9 अगस्त, 1925 को हुए ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन में शाहजहांपुर के विख्यात क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर, 1927 को उत्तर प्रदेश को विभिन्न जेलों में फांसी पर चढ़ाया गया, उन्हें सूबे की वर्तमान सरकार ने फिर से उनके अपने ही शहर में ’मृत्यु दंड’ की सजा दे दी।
23 मार्च 2026, जबकि यह भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत का दिन था, उस रोज प्रातः 3 बजे सत्ता का बुल्डोजर गरजा और कुछ ही पल में शहीदों की प्रतिमाओं को बेशर्मी से मलवे में तब्दील ही नहीं किया गया, अपितु देश की स्वतंत्रता के बलिदानियों के इस अर्धशती पूर्व निर्मित ऐतिहासिक के ध्वस्त किए गए अवशेषों को शहर से बाहर डंपिंग ग्राउंड से फेंक दिया गया।
काकोरी शहीदों की यह तीनों भव्य प्रतिमाएं ‘स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष’ (1972) तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष श्री वासुदेव गुप्ता ने स्थापित कराई थीं, जो 42 के आंदोलन में जेल भी गए थे। उसी समय इस शहीद प्रतिमाओं के दक्षिण की ओर के मैदान में ’शहीद द्वार’ का निर्माण कराकर स्वतंत्रता सेनानी और ’साथी’ साप्ताहिक के सम्पादक श्री श्याम सिंह ’बागी’ ने ’शहीद मेला’ का आयोजन किया, जिसका उदघाटन पेशावर क्रांति के नायक चंद्रसिंह गढ़वाली ने किया था।
टाउन हॉल कहे जाने वाले शहर के इस केंद्रीय स्थान के निकट गांधी भवन सभागार, दो मिनट के फासले पर आर्य समाज का ’बिस्मिल कक्ष’ (जहां वे रहते थे) और थोड़ी दूर आगे बिस्मिल के जन्म का मोहल्ला खिरनी बाग। न जाने कितने पुराने क्रांतिकारी, देश भर के साहित्यकार, चिंतक और रंगकर्मी काकोरी शहीदों के इन प्रतिमाओं पर आकर श्रद्धावान होते रहे, उस स्थल को शहर में सौन्दर्यकरण के नाम पर 23 मार्च की भोर होते तक पूरी तरह सपाट जगह में बदल दिया गया।

मलबे में पड़ा हुआ अशफ़ाक का ’कटा हुआ सिर’, रोशन सिंह का ज़मींदोज़ पड़ा ’धड़’ और बिस्मिल ने नाम का क्षतिग्रस्त ’इंकलाब’ हमें सन्नाटे में भर गया। ओ मेरे शहर के बदनसीब शहीदों (?) तुम्हारी बस्ती में तुम्हें फिर से मृत्यु-दंड की सजा दे दी गई और इस बार ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ तनी रही तुम्हारी मजबूत गर्दनों पर मौजूदा स्वतंत्र भारत की सरकार के जल्लादी बुल्डोजर का शिकंजा था।
शहीदों हम शर्मिंदा हैं!
(1857 के क्रान्तिकारियों और भगत सिंह पर कार्य कर चुके स्कॉलर और लेखक सुधीर विद्यार्थी जी की फेसबुक वॉल से साभार)