जनबल की ताकत क्या तानाशाहों की फितरत पर लगाएगी लगाम!

ताज़ा ख़बरें जो सामने आ रही हैं, उससे साफ़ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इज़राइल को सहयोग देकर जिस तरह ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा गया है और अब अमेरिकी सेना को युद्ध में भेजा जा रहा है, उससे अमेरिका की जनता बेहद ख़फ़ा है। उसने 3200 रैलियां निकालकर जिस तरह अपने राष्ट्रपति का विरोध जताया है वह ऐतिहासिक है। अनुमान है इस जन ज्वार में 90 लाख के करीब लोग शामिल रहे।

उधर ईरान से बुरी तरह पिटे इज़राइल में भी वहां की सेना में भी नेतान्याहू के ख़िलाफ़ नाराज़गी सामने रही है। जन आक्रोश भी चरम पर है किंतु यहूदी सुरक्षा अधिकारी उनके साथ जो सुलूक कर रहे हैं वे मानवाधिकार का खुला उल्लंघन है।

दोनों देशों के जनबल की भावनाओं को यदि वर्तमान स्थितियों में समझने की कोशिश करें तो वाकई यह तानाशाही के ख़िलाफ़ उठ रहीं वे आवाज़ें हैं जो नहीं चाहती कि युद्ध जारी रहे। लोकतांत्रिक देशों में तानाशाहों का छद्म प्रवेश चिंताजनक है जिसे अमरीका की अवाम ने भली-भांति समझा है इसलिए उनके आंदोलन में एक अर्से से ‘नो किंग्स’ की आवाज़ गूंज रही है।

जनता ने भली-भांति ये समझ लिया है कि युद्ध को तानाशाही मनोवृत्ति से लैस राष्ट्रपति विश्व युद्ध की ओर ले जाने उतारु हैं जिसमें परमाणु बम के ख़तरे भी सामने आ सकते हैं।आज तमाम दुनिया के देश परस्पर एक दूसरे के सहयोग पर निर्भर है।भूमंडलीकरण के इस समय में कोई भी राष्ट्र अकेला चैन से नहीं रह सकता।अभी युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जलयानों के आवागमन से ही दुनिया हलाकान हो गई है।यदि स्वेज और पनामा नहर में भी ऐसा ही होता है।तो दुनियां पूरी तरह पंगु हो जाएगी।

अब तक के हालात में सुधार की गुंजाइश नज़र नहीं आ रही है। अमेरिका ईरान को झुकाने कई कपोल कल्पित कहानियां गढ़ रहा है मसलन गिफ्ट भेजने वाली बात। वह यक़ीनन परेशान है और सीज़फायर चाहता है किंतु ईरान ने इसे अस्मिता की लड़ाई मान लिया है और वह दुनिया के दो तानाशाहों और गुलामों को समाप्त करने प्रतिबद्ध है। गाज़ा का अपराधी, बच निकलने बैचेन है।स्कूल और अब विश्वविद्यालयों को भी निशाना बनाता जा रहा है जो बहुत दुखद है।

लेकिन ईरान परेशान नहीं है। वह तैयार है उसका मनोबल चीन, रुस, कोरिया, पाकिस्तान और कई मुस्लिम देशों ने बढ़ाया है। ज़रुरत इस बात की है कि ईरान की शर्तों को माना जाना चाहिए। उसे इन जल्लाद तानाशाहों पर यकीन नहीं है। उसकी अवाम भी शिद्दत के साथ हर कदम पर तैयार है। जिस बगावत की कल्पना रज़ा पहलवी के दम पर अमेरिका कर रहा था, वह हवा हवाई सिद्ध हो गई। अमेरिका और इज़राइल की ऐसी फजीहत के बारे में दुनिया ने शायद ही सोचा होगा।

इसके अलावा श्रीलंका की वफादारी और भारत की जनता के प्रति ईरान ने जो कृतज्ञता दिखाई है, वह काबिले गौर है। जबकि भारत की सरकार अमेरिका और इज़राइल की गलबहियां करती रही है और ईरान के साथ तंगदिली दिखाई है।

ईरान की ये रवायत उसे और सुदृढ़ बना रही है। विश्व में ईरान एक जगमगाते नक्षत्र की तरह चमक रहा है। इसकी आभा से विश्व राजनीति में जबरदस्त बदलाव सामने आ रहा है। एशियाई देश अब पश्चिम की ओर देखना बंद करेंगे। इसके साथ ही लोकतंत्र के साए में छिपी साम्राज्यवादी ताकतों को समाप्त करने में अहम् भूमिका निभाएंगे। अमेरिका और इज़राइल में उठा ये जनबल भी भविष्य में तानाशाहों को सबक सिखाएगा। दुनिया तभी बर्बादियों से दूर होगी। तानाशाहों के विरुद्ध जनता के साहस को सलाम।

(सुसंस्कृति परिहार लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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