परीक्षा में लॉ स्टूडेंट को मिले शून्य अंक : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर पर जताई चिंता

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कानून के एक छात्र को एक पेपर में शून्य अंक मिलने पर कानूनी शिक्षा के गिरते स्तर पर चिंता जतायी है।

हाल ही में उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि छात्र की उत्तर पुस्तिका और प्रश्नपत्र की प्रति बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया और लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया को भेजी जाए।

कोर्ट ने कौंसिल और लॉ कमीशन से इस बात पर विचार करने को कहा कि क्या कानूनी शिक्षा के मौजूदा स्तर और लॉ संस्थानों की मंज़ूरी, एफिलिएशन और समय-समय पर होने वाली जांच के मौजूदा सिस्टम को “ग्लोबली कॉम्पिटिटिव कानूनी शिक्षा मानकों का मुकाबला करने के लिए” और मज़बूत करने की ज़रूरत है।

न्यायशीष विनोद दिवाकर की बेंच ने एक बीए एलएलबी छात्र की रिट याचिका खारिज करते हुए ये निर्देश दिए। याचिकाकर्ता ने IX सेमेस्टर परीक्षा, 2025-26 के “बायो-डायवर्सिटी प्रोटेक्शन लॉ” पेपर में अपनी आंसर बुक के दोबारा मूल्यांकन की मांग की थी। छात्र का कहना था कि सभी सवालों के जवाब देने और 50 से ज़्यादा अंक मिलने की उम्मीद के बावजूद, उसे पूरे पेपर में ज़ीरो मार्क्स दिए गए।

उसने राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट के तहत जांची गई आंसर बुक की कॉपी हासिल की और यूनिवर्सिटी द्वारा उसकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई न करने के बाद दोबारा मूल्यांकन की मांग की।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने मूल उत्तर पुस्तिका और प्रश्नपत्र मंगवाया। अदालत ने वकील से खुली अदालत में याचिकाकर्ता द्वारा लिखे गए जवाबों में से एक को पढ़ने का निर्देश भी दिया। जवाब की जांच करने के बाद कोर्ट ने पाया कि जवाबों में विषय की कोई कानूनी समझ नहीं दिख रही थी।

शैक्षणिक मामलों में न्यायिक समीक्षा के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन में दखल तभी दिया जा सकता है जब मनमानी, दुर्भावना, कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन या मूल्यांकन प्रक्रिया में कोई स्पष्ट गलती साबित हो। मामले के मूल रिकॉर्ड की जांच करने पर कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता को कोई नुकसान हुआ है या परीक्षक ने शून्य अंक देने में मनमानी की। इसलिए रिट याचिका खारिज की गई।

याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने हालांकि टिप्पणी की कि यह मामला एक बड़ी प्रणालीगत चिंता को दर्शाता है। जस्टिस दिवाकर ने कहा कि याचिकाकर्ता-छात्र एक प्रोफेशनल डिग्री कर रहा है, जिसका मकसद छात्र को कानूनी पेशे में आने के लिए तैयार करना था, लेकिन उसके जवाबों की गुणवत्ता ने उस संस्थान में बनाए रखे गए शैक्षणिक मानकों के बारे में “गंभीर चिंता” पैदा कर दी, जहां वह कानूनी शिक्षा ले रहा था।

इस बात पर जोर देते हुए कि कानूनी शिक्षा न्याय वितरण प्रणाली की नींव है, बेंच ने इस तरह टिप्पणी की: “कानूनी शिक्षा न्याय दिलाने वाली व्यवस्था की नींव है। संस्थान के स्तर पर अकादमिक मानदंडों में कोई भी बड़ी गिरावट न केवल कानूनी पेशे को प्रभावित करती है, बल्कि खुद न्याय व्यवस्था को भी प्रभावित करती है।”

कोर्ट ने कहा कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। इस तरह के मामले चिंताजनक रूप से बार-बार कोर्ट के सामने आते रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कमी के लिए पूरी तरह से छात्र को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि अगर परीक्षा से पहले छात्र को “सही सलाह” दी गई होती, एक उपयुक्त ओरिएंटेशन प्रोग्राम दिया गया होता और उसे ठीक से पढ़ाया, गाइड किया और यह बताया गया होता कि परीक्षार्थी से क्या उम्मीद की जाती है, तो ऐसे जवाब नहीं लिखे जाते।

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया से यह जांच करने को कहा कि क्या संबंधित संस्थान तय एकेडमिक और इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैंडर्ड को पूरा कर रहा है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि संस्थान को अपनी बात रखने का मौका देने के बाद कौंसिल कानून के अनुसार जो भी जांच या पूछताछ उचित समझे, वह करने के लिए स्वतंत्र होगी।

कोर्ट ने विशेष रूप से कौंसिल से इस बात पर विचार करने को कहा, “क्या कानूनी शिक्षा के मौजूदा स्टैंडर्ड उस मकसद के अनुरूप हैं जिसके लिए वे तय किए गए, और क्या कानूनी शिक्षा देने वाले संस्थानों को मान्यता देने और समय-समय पर उनके निरीक्षण के मौजूदा सिस्टम को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कानूनी शिक्षा स्टैंडर्ड का मुकाबला करने के लिए मजबूत करने की जरूरत है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत का विधि आयोग कानूनी शिक्षा में सुधार के लिए ऐसे प्रस्ताव तैयार करने के मकसद से इस मुद्दे की जांच कर सकता है, जिन्हें आयोग उचित समझे।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों का मकसद केवल इन संस्थाओं का ध्यान एक आम चिंता के विषय की ओर आकर्षित करना था और इन्हें संस्थान, उसके शिक्षकों या परीक्षक के खिलाफ निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इनमें से कोई भी कोर्ट के सामने पक्षकार नहीं है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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