क्या होता है जब साम्प्रदायिक नफरत की लहरें किसी के घर के अंदर तक पहुँच जाएँ? ऐसी लहरें जिनका मकसद सहानुभूति, विश्वास, सहयोग जैसे सामजिक, संवैधानिक, और मानवीय मूल्यों को नुकसान पहुँचाना हो? ये लहरें ऐसा डरावना वातावरण बनाती हैं जिसमें बेकसूर लोगों की चीखें सुनाई देती हैं और अपराधी ठहाके लगाकर हँसते हैंI नफ़रत की उन लहरों को राष्ट्रवाद के सबसे घटिया नारों के शोर के आधार पर सही साबित करने की कोशिश की जाती हैI
शायद ऐसे ही लोगों के लिए सैमुअल जॉनसन ने कहा था कि “राष्ट्रवाद दुष्टों की अंतिम शरणस्थली है।” इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रवादी बुरे होते हैं I लेकिन अनेक बुरे, आवारा, अपराधी राष्ट्रवाद का चोला ओढ़ लेते हैं I
राष्ट्रवाद का चोला पहने ऐसे अपराधी समाज के कमजोर तबकों को अपनी अपराधी गतिविधियों का शिकार बनाते रहते हैं I लेकिन ऐसे शिकारियों को कभी-कभी साहसी और समझदार व्यक्ति मिल जाते हैं जिनके सामने ऐसे अपराधियों के तमाम तीर निशाने से चूक जाते हैं I
“नमस्कार, मैं बीरेंद्र सिंह रावत I आज की कहानी नफ़रत की लहरों की दिशा मोड़ देने वाली उन लड़कियों की कहानी है I उन लड़कियों की जिन्होंने अपनी छोटी सी दुनिया में उस बड़ी नफरत को चुनौती दी। और कुछ देर के लिए ही सही, लेकिन नफ़रत की लहरें थम सी गयीं I ये कहानी उन दो लड़कियाँ की है जिन्होंने अपनी शिक्षा, समझदारी, और साहस के बल पर बजरंग दल जैसे हिंसक साम्प्रदायिक गिरोह का न केवल सामना किया, बल्कि उस गिरोह को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया ।
घटना इस साल की 15 मार्च की है। मैं एक संस्था के बुलावे पर उत्तराखंड के उधमसिंह नगर में सितारगंज नाम के छोटे से शहर में गया हुआ था। संस्था चाहती थी कि मैं उनकी टीम के साथियों को डेवलपमेंट सेक्टर के आंकड़ों की समझ के महत्त्व पर ट्रेनिंग दूं। वह ट्रेनिंग-कार्यक्रम 15 मार्च से 17 मार्च तक था।
15 मार्च की शाम को 5:00 बजे के करीब पहले दिन की ट्रेनिंग का काम खत्म हुआ। सभी लोग हंसी-खुशी अपने-अपने घरों और कमरों की ओर लौटने लगे। अगले दिन सुबह पता चला कि 15 मार्च की शाम को उस संस्था के दो साथियों के साथ बजरंग दल के सदस्यों ने हिंसा की।
धीरे-धीरे उस घटना से संबंधित जानकारियां उजागर होने लगी। उस संस्था में 10 लड़के-लड़कियां काम करती हैं। वे सभी उच्च शिक्षा प्राप्त समझदार लोग हैं। सभी-के-सभी देश के अलग-अलग राज्यों से आकर उत्तराखंड के सितारगंज में किसानों को खेती के काम में मदद करने वाले एक प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं I
पहले ही दिन की ट्रेनिंग के दौरान मुझे उनमें सीखने के प्रति उत्साह के अनेक संकेत मिले। वे अपने काम को और बेहतर करने के लिए ट्रेनिंग में शिद्दत के साथ भागीदार थे। ट्रेनिंग के दौरान उनके द्वारा पूछे गये सवाल इस बात का सबूत थे कि वे उत्तराखंड के किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए अपने काम में और भी ज्यादा दक्ष होना चाहते थे और इसके लिए वे आंकड़ों के महत्त्व को ध्यान से समझ रहे थे।
जो नौजवान उत्तराखंड के किसानों के हित के काम में लगे हुए हैं, उन नौजवानों पर उत्तराखंड में बजरंग दल के सदस्यों ने हमला किया। बजरंग दल के सदस्यों ने उनमें से दो लोगों को 3 घंटे तक बंधक बना कर रखा। उन्होंने उन दोनों के साथ मारपीट भी की। उन्होंने उनके साथ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया।
देश के अलग-अलग राज्यों ओर राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आकर उत्तराखंड में काम कर रहे उन लड़के-लड़कियों को अपनी तरह के लोगों से बात करने की जरूरत महसूस होती होगी, इसलिए काम खत्म करने के बाद वे एक दूसरे से मिलते हैं, चाय पीते हैं, बातचीत करते हैं और इस तरह से एक अनजान शहर में अकेले रहने के दबाव को कम करने की कोशिश करते हैं।
उस घटना में शामिल लोगों और संस्था की निजता का ध्यान रखते हुए, मैंने घटना में शामिल लोगों के नाम बदल दिये हैं I तो घटना इस तरह से है कि 15 तारीख की शाम को असलम नाम का लड़का, रजनी नाम की लड़की से मिलने गया। ऑफिस बंद होने के बाद वे एक दूसरे से मिलने जाते ही थे। घर से दूर उनका समय एक दूसरे के सहारे ही कटता हैI दुःख-तकलीफ़ में भी वे एक दूसरे का सहारा बनते हैं। तो उस दिन असलम, रजनी से मिलने पहुंचा ही था कि बजरंग दल के सदस्यों ने उसे घेर लिया। वे गुंडे रजनी के कमरे में घुस गये।
उन्होंने रजनी और असलम से उनके फोन छीन लिए। उन्होंने उन दोनों को तीन घंटे तक बंधक बनाए रखा। क्योंकि उनके फोन बजरंग दल के सदस्यों के कब्जे में थे, इसलिए वे किसी को खबर भी नहीं कर सके, कि उनके साथ क्या-क्या हो रहा है। उन्होंने असलम को मारा-पीटाI उन्होंने असलम और रजनी को भद्दी-भद्दी गालियां दी। वे चाहते थे कि रजनी यह लिखकर दे कि असलम उस पर धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव बनाता है। वे गुंडे यह भी चाहते थे कि रजनी यह भी लिख दे की असलम उसे सताता है।
उन सदस्यों ने रजनी पर बहुत दबाव बनाया। जब रजनी पर दवाब का असर नहीं पड़ा तो उन्होंने गुंडागर्दी की डिग्री और भी बढ़ा दी I जब-जब रजनी उनकी बात मानने से इंकार करती तब-तक वे गुंडे असलम को पीटना शुरू कर देते I रजनी नहीं चाहती थी कि असलम को और ज्यादा चोट लगे I ऐसे में एक अवसर आया जब रजनी ने उन गुंडों की इच्छा अनुसार वो सब लिख दिया, जो वे चाहते थेI
जिस दौरान भगवा गुंडों ने असलम और रजनी को बंधक बना रखा था, उसी दौरान उनकी एक टोली ने असलम के फोन में एक ऐप डाउनलोड कर दिया। उस एप का उपयोग करके उन्होंने असलम के फोन में सेव फोटोज में से असलम की उन फोटोज के अलग से फोल्डर बना दिये, जो फोटोज महिलाओं के साथ खींची गयी थी। वे फोटोज असलम की प्रोजेक्ट से जुड़ी किसान महिलाओं के साथ खींची गई फोटोज थी।
उन फोटोस को आधार बनाकर उन्होंने यह झूठ फैलाना शुरू कर दिया कि असलम अनेक हिंदू महिलाओं के साथ दोस्ती में है और इस आधार पर वे असलम पर वो आरोप लगाने लगे, जो आरएसएस और उससे जुड़े संगठन मुसलमानों पर लगाते रहे हैंI और वो आरोप है, “लव-जिहाद” करने का I इससे पता चलता है कि बजरंग दल के गुंडे, इस तरह के अपराध करने की व्यवस्थित ट्रेनिंग से गुजरते होंगे।
यहां पर चिंता की बात यह भी है कि अगर वे, असलम के फोन में कुछ ऐसी बात डाल देते जिसके आधार पर उस पर देशद्रोही होने का आरोप लगाना आसान हो जाता, तो असलम के लिए वह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती थी।
जब रजनी ने भगवा गिरोह की हिंसा से बचने के लिए उनके कहे अनुसार लिखकर दे दिया तो वे इसे अपनी जीत मानते हुए रजनी और असलम को लेकर थाने पहुंचे I लेकिन थाने में पहुंचकर कहानी में एक बिल्कुल ही नया मोड़ आ गया। उनको यह मालूम नहीं था कि वो जिस लड़की को नासमझ जानकर, असलम पर उसे बहकाने का आरोप लगा रहे हैं और जिस लड़की के सहारे वे एक बेकसूर भारतीय नागरिक को बदनाम करके अपनी विभाजनकारी राजनीति को चमकाना चाह रहे हैं, वह लड़की समझदार और बहादुर है।
थाने में रजनी ने बेहद साहस और समझदारी के साथ कहा कि उसने जो कुछ लिखा, वह सरासर गलत है I उसने पुलिस के अफसरों को बताया कि उसने भगवा गुंडों की हिंसा से बचने के लिए वह बात लिखी दी थी, जो सच नहीं है। इस पूरी घटना में सितारगंज की पुलिस का एक कानून सम्मत पक्ष भी सामने आया।
उन्होंने रजनी के लिखे उस कागज को, रजनी को लौटा दिया जो उसने गुंडों के दबाव में लिखा था। अब रजनी ने थाने में वह कहा जो सच था। रजनी के साहस और समझदारी से घायल, हिन्दुत्त्व के गुंडे, किसी चाकू खाए सूअर की तरह थाने में चिचिआने लगे।
देर रात तक उस घटना की खबर रजनी और असलम के साथ काम करने वाले साथियों तक भी पहुंच गयी। उनके साथियों में से, एक साथी का जिक्र करना यहां बेहद जरूरी है I उनके उस साथी की प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए मैंने उसका काल्पनिक नाम सोनम रख लिया है। जब इस घटना की खबर सोनम को भी लगी तो वह थाने पहुंची और रजनी के साथ मिलकर हिंदुत्ववादी गिरोह के सदस्यों का जमकर मुकाबला करती रही।
रजनी के साहसी होने का पता इस बात से भी चलता है कि थाने में उन्होंने, बजरंग दल के गुंडों से कई कठोर सवाल पूछे। अगर उत्तराखंड में कानून का राज होता तो रजनी के सवालों के आधार पर पुलिस उन सदस्यों से, उनके द्वारा किए गए अपराधों के बारे में पूछताछ जरूर करती। लेकिन ऐसा तो तब होता, जब उत्तराखंड में कानून का राज होता।
घटना के विवरण बता रहे हैं कि उन गुंडों ने असलम और रजनी के साथ अनेक अपराध किये I जैसे:
- उनका एक अपराध तो यह है कि वे अनाधिकार किसी के कमरे में घुसे I
- उनका दूसरा अपराध यह है कि उन्होंने असलम और रजनी के साथ मारपीट की।
- उनका तीसरा अपराध यह है कि उन्होंने असलम का फोन छीना ।
- उनका चौथा अपराध यह है कि उन्होंने असलम के फोन के साथ छेड़छाड़ की I
मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अगर उत्तराखंड में कानून का राज होता तो परेशान बजरंग दल के सदस्यों को होना पड़ता ना कि बेकसूर असलम और रजनी को I
इस दौरान थाने के बाहर पितृसत्ता और हिन्दुत्त्व की समर्थक औरतें भी जमा हो गई I वे औरतें रजनी और सोनम को बेहद अपमानजनक नजरों से देख रही थी। उन औरतों को इस बात की समझ ही नहीं थी भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का उलंघन करके अपराध साम्प्रदायिक गिरोह ने किया हैI उन औरतों को इस बात की समझ नहीं थी कि वे गुंडे किसी की प्राइवेसी में घुसकर अपराध कर रहे हैंI
उन औरतों को इस बात की समझ नहीं थी कि अनाधिकार असलम और रजनी पर हिंसा करके अपराध बजरंग दल के सदस्यों ने किया है। वो साम्प्रदायिक गुंडे थे, जिन्होंने भारत के दो नागरिकों को 3 घंटे तक बंधक बनाकर रखा और उन पर हिंसा की I हिंदुत्व की समर्थक औरतों को इस बात की समझ ही नहीं थी कि वह अपराधियों के समर्थन में खड़ी हैंI
उधर संस्था में काम कर रहे नौजवानों के मकान मालिकों पर इस बात का दबाव पड़ने लगा कि वे उनको अपने मकान से हटाएI उन मकानों से जिसमें वे नौजवान किराए पर रह रहे थे। बजरंग दल के सदस्यों की वजह से संस्था के नौजवानों की नौकरियों और सितारगंज में उनके रुक पाने की संभावनाओं पर काले बादल मंडराने लगे।
पुलिस की तरफ से असलम और रजनी के परिवार वालों को खबर कर दी गईI अगले दिन यानी16 तारीख की रात 8:00 बजे तक असलम और रजनी को थाने से अधूरी मुक्ति मिली। अधूरी इसलिए क्योंकि पुलिस ने उन दोनों से कहा कि जब भी बुलाया जाएगा उन्हें आना पड़ेगाI
यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि अगर बजरंग दल के किसी गुंडे को 10-15 लोग घेरकर पीटने लग जाए, तो उसमें 10-15 लोगों का सामना करने का साहस नहीं होगा। लेकिन रजनी ने हिन्दुत्त्व के सदस्यों के पूरे गिरोह का सामना कियाI रजनी बहादुर है और बजरंग दल के सदस्य गुंडे हैं। वे केवल भीड़ बनकर ही बोल सकते हैं। क्योंकि उनके पास नैतिक और कानूनी आधार नहीं होता। रजनी के पास सच और उदार विचारों का बल था। सोनम के पास भी उदार विचारों का बल था, जिसके सहारे वह असलम और रजनी के साथ खड़ी रही।
रजनी और सोनम दोनों हिंदू हैंI क्या हिंदुत्व को रजनी और सोनम जैसी सच्ची और साहसी लड़कियां पसंद आती हैं। नहीं, हिंदुत्व के राजनीतिक प्रोजेक्ट में रजनी और सोनम जैसी हिन्दू लड़कियां फिट नहीं बैठती I हिंदुत्व के राजनीतिक प्रोजेक्ट के लिए झूठी, और कमजोर लड़कियां चाहिए I ऐसी लड़कियां, जो नफ़रत करना जानती हों और जो उदार विचारों से दूरी बनाकर जीती होंI हिंदुत्व के प्रोजेक्ट के लिए इतनी कमजोर लड़कियां चाहिए, जो लड़की होकर भी लड़कियों के संवैधानिक अधिकारों के विरुद्ध खड़ी होने को तैयार रहें।
हिंदुत्व को ऐसी लड़कियां पसंद होती है जो सशक्त तो नहीं होती, लेकिन जिनको सशक्त होने का भ्रम जरूर रहता है। हिंदुत्व की पाठशाला, उन लड़कियों को सशक्त होने के भ्रम में जीना सिखा देती है। हिंदुत्व की महिलाएं इतनी ही सशक्त होती हैं कि वे अपने ही हाथों से अपनी आजादी की कब्र खोद सकती हैं। वे झूठ बोलने में सशक्त होती हैं। वे निर्दोष को फंसाने वाले गिरोह का साथ देने के लिए सशक्त होती हैं। वे सच बोलती रजनी और सोनम के खिलाफ नारे लगाने के लिए सशक्त होती हैं।
हिंदुत्ववादी संगठन, उन हिंदू महिलाओं को पसंद करता है जो उनके झूठ के अनुसार अपने आप को झोंक देने के लिए तैयार रहती हैं। यह संगठन, रजनी और सोनम जैसी हिंदू महिलाओं को पसंद नहीं कर सकता, जो सच और संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ी रहती होती हैं।
उत्तराखंड के सितारगंज में हुई उस घटना से एक बार फिर से लड़कियों के शिक्षित होने और उदार विचारों से उनका परिचय होने के मत को बल मिला है । अगर भारत को बेहतर लोकतंत्र के रूप में विकसित होना है तो भारत को रजनी और सोनम जैसी करोड़ लड़कियों की जरूरत है।
हिंदुत्व का विचार, अतार्किंक और अलोकतांत्रिक विचारों की हिंदू लड़कियों को पसंद करता है। हिंदुत्व का विचार, दास मानसिकता वाली हिंदू लड़कियां का होना I अगर किसी को इस बात पर शक हो तो वह विश्व हिंदू परिषद द्वारा बनाई गई दुर्गा वाहिनी की लड़कियों के विचारों को जानने की कोशिश कर सकता या कर सकती है।
दुर्गा वाहिनी, विश्व हिंदू परिषद की महिला विंग है। विश्व हिंदू परिषद के पुरुषों ने, हिंदू महिलाओं के लिए तीन लक्ष्य रखे हैं – सेवा, सुरक्षा, और संस्कार I इन तीन लक्ष्यों में से कोई भी लक्ष्य उन्हें संवैधानिक अधिकारों के अनुसार जीवन जीने के योग्य बनने की तरफ नहीं ले जाता। बल्कि पारिवारिक भूमिकाओं को निभाते रहने के संस्कार पर बल देकर, दुर्गा वाहिनी के माध्यम से हिंदू महिलाओं को अनेक संवैधानिक अधिकार हासिल करने से रोका जाता है और अनेक संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने से भी रोका जाता है I
जिन महिलाओं के दिमाग में यह बिठा दिया जाता है कि पारिवारिक भूमिकाएँ ही सबसे महत्त्वपूर्ण होती हैं, वे महिलाएं उन महिलाओं से नफरत कर सकती हैं जो आर्थिक आजादी और अन्य प्रकार की आजादियों को पारिवारिक भूमिकाओं से अधिक या बराबर का महत्व देती हैं I
उत्तराखंड के सितारगंज के थाने के बाहर जमा हुई अनेक हिंदू औरतों इसी सोच की लग रही थीं। वे महिलाएं रजनी और सोनम को ऐसे देख रही थीं मानो उन दोनों ने कोई अपराध किया हो I लेकिन उन हिंदू औरतों को हिन्दुत्त्ववादी अपराधियों से कोई दिक्कत नहीं थी।
बहुत ही आसानी से रेखांकित किया जा सकता है कि दुर्गा वाहिनी जैसे संगठन, हिंदू महिलाओं को ऐसी महिलाओं के रूप में विकसित करना चाहती हैं जो अपने संवैधानिक अधिकारों की इच्छा तक ना रखें। लेकिन रजनी और सोनम ने उदार शिक्षा पायी थी, इसलिए उन्हें पता है कि नौकरी करना उनका अधिकार है I उन्हें यह भी पता है कि अपने सहकर्मियों से बात करना भी उनका अधिकार है।
इसलिए उत्तराखंड, भारत और दुनिया को ऐसी लड़कियों की जरूरत है ताकि किसी भी संप्रदाय के गिरोह संवैधानिक अधिकारों का हनन न कर सकें I उन संवैधानिक अधिकारों का जिन्हें सोचने और हासिल करने के लिए न जाने कितने ही स्त्री और पुरुषों ने संघर्ष किया और बलिदान दिये।
वह घटना 15 मार्च को घटी थी। 16 मार्च को असलम और रजनी को पुलिस वालों ने छोड़ दिया। और 17 तारीख को हम तीन लोग असलम के घर गए। दुआ सलाम के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। मैंने असलम की माँ को संबोधित करते हुए कहा कि जो कुछ हुआ उसमें असलम की कोई गलती नहीं है क्योंकि संस्था की एक लड़की ने हमें बताया था कि जब असलम की माँ थाने पहुंची तो उसकी माँ ने उस लड़की से कहा कि जिस समय असलम रजनी से मिलने गया था तुम लोगों ने उसी वक्त उसकी टाँगें क्यों नहीं तोड़ दीI
मेरी बात पर प्रतिक्रिया देते हुए असलम की मां ने कहा कि सारी गलती असलम की ही है। उन्होंने कहा कि असलम को पता होना चाहिए कि यह मुसलमान है और उसे देश में मुसलमान होने का क्या मतलब है? उन्होंने आगे कहा कि असलम को क्या असलम होने का पता नहीं है, की जगह-जगह मुसलमान के साथ क्या हो रहा है।
उन्होंने कहा कि जिस वक्त थाने से पुलिस वालों का फोन आया उस वक्त मुझे अपने बेटे का जनाज़ा दिखाई दे रहा था। यह बात कही तो मुझसे गयी थी लेकिन मेरे दोनों साथी भी उनकी उस बात से बेहद भावुक हो गये। असलम की माँ ने ज़ोर देकर कहा कि सारी गलती असलम की ही है।
दरअसल मैं और मेरे दोनों साथी अच्छी तरह से जानते थे कि गलती असलम कि थी ही नहींI लेकिन एक डरी हुई मां ऐसा कहने के अलावा और कह भी क्या सकती थी? उनकी बात में वर्तमान भारत की सच्ची तस्वीर थी। वह तस्वीर जिसे भारत के संविधान से नफरत करने वाली राजनीति और उसके संगठनों ने पिछले 10-12 सालों में बनाया है।
साम्प्रदायिक गिरोह और वास्तविक मुद्दे
2011 की जनगणना बताते हैं कि सितारगंज में जहां 53 प्राइवेट प्री-प्राइमरी स्कूल हैं, वहीँ एक भी सरकारी प्री-प्राइमरी स्कूल नहीं है।
सितारगंज में केवल एक सरकारी हॉस्पिटल है I जिसे सितारगंज का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कहते हैं I जबकि वहां 10 से 12 प्राइवेट हॉस्पिटल हैं I
सितारगंज उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में पड़ता है। उधम सिंह नगर की एनुअल पर कैपिटा इनकम यानी सालाना प्रति व्यक्ति आय 3 लाख के करीब है। यानी वहां की प्रति व्यक्ति महीने की आमदनी 25000 रुपए है I
अब आप 25 हज़ार रूपये में घर चलाना है, प्राइवेट अस्पताल से इलाज करवाना है, और छोटे बच्चों को प्राइवेट स्कूल्स में पढ़ाना हैI इस महंगाई के समय में यह बात आसानी से समझ में आनी चाहिए कि वहां के लोगों के लिए गुजारा चला पाना बहुत मुश्किल होता होगाI लेकिन साम्प्रदायिक गिरोहों को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे वास्तविक मुद्दों से कोई लेना देना नहीं होताI उनका मकसद नफ़रत की खेती करना और उसका राजनैतिक व्यापार करना होता है I
अगर किसी परिवार में दो बच्चे हैं और वह परिवार उनको प्री-प्राइमरी स्कूल में भेज रहा है तो उस परिवार के कम-से-कम एक हजार रुपए बच्चों की प्री-प्राइमरी स्कूल की फीस पर खर्च हो जा रहे होंगे।
भारत सरकार यह बात बता रही है कि भारत के लोग स्वास्थ्य पर आय का 40% खर्च करते हैं। यानी उस जिले की प्रति व्यक्ति मासिक आय पच्चीस हज़ार रूपये है और उसमें से भी औसतन 40% यानी दस हज़ार रूपये स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च हो जाते हैं।
इन आंकड़ों से हमें पता चलता है कि उत्तराखंड के सितारगंज में रहने वाले लोग कम-से-कम ₹1000 तो अपने बच्चों की प्री-प्राइमरी एजुकेशन पर और ₹10000 प्राइवेट अस्पताल से स्वास्थ्य सेवाएं लेने पर खर्च कर रहे हैं I इस प्रकार वहां के लोग केवल दो हेड्स में 11,000 रुपए खर्च कर रहे हैं I ₹25,000 की औसत आमदनी में से अगर हम ₹11,000 घटा दें तो उनके हाथ में एक महीने के गुजारे के लिए मात्र ₹14,000 बचते हैं।
इतने कम पैसे में वहां के लोग कितनी मुश्किल से अपने परिवार की जिम्मेदारियां को निभाते होंगे, इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है। अभी तक दी गयी जानकारियों में एक और जानकारी जोड़ लेने पर महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच के बारे में चौकाने वाली बात उजागर होती है I एक परिवार स्वास्थ्य सेवाओं पर अपनी जेब से जितना पैसा खर्च करता है, उसका केवल 6 फ़ीसदी ही महिलाओं के इलाज पर खर्च करता है I
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर के लोग अपनी जेब से 10 हज़ार रूपये महीना खर्च करते हैं I इसमें से वे मात्र 600 रूपये ही महिलाओं के इलाज पर खर्च करते हैं I
अगर महिलाओं को कोई खतरा है तो वो परिवार और समाज में बसी पितृसत्ता से है, जिसके कारण उनके स्वास्थ्य पर तुलनात्मक रूप से बेहद कम खर्च किया जाता है I अगर महिलाओं को खतरा है तो वो राज्य की उन नीतियों से है जिनमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का बहुत महत्त्व नहीं रह जाता I जिन नीतियों के तहत राज्य ने स्वास्थ्य सेवाओं को निजी पूंजीपतियों के हवाले कर दिया है I
लेकिन हिंदुत्ववादी गिरोह को इन जानकारियों से कोई लेना-देना नहीं है I क्योंकि, इन गिरोहों को अपनी सांप्रदायिक गतिविधियां जारी रखने की इजाजत तभी तक मिली हुई है, जब तक ये लोगों के वास्तविक मुद्दों को नहीं उठाते I ये गिरोह जिस दिन अपने संगठन की शक्ति को सरकारी प्री-प्राइमरी स्कूल खोलने हेतु दवाब बनाने में लगा देगा, उस दिन प्रशासन इन्हें सड़कों पर नहीं उतरने देगा।
बजरंग दल जैसे संगठन से जुड़े हुए लड़कों को इस बात का जरा भी एहसास नहीं होने दिया जाता कि उनके माता-पिता की जेब से 40% कमाई निजी अस्पतालों से स्वास्थ्य सेवाएँ हासिल करने पर खर्च हो रही है। जबकि उनके माता-पिता, उस कमाई का उपयोग उन्हें बेहतर आवास, बेहतर भोजन, बेहतर शिक्षा उपलब्ध करवाने में कर सकते हैं ।
इसलिए यह बात समझने की है कि बजरंग दल जैसे संगठन से जुड़े हुए लड़के कितने बेचारे हैं I उनकी हालत उस लड़के के जैसी है जो किसी नन्ही सी चिड़िया को तो अपनी मुट्ठी में दबाकर बहुत खुश हो रहा है, लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि उससे कुछ ही दूरी पर एक भेड़िया उस पर नजर रखे हुए है।
राज्य की जिन नीतियों के कारण सितारगंज में केवल एक सरकारी हॉस्पिटल है, जबकि वहां 10 से 12 प्राइवेट हॉस्पिटल हैं और उन्हीं नीतियों के कारण 2011 की जनगणना के अनुसार सितारगंज में एक भी सरकारी प्री-प्राइमरी स्कूल नहीं है I बजरंग दल जैसे संगठन, साम्प्रदायिक माहौल बनाकर वैसी ही नीतियाँ जारी रखने में सरकार की मदद करते हैं जिन नीतियों के कारण उनके घर की औरतें भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं I
उत्तराखंड मानव विकास रिपोर्ट 2019 के अनुसार उत्तराखंड में परिवार अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों प्रकार की बीमारियों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की तुलना में निजी स्वास्थ्य सुविधाओं पर अधिक निर्भर हैं। उत्तराखंड के 78% परिवार अल्पकालिक बीमारियों और 77% परिवार दीर्घकालिक बीमारियों के लिए निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हैं I जबकि 22% परिवार अल्पकालिक बिमारियों और 23% परिवार दीर्घकालिक बीमारियों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर हैं I
वैसे तो राज्य सरकार खुद कह रही है कि उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद खराब है I उसमें भी देहरादून के बाद उधम सिंह नगर राज्य का दूसरे नंबर का जिला है जहाँ सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बेहद खराब है I उधम सिंह नगर के 64% परिवार निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं I
तो जिस राज्य और जिस जिले के लोगों के पास बेसिक सुविधाएँ बहुत कम हैं, उस राज्य और जिले के युवा अपना कीमती समय लड़के-लड़कियों की जासूसी करने में लगा रहे हैं I उन युवाओं को इस बात का अहसास ही नहीं है कि उनके घर के लोगों को, और विशेषकर महिलाओं को बुनियादी नागरिक सुविधाएँ नहीं मिल पा रही हैं I
उत्तराखंड में भी बजरंग दल इस झूठ में जीता है कि वो महिलाओं की सुरक्षा करता है I बजरंग दल के लोगों को भारत सरकार की रिपोर्ट राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – 5 रिपोर्ट पढ़नी चाहिए I सरकार की रिपोर्ट बता रही है कि देश की तरह, उत्तराखंड में भी महिलाओं के साथ पति के द्वारा सभी तरह की हिंसाएँ की जाती हैं I यह रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड में 15 फ़ीसदी महिलाएँ पति द्वारा की जाने वाली हिंसाओं की शिकार हैं I
एक अनुमान के अनुसार उत्तराखंड में 18-59 वय समूह की 25 से 30 लाख महिलाएँ हैं I आगे हम इसका औसत 27.5 लाख मानकर चलें और यह मान लें की इनमें से 80% महिलाएँ शादीशुदा होंगी तो इसका मतलब है कि उत्तराखंड में 22 लाख महिलाएँ शादीशुदा हैंI इनमें से कम-से-कम 15% पति के द्वारा की जाने वाली हिंसा की शिकार हैं I इसका अर्थ यह हुआ कि उत्तराखंड में 3 लाख 30 हज़ार महिलाएँ अपने पति द्वारा की जाने वाली हिंसा का शिकार हैं I
लेकिन बजरंग दल जैसे साम्प्रदायिक संगठन इन 3 लाख 30 हज़ार महिलाओं को पीड़ित नहीं मानते I हम जानते हैं कि उत्तराखंड में करीब 84% हिन्दू हैं I तो 3 लाख 30 हज़ार का 84% हुआ – 2, 77, 200 I यानि कम-से-कम 2 लाख 77 हज़ार हिन्दू महिलाएँ अपने हिन्दू पतियों की हिंसा का शिकार हैं I लेकिन साम्प्रदायिकता की ऐनक लगाये हिन्दू-साम्प्रदायिक संगठनों को उनके खिलफ होने वाली हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है I क्योंकि उनके लिए वास्तविक हिंसा को मुद्दा बनाना लाभदायक नहीं है I
उनके लिए काल्पनिक हिंसा को मुद्दा बनाना लाभदायक होता है और रजनी के मामले में भी उन्होंने यही किया I जो लड़की अपने साथ काम करने वाले लड़के के साथ हंस-बोल रही है I जो उस साथ से सहज और खुश है, बजरंग दल को वहां जबरदस्ती हिंसा दिखने लगीI
यह रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड में 43 फ़ीसदी महिलाएँ ख़ून की कमी से जूझ रही हैंI लेकिन बजरंग दल जैसे साम्प्रदायिक गिरोह को महिलाओं से जुड़े असली मुद्दों से कुछ लेना-देना नहीं है I वे महिलाओं के असुरक्षित होने की कल्पना करते हैं और किसी काल्पनिक खतरे को ढूंढते रहते हैं I
असलम और रजनी के मामले में भी उन्होंने यही किया I उन्होंने कल्पना कर ली कि रजनी खतरे में है I जबकि थाने में रजनी द्वारा कही गयी बातें, बता रही हैं कि रजनी के लिए असली खतरा बजरंग दल वाले ही थे I जो अपराधियों की तरह उसके कमरे में घुसे I जिन्होंने उसके साथ हिंसा की, उसका फ़ोन छीना, उसे तीन घंटे तक बंधक बनाया, उसकी इच्छा के विरुद्ध उससे बयान लिखवाया और उसकी निजता को भंग किया I
लेकिन सितारगंज की उस घटना से एक बात तो और भी पक्की हो गयी कि बजरंग दल जैसे साम्प्रदायिक गिरोह को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए रजनी और सोनम जैसी लाखों लड़कियों की जरूरत है I जरुरत है, उदार मूल्यों वाली शिक्षा की, जिसमें दीक्षित होकर भारत के लड़के और लडकियाँ हर धर्म से जुड़े साम्प्रदायिक संगठनों के सामने तनकर खड़ी रह सकें, ताकि भारत संवैधानिक नैतिकताओं के अनुसार जीने और विकसित होने वाला राष्ट्र बन सकेI
(बीरेंद्र सिंह रावत, शिक्षाशास्त्र विभाग, दिल्ली-विश्वविद्यालय में कार्यरत हैंI