दाभोलकर हत्या में दोषी पाए गए सचिन अंदुरे की सज़ा पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने लगायी रोक, दी ज़मानत

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार, 18 अगस्त को ‘बेहद कमजोर सबूतों’ का हवाला देते हुए अंधविश्वास विरोधी कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए सचिन अंदुरे की विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा पर रोक लगा दी और ज़मानत दे दी।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सारंग कोटवाल और रणजीत सिंह भोंसले की पीठ ने कहा कि अपील में अंदुरे के बरी होने की ‘उचित संभावना’ है। इससे पहले अप्रैल में अदालत ने अंदुरे के सह-दोषी शरद कलास्कर को भी ज़मानत दी थी।

पीठ ने कहा, “आवेदक (अंदुरे) के ख़िलाफ़ सबूत बहुत कमज़ोर हैं, हालांकि हमने सबूतों का गहराई से विश्लेषण नहीं किया है।” अदालत ने आगे कहा, “इस मामले में गिरफ्तारी के बाद से लगभग छह वर्षों से आवेदक इसी कमजोर सबूतों के आधार पर हिरासत में है।”

10 मई 2024 को पुणे की विशेष सीबीआई अदालत ने दाभोलकर की हत्या के मामले में शरद कलास्कर और सचिन अंदुरे को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

सीबीआई अदालत ने अंदुरे को दोषी ठहराते समय दो ‘प्रत्यक्षदर्शियों’ के बयान पर भरोसा किया था। इनमें एक पुणे नगर निगम में काम करने वाला सफाईकर्मी और दूसरा घटनास्थल के पास सुबह सैर करने वाला व्यक्ति था। हालांकि, हाईकोर्ट ने दोनों प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्यों को ‘बेहद कमजोर’ माना।

हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों गवाहों ने हमलावरों को दूर से देखा था। अदालत ने यह भी कहा कि सफाईकर्मी ने हमलावरों की पहचान अदालत में क्रमशः 7 और 8 साल के लंबे अंतराल के बाद की थी।

हाईकोर्ट ने अंदुरे द्वारा छत्रपति संभाजीनगर के एक निवासी के सामने कथित तौर पर किए गए न्यायालयेतर इकबालिया बयान को भी उसके खिलाफ पेश किए गए तीसरे सबूत के रूप में ‘कमजोर’ बताया। अदालत ने कहा कि यह कथित खुलासा घटना के पांच साल बाद हुआ था और इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई अन्य साक्ष्य मौजूद नहीं था।

अदालत ने कहा, “ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पता चले कि आवेदक उस व्यक्ति (छत्रपति संभाजीनगर के निवासी) के इतना करीब था कि वह इस गवाह के सामने अपना अपराध कबूल करता।”

इसमें यह भी कहा गया कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह पता चल सके कि मामले की जांच कर रहे सीबीआई अधिकारी को यह कैसे पता चला कि याचिकाकर्ता ने इस गवाह के सामने अपना जुर्म कबूल किया था।

20 अगस्त 2013 की सुबह पुणे में 69 वर्षीय दाभोलकर की वीआर शिंदे पुल पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वह महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक थे। दाभोलकर के बाद वामपंथी विचारक गोविंद पानसरे, अकादमिक और एक्टिविस्ट एमएम कलबुर्गी और पत्रकार गौरी लंकेश की भी गोली मारकर हत्या की गई थी।

पुणे पुलिस, जिसने शुरुआत में उनकी हत्या के मामले की जांच की थी, ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद 2014 में जांच सीबीआई को सौंप दी थी।

हालांकि, दाभोलकर की हत्या 2013 में की गई थी, लेकिन अंदुरे और कालस्कर दोनों को 2018 में गिरफ्तार किया गया, जब गौरी लंकेश की हत्या में उनकी भूमिका सामने आई थी। महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने कर्नाटक पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) की मदद से दोनों को पकड़ा था। कर्नाटक एसआईटी 2017 में बेंगलुरु स्थित गौरी लंकेश के आवास पर उनकी हत्या की जांच कर रही थी।

जनवरी 2025 में अन्य छह आरोपियों– सचिन अंदुरे, गणेश मिस्किन, अमित डेगवेकर, अमित बड्डी, भरत कुराने और वासुदेव सूर्यवंशी – को लंबी हिरासत और निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की संभावना कम होने के आधार पर ज़मानत दे दी गई थी।

(वायर से साभार)

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