उत्तम नगर ही क्यों?

दिल्ली में हर साल सैकड़ों हत्याएँ होती हैं, लेकिन कुछ ही घटनाएँ ऐसी होती हैं जो पूरे देश की चर्चा बन जाती हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? आज दिल्ली में उत्तम नगर की घटना इसी तरह चर्चा के केंद्र में है। एक छोटी बच्ची को गुब्बारा लगने के बाद हुए विवाद में 26 वर्षीय तरुण कुमार की हत्या कर दी गई। दिल्ली की कॉलोनियों में “जय श्री राम” और “वंदे मातरम्” के नारे के साथ तरुण के हत्यारों को फाँसी देने की माँग भी उठ रही है।

इसका नतीजा यह है कि हस्तसाल जे.जे. कॉलोनी की करीब 50 हजार की आबादी आज एक तरह की कैद की स्थिति में है। बाजार बंद हैं, मोहल्लों में आने-जाने वालों पर सख्त पहरा है। हर गली के नुक्कड़ पर बैरिकेडिंग की गई है। द्वारका के डीसीपी कुशल पाल सिंह ने बताया कि इलाके में डेढ़ सौ से अधिक बैरिकेड लगाए गए हैं। ईद आने वाली है। जिस समय बाजारों और मोहल्लों में चहल-पहल दिखती थी और दुकानें सजी रहती थीं, वहाँ आज सन्नाटा क्यों है?

होली के आसपास विभिन्न समाचारों में प्रकाशित घटनाओं को देखने से पता चलता है कि होली के दिन हत्याओं की संक्ख्या में वृद्धि होती है। 2024 में होली के दिन हत्या की छह घटना हुई है। इन घटनाओं के विश्लेषण से पता चलता है कि एकतरफा पीट-पीटकर और पत्थर, चाकू और गोली मारकर हत्या की गई। जो उत्तम नगर में घटना हुई है उसमें दोनों पक्षों के 8 लोग (5 और 3) घायल हुए, जिनमें से तरुण की इलाज के दौरान मृत्यु हो गई।

हम देख रहे हैं कि हमारे आसपास हुई घटनाएँ जैसे बुराड़ी, बलजीत नगर किसी को याद नहीं आ रही हैं। संभव है कि पास में रहने वाले लोग भी इन घटनाओं से अनभिज्ञ हों। आज पूरा भारत उत्तम नगर में हुई हत्या की चर्चा कर रहा है।

हम बलजीत नगर के विजय उपाध्याय के लिए न्याय की माँग क्यों नहीं कर रहे, जिनकी हत्या शराबियों ने इसलिए कर दी क्योंकि वे शराब पीने का विरोध कर रहे थे?

हम 2023 आया नगर के सुरेन्द्र के साथ क्यों नहीं खड़े हो रहे, जिन्हें गोली मारकर हत्या कर दी गई थी? यही हत्यारे 8 साल पहले उनके भाई की भी हत्या कर चुके थे और होली से तीन दिन पहले दूसरे भाई पर लाठी-डंडों से हमला कर चुके थे।

हम बृजेश कुमार, नेपाल राम, पिंटू यादव, सोनू और नवीन के साथ क्यों नहीं खड़े हो रहे, जो अपने परिवार को जिंदा रखने के लिए दूसरे प्रदेशों से दिल्ली आए थे और यहाँ उनकी हत्या कर दी गई? अब उनके परिवारों की देखभाल कौन करेगा?

हम केवल उसी घटना को क्यों याद कर रहे हैं जिसमें दोनों पक्षों की तरफ से लाठी-डंडे चले और दोनों पक्ष घायल हुए? एक घटना को साम्प्रदायिक रंग देने से किसको लाभ हो रहा है?

उत्तम नगर की घटना साम्प्रदायिक घटना नहीं है। यह दो पड़ोसियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे आपसी विवाद का परिणाम है, जिसमें दोनों पक्षों के बीच वर्चस्व की होड़ थी। यहाँ किसी की हत्या करने का इरादा नहीं था, बल्कि एक-दूसरे को सबक सिखाने की मानसिकता थी। इस झगड़े में चाकू या गोली का इस्तेमाल नहीं हुआ, जैसा कि दूसरी दस घटनाओं में हुआ है।

दोनों पक्ष वर्किंग क्लास से आते हैं, जो 22.5 गज के प्लॉट में 1969 से रहते आए हैं। परिवार बड़ा हुआ तो मकानों की ऊँचाई बढ़ गई और कुछ अतिक्रमण भी हो गया। किसी की भी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वहाँ से निकलकर दूसरा मकान खरीद सकें या बना सकें। अब 15–20 फीट चौड़ी गली में आमने-सामने मकान थे, जहाँ गली के अधिक हिस्से पर किसका कब्जा हो, इसको लेकर झगड़े होते रहते थे। कभी पार्किंग को लेकर तो कभी कूड़े को लेकर विवाद होता था।

अभावग्रस्त जीवन में वर्चस्व की लड़ाई अक्सर छोटे-छोटे मुद्दों पर लड़ने को मजबूर करती है। पूंजीवादी व्यवस्था में लोग आर्थिक रूप से असुरक्षित जीवन जीते हैं, लेकिन मानसिक रूप से अब भी सामंती सोच से बंधे रहते हैं। तंग बस्तियों में जगह, सम्मान और नियंत्रण की यह लड़ाई कभी-कभी हिंसक टकराव का रूप ले लेती है। साम्प्रदायीकरण से कुछ संगठनों के साथ-साथ सरकार को भी लाभ होता है, क्योंकि मुख्य मुद्दे लोगों की आँखों से ओझल हो जाते हैं।

यही कारण है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री तरुण की माँ से मिलती हैं, लेकिन बाकी 10 मृतकों के परिवारों से मिलना उन्हें उचित नहीं लगता। इस तरह की घटनाएँ अक्सर राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन जाती हैं और शहर की वास्तविक समस्याएँ—जैसे पर्यावरण, साफ हवा, साफ पानी, खराब सड़कें, बेरोजगारी और सामाजिक सुरक्षा—पृष्ठभूमि में चली जाती हैं। 

दिल्ली में हर साल करीब 500 लोगों की हत्या होती है। 23 जुलाई 2025 को राज्यसभा में नित्यानंद राय ने एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि 2000 से 2024 के बीच दिल्ली में 2450 हत्याएँ हुई हैं। जो निम्नलिखित है—

सन् — मृतकों की संख्या
2000 — 472
2021 — 459
2022 — 509
2023 — 506
2024 — 504

यानी दिल्ली में औसतन हर दिन एक से अधिक हत्या होती है। यदि होली के दिन के आँकड़ों को देखें तो यह संख्या सामान्य दिनों से अधिक होती है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार 2024 में होली के दिन 6 हत्याएँ हुई थीं। ये आँकड़े बताते हैं कि होली के दिन हत्याओं की संख्या सामान्य दिनों से अधिक होती है।

हत्या और मारपीट की घटनाएँ पूरे देश में बढ़ती जा रही हैं। इसका एक कारण बढ़ती बेरोजगारी भी है। आर्थिक संकट के कारण पारिवारिक कलह बढ़ रही है, जिसके कारण लोग एंग्जायटी और डिप्रेशन की स्थिति में जा रहे हैं। लोग हर समय गुस्से में जी रहे हैं। दूसरी तरफ, इस तरह की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और प्रोपेगंडा वीडियो के माध्यम से लोगों में हिंसक माहौल को और बढ़ावा दिया जा रहा है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक है।

दिल्ली के नंद नगरी में 17 फरवरी को बच्चों के झगड़े में एक मुस्लिम व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वहाँ पर लोगों ने इसे एक सामान्य हत्या की घटना के रूप में देखा। जब हम पीड़ित परिवार से मिलने गए, तो वे बार-बार उत्तम नगर की घटना का जिक्र कर रहे थे। उनका कहना था कि वहाँ मरने वाला हिंदू था, इसलिए घर जला दिए गए,  और लोगों को गिरफ्तार किया गया। वे कह रहे थे—हमें भी ऐसा करना चाहिए था। हत्यारे के घर पर भी बुलडोजर चलना चाहिए था, हमें उनके घर जाकर पत्थर मारने चाहिए थे।

एक घटना किस तरह पूरे समाज और हर समुदाय को प्रभावित करती है, यह इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। जब समाज एक घटना पर उबलता है और बाकी हत्याएँ और समस्याएँ चुपचाप दफन हो जाती हैं।

इसलिए हमें यह सवाल बार-बार पूछना होगा—उत्तम नगर ही क्यों? क्यों कुछ घटनाएँ पूरे समाज की चेतना पर छा जाती हैं और बाकी पीड़ितों की आवाज़ दब जाती है? यदि समाज सचमुच न्यायप्रिय होना चाहता है, तो उसे हर पीड़ित के लिए समान संवेदना और न्याय की माँग करनी होगी।

किसी छोटी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाए और उसे साम्प्रदायिक रंग देकर समाज को और हिंसक रास्ते पर धकेला जाए। यदि ऐसा होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका दंश झेलना पड़ेगा। हमें सुनिश्चित करना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक साफ-सुथरा, न्यायप्रिय और शांतिपूर्ण समाज दें। हमें उन संगठनों और लोगों से सावधान होना होगा जो समाज में जहर घोलकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं।

हमें ऐसे लोगों की गतिविधियों पर नजर रखनी होगी और हर कदम पर उनका विरोध करना होगा। हमें केवल तरुण के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए खड़ा होना चाहिए जिस पर जुल्म और ज्यादती हो रही है।

(सुनील कुमार पत्रकार, शोधकर्ता और टिप्पणीकार हैं।)

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