परिसीमन के मुद्दे पर दक्षिण भारत बनेगा मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती?

कर्नाटक में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी एक मंच पर दिखाई दिए। इस कार्यक्रम में चंद्रबाबू नायडू ने न केवल दोनों कांग्रेस नेताओं की खुलकर प्रशंसा की, बल्कि यह भी कहा कि “राष्ट्र निर्माण के लिए हमें मिलकर काम करने की जरूरत है।” यह बयान सामान्य शिष्टाचार भर था या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संकेत छिपा है, इसी पर अब दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। याद रहे अभी कुछ दिन पहले ही अमित शाह ने कहा था कि अगले चुनाव से दक्षिण भारत में बीजेपी किसी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेगी ,वह खुद अकेले चुनाव मैदान में जाएगी।

शाह के इस भाषण के बाद चंद्रबाबू नायडू सतर्क मने जा रहे हैं और उनके पुत्र नारा लोकेश भी कई बयान दे चुके हैं। ऐसे में चन्द्रबाबू नायडू का हालिया कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों के साथ साझा मंच कई सन्देश देते नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में अपना विस्तार क्षेत्रीय दलों की कीमत पर किया है। महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन के बाद एकनाथ शिंदे का उदय हुआ, एनसीपी में टूट के बाद अजित पवार सत्ता का हिस्सा बने। कई राज्यों में विपक्षी दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़कर भाजपा ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब भाजपा के सहयोगी क्षेत्रीय दल भी भविष्य को लेकर सतर्क हो रहे हैं?
चंद्रबाबू नायडू अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं। वे केंद्र की राजनीति का लंबा अनुभव रखते हैं और अतीत में भाजपा के साथ भी रहे हैं तथा उससे अलग भी हुए हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि वे राष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों पर लगातार नजर रखे हुए हैं। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई सार्वजनिक संकेत नहीं है कि तेलुगु देशम पार्टी  एनडीए छोड़ने जा रही है। इसलिए इस तरह की किसी संभावना को फिलहाल केवल राजनीतिक अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन राजनीतिक संभावनाओं से इंकार भी नहीं किया जा सकता। 
दरअसल, दक्षिण भारत की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा मुद्दा परिसीमन बनता जा रहा है। दक्षिण के कई राज्यों को आशंका है कि यदि 2026 के बाद जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण होता है, तो उनकी संसदीय हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की, उन्हें उसकी राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी चाहिए।
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना के नेताओं ने अलग-अलग अवसरों पर इस चिंता को सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया है। आंध्र प्रदेश में भी यह विषय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रहा है। यदि परिसीमन का मुद्दा दक्षिण भारत के सभी प्रमुख दलों को एक साझा मंच पर ले आता है, तो यह राष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है।
आज दक्षिण भारत का राजनीतिक परिदृश्य भी दिलचस्प है। कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार है। केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूडीएफ  की सरकार है। यानी दक्षिण के तीन बड़े राज्यों में कांग्रेस की सत्ता है। तमिलनाडु में टीवीके के नेतृत्व वाली सरकार में कांग्रेस सहयोगी है। आंध्र प्रदेश में टीडीपी एनडीए का हिस्सा है, जबकि पवन कल्याण की जनसेना भी गठबंधन में शामिल है। ऐसे में यदि परिसीमन के मुद्दे पर दक्षिणी राज्यों के बीच साझा रणनीति बनती है, तो यह केवल कांग्रेस का नहीं बल्कि क्षेत्रीय दलों का भी बड़ा राजनीतिक एजेंडा बन सकता है।
यहीं से चंद्रबाबू नायडू की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वे लंबे समय से संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों की वकालत करते रहे हैं। यदि वे परिसीमन जैसे मुद्दे पर दक्षिणी राज्यों की आवाज को मजबूत करते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं होगा कि वे स्वतः इंडिया गठबंधन में शामिल हो रहे हैं। लेकिन इससे यह जरूर संकेत मिल सकता है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखना चाहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि भाजपा जैसे-जैसे अपने दम पर मजबूत होती जाएगी, सहयोगी दलों की राजनीतिक उपयोगिता कम हो सकती है। इसी संदर्भ में कुछ लोग यह आशंका भी व्यक्त करते हैं कि भविष्य में भाजपा आंध्र प्रदेश में अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयास करेगी। हालांकि यह कहना कि भाजपा निश्चित रूप से टीडीपी को कमजोर करने या तोड़ने की रणनीति अपनाएगी, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अभी स्थापित निष्कर्ष नहीं है। लेकिन बीजेपी के खेल को कौन जनता है। बिहार में जिस तरह से नीतीश कुमार को रास्ता दिखाया गया है ,यह कौन नहीं जानता। अब दक्षिण भारत में दो ही बड़े दल बचे हुए हैं जहाँ बीजेपी खेल कर सकती है। एक तो टीडीपी है और दूसरी पार्टी है तमिलनाडु की द्रमुक पार्टी। यह बात और है कि स्टालिन की पूरी राजनीति ही बीजेपी के विरोध में रही है लेकिन जिस तरह से हाल में कांग्रेस ,द्रमुक से अलग होकर टीवीके के साथ गई है उससे द्रमुक की नाराजगी बढ़ी है और यही वह बिंदु है जहाँ बीजेपी द्रमुक के साथ कोई खेल कर सकती है। 
इसी तरह यह भी चर्चा होती रही है कि जनसेना प्रमुख एवं उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण भविष्य में आंध्र की राजनीति में अधिक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन यह केवल राजनीतिक विश्लेषण का विषय है। अभी तक न तो भाजपा और न ही जनसेना ने ऐसा कोई संकेत दिया है जिससे यह कहा जा सके कि टीडीपी के खिलाफ कोई रणनीति बनाई जा रही है। लेकिन राजनीति में कभी कभी कोई संकेत नहीं मिलते। सिर्फ एक्शन होता है। जदयू के खिलाफ बीजेपी प्रायोजित चिराग पासवान इस तरह का एक्शन पिछले चुनाव में कर चुके है। इसलिए पवन कल्याण और बीजेपी आगे क्या कुछ करेंगे ,कहना मुश्किल है। 
चंद्रबाबू नायडू की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी किसी से छिपी नहीं हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। भविष्य में वे केंद्र की राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका निभाना चाहें, यह संभव है, लेकिन इसके स्वरूप को लेकर अभी कोई ठोस संकेत उपलब्ध नहीं हैं।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि परिसीमन का मुद्दा आने वाले समय में उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीति के बीच नए विमर्श को जन्म दे सकता है। यदि दक्षिण के राज्य इस विषय पर साझा रुख अपनाते हैं, तो केंद्र सरकार पर व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक बहस का दबाव बढ़ सकता है। भाजपा को भी इस चुनौती का राजनीतिक उत्तर देना होगा।
जहां तक चंद्रबाबू नायडू के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की बात है, फिलहाल यह केवल अटकलों के दायरे में है। टीडीपी अभी एनडीए का हिस्सा है और उसने गठबंधन छोड़ने की कोई घोषणा नहीं की है। लेकिन भारतीय राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं। इसलिए इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यदि परिसीमन का प्रश्न दक्षिण भारत की साझा राजनीतिक पहचान का मुद्दा बनता है, तो चंद्रबाबू नायडू सहित कई क्षेत्रीय दल अपनी रणनीति पर पुनर्विचार कर सकते हैं। आने वाले महीनों में यही मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में से एक बन सकता है।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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