इस साल भी इंडियन एक्सप्रेस की वह 100 लोगों की सूची आ गई जिन्हें वह ‘सबसे मजबूत भारतीय’ मानता है। यद्यपि इस सूची का वैसा प्रभाव नहीं होता है जैसा फोब्र्स पत्रिका के द्वारा जारी लोगों की सूची को लेकर होता है। लेकिन, इस सूची का निर्माण प्रभाव बनाने के लिए ही किया जाता है। सबसे मजबूत भारतीय मानने के पीछे यह अखबार किस पद्धति का अनुसरण करता है, किन मानकों के आधार पर उसे विश्लेषित कर इस सौ लोगों की सूची को क्रमबद्ध करता है, यह बातें इसका संपादकीय समूह ही जानता है।
लेकिन, इस सूची के विशेषांक का एक संपादकीयनुमा लेख अपने निष्कर्ष को जरूर पेश किया है: ‘‘यह शक्तिशालियों की सूची विपक्ष की असफलता की कहानी है जो भाजपा को रोक नहीं पायी और यह नये क्षेत्रों में फैलती गई है।’’
सबसे मजबूत भारतीय सूची को असफलता और सफलता के आधार पर मानने का अर्थ सत्ता को हासिल करने और न करने से जुड़ा है, यदि यही मानक है तब निश्चित ही यह सूची अपनी पद्धति के अनुरूप है। इस सूची में लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ऐसे ही राजनीतिज्ञों की सूची से भरी हुई है और इसका 80 प्रतिशत हिस्सा भाजपा-आरएसएस के नेताओं और उससे जुड़े लोग हैं।
इस सूची में दूसरे नम्बर पर उद्योगपति हैं और जाहिरा तौर पर अडानी और अंबानी का नाम होना तय है। तीसरे नम्बर पर बाॅलीवुड के लोगों का है। इसमें 100वें नम्बर पर अमिताभ बच्चन का नाम है। विभिन्न प्रशानिक अधिकारियों और ऐसे ही पदों पर रहने वाले कुछ नामों के साथ सांस्कृतिक पृष्ठिभूमि के साथ किरन नादर का नाम भी रखा गया है जो कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं। हालांकि वह खुद इस क्षेत्र का व्यवसाय चलाती हैं। क्रिकेट के खिलाड़ी जसप्रीत बुमराह का नाम है।
उपरोक्त सूची में एक भी लेखक का नाम नहीं है। एक भी पत्रकार का नाम नहीं है। एक भी सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद्, विद्वान और चिंतक, यूट्यूबर का नाम नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं है कि उन्होंने इस सूची में इन क्षेत्रों से कोई नाम क्यों नहीं चुना? मुख्य प्रश्न यह है कि वे मजबूत भारतीय होने को कैसे देखते हैं और इसका चुनाव किस आधार पर करते हैं? उनके लिए मजबूत भारतीय होने का अर्थ क्या है?
मजबूत होने का अर्थ सत्ता में बने रहना, पद को बचाये रखना ही है तब तो इस सूची में 20वें नम्बर पर ज्ञानेश कुमार को रखने को समझा जा सकता है। लेकिन, इस चुनाव का अर्थ क्या है? ज्ञानेश कुमार की मजबूती है कि उनके द्वारा लाए गए एसआईआर ने बंगाल की मतदाता सूची में महिलाओं की संख्या को पुरूषों को मुकाबले नीचे ला दिया है। सबसे गरीब लोगों को मतदाता सूची के निर्माण में सबसे ज्यादा तकलीफ उठानी पड़ी है।
करोड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब हो गये जबकि ऐसे मतदाताओं की संख्या बढ़ गई जिनकी पहचान संदिग्ध मानी गई है। ऐसे में, यह सवाल बनता है कि इंडियन एक्सप्रेस ‘मजबूत’ होने को किन अर्थों में परिभाषित कर रहा है?
इन मजबूत लोगों की सूची में नीतिश कुमार का नाम 84वें नम्बर पर है। उनकी मजबूती को कैसे परखा जाये? भारत के एक मजबूत राजनेता माने जाने वाले नीतिश कुमार हाल ही में हुए बिहार विधान सभा चुनाव में एक कमजोर होती हुई पार्टी के लगातार कमजोर होते हुए नेता हैं जो लगातार नेपथ्य में जाने के लिए अभिशप्त हो गये हैं। वह अपने पद को बचा पाने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में, उनकी मजबूत लोगों की सूची में आना राजनीति के किस पक्ष को दर्शाता है?
हाल ही के दिनों में लद्दाख में सक्रिय सोनम वांगचुक ने पर्यावरण, समाज और राजनीति को लेकर जिस तरह से हस्तक्षेप किया उसका असर भारत के हर हिस्से पर पड़ा। उनकी अपने राज्य से दिल्ली तक की यात्रा और उसके बाद अपनी मांगों को लेकर आंदोलन को तेज करने के कारण उन्हें एनएसए के तहत जेल में डाल दिया गया। छह महीने के भीतर वह जेल से बाहर आ गये। उनके आंदोलन और उनके व्यक्तित्व को लेकर जितनी चर्चा और बातें हुईं, शायद ही किसी और के बारे में हुई हों। उनका नाम इस सूची में नहीं है।
सबसे हैरानी की बात है कि इसमें एक भी पत्रकार का नाम नहीं है। पिछले एक साल में भारत की विदेश नीति, राजनीति और विश्व की भू-राजनीतिक परिदृश्य पर सैन्य रणनीति से लेकर राजनीतिज्ञों की उपस्थिति को लेकर फोर्स पत्रिका के संपादक प्रवीन साहनी ने हस्तक्षेप किया है उसका भारत की सरकार की विदेश नीति पर भले ही फर्क न पड़ा हो, लेकिन इसका असर उसके निचले हिस्सों पर जरूर पड़ा है।
दुनिया के बदलते परिवेश को जिस तरह से उन्होंने विश्लेषित किया है और उस आधार पर अनुमान लगाया वे बहुत हद तक सच् साबित हुई हैं। उनके विश्लेषणों ने मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना करने का एक पुख्ता आधार दिया है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेखकों और विद्वतजनों के नामों से रहित इन 100 लोगों की सूची का 90 प्रतिशत हिस्सा ऐसे लोगों से भरा हुआ है जो सत्ता प्रतिष्ठानों के दायरे में हैं। इस सूची को जारी करते समय अखबार ने पत्रकारों के नामों को भी इसमें शामिल नहीं किया है। जबकि आज के दौर में मीडिया संस्थानों का अधिकांश हिस्सा और पत्रकारों का मुख्य हिस्सा सत्ता के काफी करीब जाकर बैठ चुका है। ऐसे सफल पत्रकारों की सूची काफी लंबी है। मैं इस बार ऐसे पत्रकार का नाम इसमें देखना चाहता था।
खासकर उस पत्रकार का नाम इसमें जरूर होना चाहिए था जो दलाली का धंधा करते हुए पत्रकारिता के शीर्ष पर पहुंच गया है।
पत्रकारिता का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार रामनाथ गोयनका पुरस्कार देने वाले इस संस्थान की ‘सबसे मजबूत भारतीय’ की सूची मूलतः सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे लोगों की सूची है। यह भारतीय समाज के सत्ता के पिरामिड की शक्ल के शीर्ष को दिखाती है। यह उन लोगों को नहीं गिनती जिन्हें सत्ता प्रतिष्ठान ठेलकर किनारे कर दिया है।
यह सूची यह नहीं बताती है कि इस देश के लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी आदि कहां गये! इस सूची से यह जरूर समझा जा सकता है कि यह अखबार मजबूत होने का क्या अर्थ लगाता है? और, कमजोरों की श्रेणियां क्या हैं?
(अंजनी कुमार लेखक और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)