दिल्ली हाईकोर्ट ने नितिन गडकरी के बेटे की ओर से दायर मानहानि के मामले में ‘कारवां’ के संपादक से जवाब मांगा

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बेटे निखिल गडकरी की ओर से दायर 10 करोड़ रुपए के मानहानि के मामले में ‘द कारवां’ पत्रिका के प्रधान संपादक और एक पत्रकार से जवाब मांगा।

यह मुकदमा पत्रिका में छपे एक लेख के सिलसिले में दायर किया गया है, लेख में गडकरी की कंपनी सीआईएएन एग्रो और बीफ के कारोबार से जुड़ी एक कंपनी के बीच आर्थिक संबंधों का आरोप लगाया गया था।

यह मुकदमा सीआइएएन एग्रो इंडस्ट्रीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और उसके प्रबंध निदेशक निखिल गडकरी ने संयुक्त रूप से दायर किया था।

गडकरी ने ‘द कारवां’ के मार्च 2026 के अंक से एक लेख हटाने की भी मांग की है, जिसका शीर्षक है “नागपुर का बीफ़ – गडकरी के बिज़नेस साम्राज्य में फंसी बीफ़ कंपनी।”

जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद ने आज वादियों की उस अर्ज़ी पर भी नोटिस जारी किया, जिसमें लेख पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई थी।

गडकरी ने प्रतिवादियों (कारवां और उसके पत्रकारों) को कथित तौर पर मानहानि करने वाली सामग्री को दोबारा प्रकाशित करने या फैलाने से रोकने के लिए एक डायनामिक इंजक्शन (अदालती आदेश) की मांग की है। इसमें भविष्य के प्रकाशन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी शामिल हैं। मुकदमे में जिन प्रतिवादियों के नाम शामिल हैं, उनमें दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन, द कारवां, इसके प्रधान संपादक (परेश नाथ) और पत्रकार कौशल श्रॉफ शामिल हैं।

लेख में सीआईएएन एग्रो और रेम्बल एग्रो नाम की बीफ़ एक्सपोर्ट कंपनी के बीच संबंधों के आरोप लगाए गए थे। लेख में रेम्बल से जुड़े लोगों द्वारा सीआईएएन एग्रो में कथित तौर पर रखे गए शेयरों और रेम्बल से जुड़े व्यक्तियों को दिए गए लोन का ज़िक्र किया गया था।

गडकरी ने इन आरोपों को गलत बताया है। उनका तर्क है कि सीआईएएन और रेम्बल के बीच “गहरे” संबंध दिखाने के लिए कुछ लेन-देन को जानबूझकर चुना गया था।

मुकदमे में कहा गया है, “मानहानि करने वाली इस सामग्री में कई झूठे, गैर-जिम्मेदाराना, गुमराह करने वाले बयान और इशारे हैं। इनका मकसद यह गलत धारणा बनाना है कि वादी (इसके डायरेक्टर और प्रमोटर सहित) बीफ़ या गोमांस उत्पादों के व्यापार, प्रोसेसिंग या एक्सपोर्ट से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हैं।

इसके अलावा, मानहानि करने वाली इस सामग्री में कानूनी रूप से अलग-अलग शब्दों जैसे ‘बफ़’ (भैंस का मांस) और ‘बीफ़’ (गाय का मांस) को जानबूझकर मिला-जुलाकर पेश किया गया है। ऐसा स्पष्ट रूप से वादी और उनके डायरेक्टर/प्रमोटर के खिलाफ़ लोगों में गुस्सा और सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने के इरादे से किया गया है।”

वादियों ने यह भी कहा है कि सीआईएएन एग्रो सिर्फ़ कृषि-आधारित उत्पादों (जैसे फ्रोज़न सब्ज़ियां, मसाले, चीनी, खाने का तेल और उससे जुड़े पर्सनल और होम केयर उत्पाद) के निर्माण और व्यापार में लगी हुई है, और ये सभी उत्पाद पूरी तरह से शाकाहारी हैं।

आज की सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गडकरी और सीआईएएन एग्रो ने शिकायत की थी कि लेख को सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स के ज़रिए दोबारा प्रकाशित और प्रसारित किया जा रहा है।

मेटा के वकील वरुण पाठक ने बताया कि मुकदमे में वकील प्रशांत भूषण (जिन्होंने एक्स पर लेख को रीपोस्ट किया था) या इन्फ्लुएंसर ध्रुव राठी (जिन्होंने लेख के बारे में वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किया) को पक्षकार नहीं बनाया गया है।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वह पहले ‘द कारवां’ का पक्ष सुनेगा और उस सामग्री की जांच करेगा जिस पर प्रकाशन आधारित था। जज ने कहा, “अभी तो सिर्फ़ मैगज़ीन और उसके अपलोड किए गए कंटेंट पर ही बात हो रही है। मैं पहले मैगज़ीन का पक्ष सुनना चाहूँगा।”

कोर्ट ने कहा कि इस स्टेज पर मुख्य मुद्दा यह होगा कि क्या आर्टिकल तथ्यों पर आधारित था और क्या कथित वित्तीय लेन-देन के मामले में प्रथम दृष्टया कोई केस बनता है।

जस्टिस प्रसाद ने आगे कहा कि संविधान के आर्टिकल 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी पर असर डालने वाला कोई भी आदेश देने से पहले कोर्ट को ‘द कारवां’ का पक्ष सुनना होगा।जस्टिस प्रसाद ने कहा, “आखिरकार, हमारी अदालतों ने 19(1)(ए) को बहुत ज़्यादा अहमियत दी है, खासकर यहाँ से दो किलोमीटर दूर (सुप्रीम कोर्ट की ओर इशारा करते हुए)।”

इस मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को होगी।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और क़ानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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