काक्रोच के बाद अब सूअर के दिन फिरे!

यक़ीनन देश की फिज़ा जबरदस्त बदलाव की ओर अग्रसर है। पिछले दिनों जब हमारे देश के सीजेआई ने बेरोजगारों को काक्रोच और परजीवी शब्द से नवाजा तो जेन ज़ेड ने तूफान खड़ा कर दिया। काक्रोच के सदियों पुराने इतिहास को खंगाला गया और उसकी जीवटता को अद्वितीय बताया गया। जिसने युवाओं में उर्जा भरने का काम किया। वे ऐसे जुटे कि उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के फालोअर्स को बहुत पीछे छोड़ दिया। सत्तारूढ़ दल ने तत्काल नए रोजगारों का ऐलान करने की मुनादी कर दी।

इस बीच उपेक्षित काक्रोच को गरिमा दिलाने शानदार कविताएं और लेख लिखे गए। कहने का आशय यह है कि एक नन्हें से कीट ने सोशल मीडिया और लोगों के ज़हन में अपना स्थान बना लिया। एक समय लोग चींटी की ताकत की कहानियां सुनते थे जिसने गजराज की सूंड़ में घुसकर अपनी अहमियत समझाई थी। वसुधैव कुटुम्बकम की इस सनातनी भावना का स्वागत होना चाहिए। काक्रोच का रुतबा देखिए सीजेआई भी सफाई देने बाध्य हुए।

क्राकोच के हंगामे का बुखार अभी उतरा भी नहीं था कि कुर्बानी का पर्व ईदुलअज़हा आ गया। नवरात्रि पर्व पर पशु बलि देने वाले और अपनी मन्नत पूरी करने बच्चों की बलि देने वाले लोग भी ईदुल अज़हा पर कुर्बानी पर विरोध जताने लगे। बंगाल में गाय की कुर्बानी देने से मुसलमान भाईयों ने इनकार कर दिया तो गाय बेचने वाले हिन्दू भाइयों का रोजगार ठप्प होते देख वहां के मुख्यमंत्री को यह घोषणा करना पड़ी कि 14वर्ष वाली यानि वृद्ध गाय बेची जा सकती है। यह गाय की तौहीन है।

उधर, सूअर के भी दिन फिरते दिखायी दिए। कहा जाता है कि धरती पर जब मल की गंदगी बहुत बढ़ गई तो भगवान को उसे साफ़ करने वाराह अवतार लेकर धरा पर आना पड़ा। आश्चर्य की बात है जिस जानवर को अब तक घृणास्पद जानवर माना जाता रहा। जिसको गाली के रुप में इस्तेमाल किया जाता है।उसे सनातनियों ने गोद में लेकर प्यार का इज़हार ही नहीं किया बल्कि उसे घर-घर में पालने की भी इच्छा जाहिर की है ताकि उनके घर मुस्लिमों से सुरक्षित रह सकें।

क्योंकि मुसलमान सूअर से नफ़रत करते हैं क्योंकि इस्लाम की पवित्र पुस्तक, कुरान में कई जगहों पर सूअर के मांस को खाने से स्पष्ट रूप से मना किया गया है। सूअर की आदतें और उसका खान-पान काफी अलग होता है। इसे अस्वच्छ माना जाता है, इसलिए इसे शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धता के खिलाफ माना गया है। इसलिए सूअर शब्द आते ही वे तौबा-तौबा करते हैं।

बहरहाल, सूअर को महत्ता देकर उसके पालन से हमारा रुतबा निश्चित तौर पर बढ़ेगा। वसुधैव कुटुम्बकम में धरा के सभी जीव-जंतु मानव शामिल होते हैं किंतु मुसलमान इसमें नहीं आते।

बड़ा मुश्किल है, धर्मांध लोगों को समझाना वे मछली, मुर्गा, बकरा, सूअर खा सकते हैं लेकिन दूसरों के अन्य मांस खाने से नफ़रत करते हैं। नागालैण्ड में तो कुत्ते और सांपों को चाव से विशिष्ट भोजन के रुप में खाया जाता है।यह भी जानकारी में है कि सप्ताह में एक ट्रेन सिर्फ गाय, बैल, भैंस आदि लेकर लेकर दीमापुर जाती है। जहां से नागालैण्ड इसकी सप्लाई होती है। इसलिए हमारे संविधान में किसी के खान-पान पर कभी निषेध की बात नहीं आई।

लेकिन बदलते भारत में आज केंचुआ की ताकत से लोकतंत्र और संविधान की जड़ें हिल चुकी हैं और ज़मीन खोखली हो गई है। तब जो भी हो रहा है उसकी तारीफ ही करनी चाहिए। मुझे तो प्रसन्नता इस बात की है कि काक्रोच और सूअर के दिन फिर रहे हैं यकीन रखिए। कभी ना कभी हम सब के दिन भी फिरेंगे। इंतज़ार करें।

(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार हैं।)

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