बुक स्टॉल बंद हो रहे हैं…

खाड़ी युद्ध की खबरों के बीच एक छोटी सी, परंतु बेहद ही महत्वपूर्ण खबर दबकर मर गई। मुंबई के सभी रेलवे स्टेशनों से ‘एएच व्हीलर’ के बुक स्टॉल्स को अलविदा कह दिया गया। कमोबेश, देशभर में यही हाल है। केंद्र ने इन्हें मल्टीपरपज स्लॉट में तब्दील करने की अनुमति जो दे रखी है। लिहाजा, कल तक जहां सूचनाओं का, ज्ञान का और विज्ञान का सागर उफान मारता था, वहां आज बिस्कुट-वेफर्स की लड़ियां लटक रही हैं। इसे देश का वैचारिक पतन न कहें तो क्या कहें?

देश की तमाम जनता के लिए चंद बुक स्टॉल्स का बंद होना शायद कोई मायने न रखता हो। सरकार के लिए तो यह बेफिजूल की सुविधा थी ही या यूं कहें कि किसी मुहिम का हिस्सा। जो भी हो, इतना तो तय है कि देश के उत्थान व सामाजिक विकास के लिए यह एक बड़ा डिजास्टर साबित होने जा रही है। शायद आज के दौर में जारी खाड़ी युद्ध से भी बड़ा।

दुनिया ने सूचनाओं के अभाव में कई डिजास्टर देखे हैं। अफवाहों ने अनेक अवसरों पर हमें भारी क्षति पहुंचाई है। तब भी हम सामाजिक शिक्षा की खिड़की बंद कर रहे हैं। भरोसेमंद फिजिकल सूचनाओं को दूर करके अविश्वसनीय डिजिटल इनफॉरमेशन युग की शरण में जा रहे हैं।

यह जानते हुए कि सत्य से अनभिज्ञ और वैचारिक अक्षम व्यक्ति, न केवल खुद के व खुद के परिवार के लिए नुकसानदेह होता है बल्कि वो देश व समाज के लिए भी घातक ही होता है। वह बहुतांश गलत पैâसले लेता है। जिसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है। हमारे देश को भी आज वही भुगतना पड़ रहा है।

वैचारिक सोच पर लगाम

बुक स्टॉल कभी भी व्यापार का साधन नहीं थे। यह जनता को वैचारिक तौर पर सजग रखने का माध्यम थे। ब्रिटिश इंडिया में जब अंग्रेजों ने इन्हें शुरू किया था, तब तो वे हम पर अनवरत शासन चाहते थे। ऐसे में सजग समाज और लोगों की वैचारिक उन्नति उनके आड़े आ सकती थी, जनता अधिकारों की बात कर सकती थी, अच्छे-बुरे का अंतर समझ सकती थी, क्रांति का हिस्सा बन सकती थी और सबसे महत्वपूर्ण वो देश-दुनिया में क्या चल रहा है, इसका सही-सही मूल्यांकन भी कर सकती थी।

तब भी अंग्रेजों ने सूचना प्रसार के मूलभूत अधिकार की भावना से, न केवल बुक स्टॉल्स की शुरुआत की, बल्कि उन्हें अंत तक जारी भी रखा। इंग्लैंड से निर्मित लकड़ी का एक बुक स्टॉल मुंबई मंगवाया गया और उसे तत्कालीन विक्टोरिया टर्मिनस पर स्थापित किया गया। देखते ही देखते देशभर में व्हीलर की ब्रांच खुल गई। बस अड्डों, अस्पतालों और हर उस स्थान पर बुक स्टॉल नजर आने लगे, जहां जन-जमावड़ा होता। लोग पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते, विचार-विमर्श करते और उसी के आधार पर निर्णय भी लेते।

गलती की संभावना कम हो गई, क्योंकि पत्र-पत्रिकाएं उनके लिए ‘रियल लाइफ सिलेबस’ बन चुकी थीं। छात्रों के स्कूली पाठ्यक्रम की तरह असल जिंदगी में अखबार लोगों के लिए पाठ्यक्रम की भूमिका निभा रहे थे और जब देश आजाद हुआ, तब चुनी हुई सरकारों ने भी इसे जारी रखा। सशक्त बनाया, ताकि हिंदुस्थानियों की वैचारिक उन्नति जारी रहे। यह सरकार की सामाजिक प्रतिबद्धता थी। वो जानती थी कि समाज शिक्षित रहेगा तभी शासन सुदृढ़ होगा। अफवाहों को कान नहीं मिलेंगे। लिहाजा सरकारें कटिबद्ध थीं।

नीयत पर सवाल

परंतु दुर्भाग्य, जैसे ही सत्ता बदली, शिक्षा का महत्व क्षीण हो गया। फर्जी जानकारियों और अफवाहों को सत्ता की सीढ़ी बना लिया गया। बुक स्टॉल्स मुनाफे का साधन मान लिए गए। मुनाफा नहीं तो स्टॉल नहीं। सत्ता के शीर्ष को इनका महत्व और उपयोगिता या तो समझ नहीं आई या उन्होंने जानबूझकर इसे भुला दिया। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई स्कूल मुनाफे के लिए क्लास टीचर्स को ही क्लासरूम में ठेला लगाने की इजाजत दे दे। चाट-पकौड़ी बेचने की अनुमति दे दे।

जब टीचर्स को कहीं और ज्यादा मुनाफा व बेहतर ग्राहकी दिखेगी तो शिक्षा खुद ब खुद नेपथ्य में चली जाएगी। पश्चिमी देशों ने भी कभी यही किया था। उन्हें जिस देश को बर्बाद करना होता, वहां आधुनिक जीवनशैली, खुलापन, हिप्पी संस्कृति और नंग-धड़ंगवाद लाद दिया जाता।

आज सूचनाओं के मामले में हिंदुस्थान में भी वही हो रहा है। तब सवाल उठता है कि आखिर सरकार की मंशा क्या है? क्यों बुक स्टॉल्स बंद किए जा रहे हैं? क्या सूचना तंत्र देश में नुमाइश का साधन मात्र बनकर रह गए हैं, जिस तरह व्हीलर के पहले बुक स्टॉल को सजाकर रखा जाना है? या यह केंद्र के मौजूदा नेतृत्व के गुणधर्म की समाज पर प्रतिछाया है, जहां शिक्षा से ज्यादा व्यापार को महत्व है?

यदि हां, तो इस आधार पर भी अति मुनाफावादी व्यापार, चाहे वह भौतिक वस्तुओं का हो, भावनाओं का हो या फिर राजतंत्र का, दीर्घकाल में घातक ही साबित होता है। आज बौद्धिक वर्ग में ऐसे तमाम सवाल हैं।

सभ्य समाज में सूचनाओं के महत्व को जानते हुए भी जब ऐसे कदम उठाए जाते हैं, तब राजा की नीयत पर संदेह होता है। माना, हर व्यक्ति अपने गुणधर्म के आधार पर ही काम करता है, जो शिक्षित होता है वह शिक्षा पर जोर देता है और जो व्यापारी होता है वह व्यापार पर, परंतु तब भी जब कोई सत्ता के शीर्ष पर आता है, राजा की हैसियत में होता है तो उसके लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह समाज और देश हित में कदम उठाए।

आज समाज और देश हित में यही है कि विश्वसनीय सूचनाओं के साधन अनवरत चलते रहे। चलते ही नहीं रहे बल्कि उनका और भी विकास हो, क्योंकि जब इनका विकास होगा, तभी देश और देशवासियों का विकास हो सकेगा। समाज सुदृढ़ हो सकेगा। अन्यथा सबका पतन तय है!

(दोपहर का सामना, मुंबई के स्थानीय संपादक अनिल तिवारी का लेख साभार)

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