हम फासीवादी खेल के उस भारतीय संस्करण के साक्षी बन रहे हैं जिसमें राजनीतिक विरोधियों का सफाया उन्हीं की पार्टी से हमलावरों को नियुक्त कर किया जाता है। इस खेल में विचारधारात्मक पहचान भी मायने नहीं रखती है। पश्चिम बंगाल में घट रही घटना लोकतंत्र की दुनिया में शायद एकमात्र उदाहरण हो जहां चुनाव हारने वाली एक पार्टी को अपराधी गिरोह की तरह प्रताड़ित किया जा रहा है। विजेता के लिए केवल सत्ता ही काफी नहीं है, वह विजित की चिता पर रोटियाँ भी सेकना चाहता है।
चुनाव के खेल के बाद, तृणमूल कांग्रेस के सफाए का खेल कुख्यात हो चुके भारतीय चुनावी लोकतंत्र के एक अतिरिक्त प्रकार्य के रूप में उभर आया है। हालाँकि पश्चिम बंगाल में इस रुग्णावस्था का सबसे निकृष्ट रूप सामने आया, लेकिन यह खेल महाराष्ट्र में भी देखा गया था।
शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, दोनों ही विपक्षी दलों के दो टुकड़े कर दिए गए थे। दोनों ही मामलों में एक ठेठ फासीवादी तरीके से अंदरूनी घुसपैठ कर चुके अजीत पवार और एकनाथ शिंदे को इस काम को अंजाम देने में इस्तेमाल किया गया था। आम आदमी पार्टी की राज्य सभा यूनिट का भाजपा में समाहित होना सर से पांव तक उसी बीमारी की निशानी है।
लेकिन, जो बात समझने की है वह यह कि इस पूरी प्रक्रिया में कुछ भी रहस्यमई नहीं है। यह पूरी साजिश उस मुश्किल घड़ी में एक सोचे समझे हमले का हिस्सा है जब हमारा देश बदलती भू राजनीतिक हालात में रणनीतिक अलहदगी से जूझ रहा है।
कई मायनों में, यह रोमन साम्राज्य के उस शाही खेल जैसा है, जिसमें गुलामों या पेशेवर योद्धाओं को आपस में लड़ाया जाता था ताकि वे एक-दूसरे की जान ले सकें। किसी बेरहम ग्लैडिएटर खेल की तरह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के आदेश से ममता बैनर्जी के अपने ही लोग उनके सफाए के लिए उतर आए हैं। ममता की ही तरह, उद्धव ठाकरे ने भी इसी राजनीतिक कसाईखाने का सामना किया था। यह कोई संयोग नहीं है कि दोनों ही भाजपा के पूर्व सहयोगी रहे थे।
यह केवल यही साबित करता है कि हम जो आज होते हुए देख रहे हैं वह नाज़ी राजनीति का ही दोहराव है जिसने अपने दक्षिणपंथी सहयोगियों तक को भी नहीं बख्शा था।
मीडिया शायद एक अन्य घटनाक्रम पर प्रकाश न डाल रहा हो लेकिन ‘असली दुश्मनों’ यानि कम्युनिस्टों और अल्पसंख्यकों को कोलकाता की गलियों और नुक्कड़ों में इस भयंकर फासीवादी हमले का सामना करना पड़ रहा है। यह भी भाजपा के वर्चस्वकारी नियंत्रण स्थापित करने के प्लान का ही हिस्सा है। इस फासीवादी टेम्पलेट को नगरपालिका से लेकर संसद तक सभी स्तरों पर लागू किया जा रहा है।
सत्ता में आने के तुरंत बाद, बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने अल्पसंख्यकों, गरीबों और उन लोगों पर बुलडोजर छोड़ दिया जो इस राज्य के सामंजस्यपूर्ण संस्कृति को ध्वस्त करने के इस नए शासन के स्पष्ट उद्देश्य के खिलाफ खड़े हो सकते थे।
हमें इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि भारत के राजनीतिक परिदृश्य को नए रूप में ढालने के इस प्रोजेक्ट ने बंगाल में बड़ी मुस्लिम आबादी होने के कारण अभूतपूर्व गति हासिल की है। नए मुख्यमंत्री हर दिन उनकी जिंदगी बदतर बनाने के लिए आदेश जारी कर रहे हैं। इन आदेशों से उनके जीवन का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रहता, जिसमें धार्मिक जीवन भी शामिल है।
इन आदेशों के तहत खान-पान, उपासना, कल्याणकारी स्कीमों से मिलने वाले लाभ और सार्वजनिक उत्सव आते हैं। घुसपैठ रोकने के नाम पर की जाने वाली कार्रवाइयां मुसलमानों के लिए सबसे प्रताड़नात्मक होते हैं क्योंकि इनसे उनके नागरिकता के अधिकारों पर खतरा पैदा होता है।
विरोधी पार्टियों का खात्मा और अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म को दो अलग मुद्दों की तरह देखने की एक प्रवृत्ति रहती है। लेकिन सच यह है कि यह दोनों मसले जुड़े हुए हैं। कोई भी फासीवादी प्रोजेक्ट बिना किसी दुश्मन, जिसका अन्यकरण कर निशाना बनाया जाता हो, के सफलता हासिल नहीं कर सकता है। इसलिए देश के राजनीतिक नक्शे को बदलने की स्कीम में अल्पसंख्यक प्रमुख टारगेट हैं।
चाहे वोटर लिस्ट का ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ हो या परिसीमन की प्रक्रिया, ये लोग सबसे कमज़ोर स्थिति में रहे हैं। भाजपा का परिसीमन की प्रक्रिया पर अत्यधिक ज़ोर इसलिए है क्योंकि 2029 में एसआईआर की प्रक्रिया अकेले उनकी वापसी सुनिश्चित नहीं कर सकेगी। पार्टी को उन हिंदू समुदायों के वोटों से भी निपटना है जिनका समर्थन भाजपा को अतीत के चुनावों नहीं मिला था। इसीलिए निर्वाचन क्षेत्रों का इस तरह से पुनर्विभाजन जरूरी है ताकि वे वोट अपनी अहमियत खो दें।
भाजपा धार्मिक, जातिगत, भाषाई इत्यादि सभी विविधताओं को नष्ट करने की कोशिश कर सकती है।
यह तरीका असम और जम्मू कश्मीर में पहले ही इस्तेमाल किया जा चुका है, जहाँ परिसीमन की प्रक्रिया के बाद मुस्लिम प्रतिनिधित्व में एक विचारणीय कमी देखी गई है। अपनी पसंद के विभाजन के वैधीकरण के लिए मोदी सरकार ने न्यायाधीश पी पी नावलेकर की अध्यक्षता के तले डेमोग्राफिक बदलावों पर एक उच्च स्तरीय समिति का पहले ही गठन कर लिया है। समिति की शर्तों को बताने के लिए इस्तेमाल किए गए वाक्यांश साफ़ तौर पर इसकी नियुक्ति के पीछे के राजनीतिक मकसद को दर्शाते हैं।
इसमें “अप्राकृतिक डेमोग्राफिक बदलावों” और “धार्मिक व सामाजिक समुदायों के स्तर पर असामान्य बदलावों” का जिक्र है। यह समिति अपनी रिपोर्ट एक साल में पेश करेगी।
जिस गति से दलबदल को अंजाम दिया जा रहा है वह सिर्फ सत्ताधारी पार्टी द्वारा परिसीमन बिल को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत हासिल करने की उनकी व्याकुलता को ही नहीं दिखाता है, अपितु तृणमूल स्तर की राजनीति पर भी अपनी पकड़ बनाने की उनकी बेचैनी को दर्शाता है। परिसीमन के खिलाफ प्रतिरोध और जमीन पर लोगों के गुस्से को खत्म करने के लिए विपक्ष को खत्म करना बेहद ज़रूरी है। मोदी सरकार ने देखा है कि केंद्रीय चुनाव आयोग के लिए एसआईआर लागू करना कितना मुश्किल रहा है।
लेकिन इस फासिस्ट टेम्पलेट के क्रियान्वयन के लिए सही सन्दर्भीकरण चाहिए। हम यह न भूलें की यह व्याकुलता हिंदुत्व के एजेंडे को लागू करने में उनकी असफलता की ओर इशारा करती है। अगर आरएसएस और भाजपा देश के ध्रुवीकरण में सफल हो जाते तो मोदी सरकार को इतने बड़े स्तर पर चुनावों में हेरा फेरी नहीं करनी पड़ती। अगर विरोधियों की जीतने की कोई संभावना ही नहीं होती तो वे क्यों ईडी और सीबीआई को उनके द्वार भेजते?
चुनाव आयोग के साथ, इन एजेंसियों का दुरूपयोग इसीलिए हो रहा है क्योंकि बहुसंख्यक आबादी का मत स्वाभाविक रूप से भाजपा के खिलाफ ही है। मौजूदा शासन की बेरहमी सिर्फ़ ‘भारत के विचार’ की अटलता को साबित करती है। भारतीय देश एक लंबे उपनिवेश विरोधी संघर्ष का उत्पाद है। धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र भारत की स्थापना से ही इसकी विचारधारा के अंग रहे हैं जो देश के सांप्रदायिकीकरण को रोकते हैं।
भारत में विपक्ष के खात्मे के तरीक़े की पहचान करना भी रोचक होगा। शायद यह खेल तानाशाही आखिरी चरण से पहले खेला जाएगा। भाजपा किसी भी पार्टी के पूर्ण खात्मे के बजाय एकाग्रता से उसकी राजनीतिक शक्ति को चूस लेती है। इसकी रणनीति स्पष्ट है : खुद उस पार्टी के सदस्य ही ओरिजिनल पार्टी को खत्म कर देते हैं।
शिवसेना का इस्तेमाल शिवसेना और टीएमसी का इस्तेमाल टीएमसी के ख़िलाफ़ किया जा रहा है। हर तरह की तिकड़मों के इस्तेमाल से किसी पार्टी में पहले फूट पैदा करना और फिर अलग हुए खेमों को आपस में लड़ाना इनका मोडस ऑपरेंडी है। इन अनैतिक और अवैध बंटवारों को वैधता का जामा पहनाने के लिए संस्थाएं अपनी जगह हैं ही।
अलग हुआ समूह, जिसे हर मामले में बीजेपी समर्थक होना ही है, मूल पार्टी का नाम, झंडा और कार्यक्रम उड़ा ले जाता है। यह बोली तो मूल पार्टी की बोलता है पर राजनीति भाजपा की करता है। यह राजनीतिक क्लोन भाजपा नेतृत्व के आदेशों पर चलता है और मूल पार्टी के राजनीतिक आधार को ध्वस्त करने में अपनी सारी ऊर्जा लगाता है।
शिवसेना और एनसीपी यह एक बार पहले ही भुगत चुके हैं और एक अन्य राउंड का इंतजार कर रहे हैं। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में आने के बाद जब दक्षिणपंथी पार्टी शिवसेना ने धर्मनिरपेक्षता की तरफ अपनी राजनीति को ले जाना चाहा तो उसपर तुरन्त हमला हुआ था। और ये हमला अब भी जारी है जब उसके सदस्यों की संख्या काफी कम हो चुकी है। शिंदे के नेतृत्व वाले बागी ग्रुप से मिलने वाले चैलेंज के कारण सेना अब एक बड़े संकट से जूझ रही है।
शरद पवार की एनसीपी के भाग्य में भी यही लिखा था। पार्टी को भविष्य के लिए बचाने के लिए पवार भाजपा से विभिन्न स्तरों पर समन्वय बिठाने की कोशिश में लगे हुए हैं। अजीत पवार की एनसीपी अपने पहले संस्करण की छाया मात्र रह गई है जो अब भाजपा के आदेश पर चलती है।
वे क्यों मूल पार्टी को उसकी छद्म कॉपी से बदल रहे हैं? क्योंकि हिंदुत्व पहचानों को समाहित करने में असमर्थ है। यह बहुलवाद को नहीं अपना सकता। बंगाली और मराठी अस्मिताएं भाजपा की विचारधारा से खुद को अभिव्यक्त नहीं कर सकती हैं। उन्हें दूसरे मंचों के ज़रिए आगे बढ़ाना होगा। बंगाली पहचान को नई दिशा देनी पड़ेगी, और मराठी को भी। इन्हें सांप्रदायिक और कट्टरपंथी बनना होगा।
शिवसेना के साथ मिलना, निश्चित ही भाजपा के लिए मराठी अस्मिता की राजनीति में कुछ बदलाव करना संभव बना पाया। इसी प्रक्रिया को बंगाल में भी हूबहू दोहराना है। वहां छद्म टीएमसी भाजपा को इसे अमली जामा पहनाने में मदद देगी। जो काम शिंदे की शिव सेना महाराष्ट्र में कर रही है वही सुदीप बंधोपाध्याय की टीएमसी पश्चिम बंगाल में करेगी। क्या छद्म विपक्ष का यह प्रयोग लंबा चल पाएगा?
(वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिन्हा का लेख वायर से साभार। अंग्रेज़ी से अनुवाद शुभम रौतेला)