समाज की अंतरात्मा के प्रतिनिधि लेखक-कलाकार नौजवानों के शांतिपूर्ण प्रतिरोध की उपेक्षा नहीं कर सकते। नौजवान न्याय के लिए, सम्मानपूर्वक जीने के बुनियादी अधिकार के लिए और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए लड़ रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि जब जरूरी शांतिपूर्ण प्रतिरोध की लंबे समय तक अनदेखी की जाती है, तब समाज का संकट विकराल हो जाता है।
अगर सरकार नौजवानों की गहरी पीड़ा पर ध्यान नहीं दे रही तो सामाजिक संवेदना के प्रतिनिधियों के लिए जरूरी हो जाता है कि वे पीड़ित की आवाज के साथ अपनी आवाज मिलाएं।
हम भली भाँति अवगत हैं कि पेपर लीक, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंतर मंतर पर पर्यावरणविद सोनम वांगचुक, नेहा, मनीष और आमीन 19 दिन से भूख हड़ताल पर हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा, पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर तत्काल रोक लगाने, एनटीए को भंग कर पारदर्शी बनाने, जवाबदेह परीक्षा व्यवस्था लागू करने की माँग को लेकर जंतर मंतर पर आंदोलन की शुरुआत 20 जून को हुई थी।
आठ दिन बाद 28 जून से सोनम वांगचुक, नेहा, मनीष, आमीन, दानिश अली, दीपक, ऋषिकेश ने इन मांगों को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी। एक-एक कर तीन युवाओं- ऋषिकेश, दानिश और दीपक की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
सोनम वांगचुक, नेहा, मनीष और आमीन की तबीयत लगातार नाजुक होती जा रही है लेकिन वे अदम्य हौसले और अपूर्व साहस से भूख हड़ताल पर डटे हुए हैं।
जंतर मंतर आंदोलन से उठा सवाल नया नहीं है। पिछले एक दशक में 90 से अधिक बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं जिससे करोड़ों की संख्या में युवा प्रभावित हुए हैं। कई राज्यों में इसको लेकर आंदोलन हुए। पिछले लोकसभा चुनाव सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में शिक्षा – परीक्षा और बेरोजगारी के सवाल मुद्दे भी बने। पेपर लीक से प्रभावित कई युवाओं ने आत्महत्या की है।
नीट परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद से 22 युवाओं ने हताशा में जान दे दी लेकिन भ्रष्ट, निरंकुश, असंवेदनशील, मदांध मोदी सरकार ने संवेदना के दो शब्द कहना भी गवारा नहीं किया। आंदोलन कर रहे सोनम वांगचुक और युवाओं से संवाद करने का कोई यत्न नहीं किया। उल्टे प्रधानमंत्री मितव्ययिता की अपील कर पूरी दुनिया की सैर कर रहे हैं, सम्मान बटोर रहे हैं और उनके मंत्री आंदोलन का उपहास करते हुए ऐशोआराम का निर्लज्ज प्रदर्शन कर रहे हैं।
हमें इस सरकार से संवेदनशीलता, जवाबदेही की फिजूल उम्मीद कभी नहीं रही है। किसान आंदोलन में 700 किसानों ने शहादत दी लेकिन सरकार, भाजपा और आरएसएस की मोटी खाल पर कोई असर नहीं पड़ा। मजदूरों के आंदोलन को विदेशी और अर्बन नक्सल षड्यंत्र बताकर उसका क्रूरता से दमन किया गया गया है। मणिपुर, हाथरस सहित तमाम स्थानों पर महिलाओं के साथ रेप की घटनाएं इस सरकार को कुंभकर्णी नींद से नहीं जगा पाईं।
मोदी सरकार ने इंसाफ, अधिकार, सम्मान, पहचान के हर जेनुइन आंदोलन का क्रूरतापूर्वक दमन किया है, उसको लांछित किया है। इस कार्य में गोदी मीडिया मोदी सरकार की हमेशा की तरह सहभागी रही है।
जंतर मंतर आंदोलन के साथ भी ऐसा करने का प्रयास हो रहा है। जंतर मंतर पर आंदोलन को जारी रखने दिया गया है लेकिन आंदोलनकारियों को बुनियादी मानवीय जरूरतों से वंचित करने, उन्हें बारिश, गर्मी, गंदगी से बीमार पड़ जाने के लिए छोड़ दिया गया है। एक तरह से किसान आंदोलन की तरह छात्र-युवा आंदोलन को थका देने, तोड़ देने का षडयंत्र किया जा रहा है।
तमाम षडयंत्रों, चुप्पियों, उपहासों के बावजूद सोनम वांगचुक और युवाओं के भूख हड़ताल ने देश की आत्मा को उद्वेलित किया है।
देश के तमाम स्थानों पर प्रदर्शन, उपवास के कार्यक्रमों, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, बुद्धिजीवियों, लेखकों-कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की जंतर मंतर पर उपस्थिति में इसकी अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।
जंतर मंतर युवा आंदोलन की ओर से अगले चरण में 20 जुलाई को संसद मार्च का आह्वान किया गया है। यह आंदोलन अब अपने सबसे चुनौतीपूर्ण और निर्णायक दौर में पहुंच गया है। संसद मार्च के आह्वान को व्यापक समर्थन मिलता दिख रहा है।
जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश और हममें गति, संघर्ष व बेचैनी पैदा करने वाला साहित्य रचने की प्रेरणा देने वाले हमारी भाषा के सबसे विश्वसनीय लेखक प्रेमचंद ने कहा था कि लेखक-कलाकार समाज में हो रहे आंदोलनों, हलचलों और क्रांतियों से बेखबर नहीं हो सकता है। हम लेखक-कलाकार युवाओं के इस आंदोलन से बराबर बाखबर हैं और इसमें भागीदारी करते रहे हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि इसके साथ संगठित रूप से खड़ा हुआ जाए क्योंकि यह आंदोलन एक नई राह दिखा रहा है।
शिक्षा व्यवस्था में मुकम्मल बदलाव और रोजगार के अधिकार के लिए युवा आंदोलन आगे बढ़ रहा है। युवाओं ने इस आंदोलन के जरिए आत्मत्याग, साहस, आदर्श के साथ-साथ हर तरह की कठिनाई और चुनौती से जूझने का जज्बा दिखाया है। अपने साहस और शौर्य से वे एक नई राह के प्रवर्तक बन रहे हैं।
अब जब आंदोलन निर्णायक चरण में पहुंच गया है तो हम लेखकों-कलाकारों का आह्वान करते हैं कि वे 18-19 जुलाई को भूख हड़तालियों के समर्थन में बड़ी संख्या में जतर मंतर पर उपस्थित हों, उनका साथ दें और 20 जुलाई के संसद मार्च में शामिल होकर नौजवानों के जरूरी संघर्षों के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर करें।
(प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन, जन नाट्य मंच, प्रतिरोध का सिनेमा, स्त्री दर्पण की ओर से जारी)