोई दर्द न हो, सिर्फ आराम मिले और उनको सम्मान मिले।

जस्टिस पारदीवाला ने फैसला पढ़ते हुए कहा, ‘यह फ़ैसला सिर्फ़ क़ानून का नहीं है, यह प्यार, दवा और विज्ञान का मिलन है। माँ-बाप, आप अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे सम्मान के साथ जाने दे रहे हैं। यह बहुत बड़ी हिम्मत और दया का काम है।’

जस्टिस पारदीवाला ने अमेरिकी प्रचारक हेनरी वार्ड बीचर का कथन भी पढ़ा, ‘भगवान किसी से पूछता नहीं कि तुम जीवन लेना चाहते हो या नहीं। जीवन तो मिलता है। सवाल सिर्फ यह है कि कैसे जीना है।’ उन्होंने शेक्सपियर के ‘टू बी ऑर नॉट टू बी’ का भी ज़िक्र किया।सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार साफ़ किया कि ट्यूब से दिया जाने वाला खाना- पानी भी चिकित्सा का हिस्सा है। इसे रोकना पैसिव यूथेनेशिया है।

पैसिव यूथेनेशिया सिर्फ टर्मिनली इल यानी मरणासन्न मरीजों के लिए नहीं है। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट गलत था। पैसिव यूथेनेशिया सिर्फ मरने वाले मरीजों के लिए नहीं है। जो व्यक्ति स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में हो, उसे भी यह अधिकार है। जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, ‘मरीज का हित ही एकमात्र हित है।’ कोर्ट ने कहा, ‘डॉक्टर को इलाज देना है, लेकिन जब कोई उम्मीद न हो और इलाज सिर्फ शरीर को जिंदा रखे, तो कर्तव्य खत्म हो जाता है। प्रकृति को अपना काम करने देना भी दया है।’

कोर्ट ने हरीश के परिवार की बहुत तारीफ की और कहा, ’13 साल तक कभी नहीं छोड़ा। यह प्यार की मिसाल है। अंधेरे में भी उम्मीद की किरण बने रहे।’

भारत में अभी आखिरी दिनों की देखभाल का कोई पूरा कानून नहीं है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि जल्दी ही ऐसा कानून बनाएँ ताकि भविष्य में ऐसे परिवारों को इतनी मुश्किल न झेलनी पड़े। सभी राज्यों को आदेश कि डॉक्टरों की लिस्ट तैयार करें जो ऐसे बोर्ड में काम करेंगे।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी माना था, लेकिन उसमें फीडिंग ट्यूब जैसी बात साफ नहीं थी। हरीश राणा के केस ने इस कमी को पूरा कर दिया। अब ऐसे मरीजों के लिए रास्ता साफ हो गया है।

यह फ़ैसला सिर्फ हरीश राणा के परिवार के लिए नहीं, बल्कि हजारों ऐसे परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है जो सालों से अपने प्रियजनों को देखकर तड़प रहे हैं। कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि जिंदगी जीने के लायक होनी चाहिए। जब सिर्फ शरीर जिंदा रहे और आत्मा चली जाए तो सम्मान के साथ विदाई देना भी प्यार है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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