वंदे मातरम के प्रति श्रद्धा या ध्रुवीकरण का निशाना

सरकार का वंदे मातरम प्रेम अद्भुत है। वे इसे पूरा का पूरा गवाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह अलग बात है खुद उनकी पार्टी के लोग उतना भी नहीं गा पाते, जितना गाने के लिए टैगोर की अनुशंसा पर, 1937 की कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सहमति प्रदान की थी। 

यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणा गीत रहा है। पूरा गाने के आग्रही लोगों से तब तो गाया नहीं गया, जब उसके गाने पर डंडे पड़ते थे, जेल होती थी। वो दौर दूसरा था, यह दौर दूसरा है। तब जेल होती थी। अब सांप्रदायिक आयाम दिखाकर वोट हासिल होंगे। तब गाया न गया (हालांकि गा अब भी नहीं पाएंगे) अब खंड काव्य बनाने पर उतारू हैं।

हाल में गृह मंत्रालय के नए निर्देशों के क्रम में वो सारे पद जोड़ दिए हैं, जिसे 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य के रूप में टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, आचार्य नरेंद्र देव, राजेन्द्र प्रसाद और मौलाना आजाद ने ग़ैरजरूरी समझा था।

बताते चलें कि 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्य समिति ने प्रारंभ के दो छंदों को ही गाए जाने का प्रस्ताव पारित किया था। यह टैगोर की अनुशंसा पर किया गया था। इन छंदों में धरती, प्रकृति की अतीव सुंदरता का वर्णन है। टैगोर के अनुसार शेष छंद अन्य धार्मिक मतावलंबियों को असहज कर सकते हैं। 

टैगोर लिखते हैं- “जो दो अंतरे हमेशा गाए जाते थे, उनका महत्व इतना गहरा था कि उस हिस्से को कविता के शेष हिस्से तथा पुस्तक के उन अंशों से अलग करने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं थी। बाद में जोड़े गए अंतरों का सांप्रदायिक मायना निकाला जा सकता है और उस समय के माहौल में उनका इस्तेमाल अनुचित होगा।”

इस तरह हम देखते हैं कि टैगोर की यह सलाह पदों की अर्थवत्ता और अधिवेशनों में गीत गायन की समय-सीमा के संदर्भ में बिलकुल ठीक थी।

वंदे मातरम के विवाद को समझने के लिए हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ को देखना पड़ेगा। ऐतिहासिक संदर्भ समझे बिना 1937 का निर्णय अधूरा समझा जाएगा। इससे टैगोर की अनुशंसा के औचित्य को और बेहतर समझने में आसानी होगी।

दरअसल पहले दो छंदों के बाद, गाने में दुर्गा स्तुति है, जिसके चलते मुस्लिमों को उन पदों को लेकर आपत्ति थी। 

इसके अलावा यह गीत बाद में जिस आनंदमठ उपन्यास (1882) का हिस्सा बना, उसमें मुसलमानों को शत्रु के रूप में चित्रित किया गया था, जिसके चलते विवाद की पृष्ठभूमि निर्मित हुई। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि जब यह लिखा गया था, तब सिर्फ़ यह मातृभूमि या मादरे वतन का पवित्र गायन था, जिसने पूरे स्वतंत्रता संघर्ष को आंदोलित किया।

वंदे मातरम की इस अप्रतिम भूमिका को सम्मान देने के लिए ही मौलाना आजाद सहित पूरी समिति ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकारा। बाद वाले पद तो जब उपन्यास लिखा गया, तब उसके कथानक को विस्तार देने के लिए लिखे गए थे।

इस तरह हम देखते हैं कि टैगोर की यह अनुशंसा न केवल समय की आवश्यकता थी, अपितु स्वस्थ लोकतंत्र, सद्भाव और एक-दूसरे के सम्मान को भी रेखांकित करने वाली थी।

गीतों से अंशों का चयन समय, सुविधा और प्रभावोत्पादकता के आधार पर किया जाता है। अन्य देशों का संदर्भ लें तो वहाँ भी राष्ट्रीय समारोहों और अधिवेशनों में गीतों के कुछ अंश ही गाए जाने की परंपरा है। और यह उचित भी है। लंबे गीत गाए जाने संभव नहीं हैं। 

किसी गीत के एक टुकड़े को गाने का यह मतलब कैसे कि पूरे गीत का अपमान किया गया। अब अगर कोई मानस में से सिर्फ सुंदरकांड का पाठ करना चाहे, तो क्या वह राम द्रोही हो जायेगा या मानस के प्रति उसकी निष्ठा संदिग्ध हो जाएगी? 

लेकिन चलिए इससे आपको क्या लेना-देना। सद्भाव के मूल्यों में आपका विश्वास ही कब रहा! आपको तो सद्भाव में भी तुष्टिकरण एंगल खोजने की महारत हासिल है। इसलिए सीमित पदों को पहले आपने मुस्लिमों के तुष्टीकरण के रूप में विज्ञापित किया, फ़िर निहायत ही धूर्तता से पूरी समिति के निर्णय को अकेले नेहरू का बताकर उन पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप मढ़ दिया। अगर हिम्मत है तो पूरी समिति के सदस्यों का नामोल्लेख करते हुए उन्हें दोषी ठहराइए? 

लीजिए टैगोर का नाम, लेकिन आप नहीं ले सकते। विशुद्ध साहित्यनुरागी को गलत ठहराने का जोख़िम कौन उठाए। और फ़िर क्यों उठाएं, जब नेहरू जिम्मेदारी लेने के लिए सहज उपलब्ध हैं।

सुभाष बाबू का भी नाम नहीं ले सकते। वैसे सुभाष बाबू से भी आपकी दिक्कत अघोषित ही सही, अरसे से रही है। हाल में उनके नाम की सड़क श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर कर दी गई और कोलकाता में नेताजी की मूर्ति की एक बाँह तोड़ दी गई। 

लेकिन चूंकि आप सयाने हैं, इसलिए नेताजी पर अमूमन चुप ही रहना बेहतर समझते हैं। क्योंकि आगे इन्हीं सुभाष को नेहरू पर निशाना साधने में इस्तेमाल भी तो करना है। यही बात पटेल, भगतसिंह के बारे में भी सही है। मौके-मौके पर इन सबके कंधे नेहरू और गांधी पर हमले करने में काम आते हैं।

धूर्तता के चलते जिस नेहरू को ये वन्देमातरम विरोधी साबित करना चाहते हैं, उस नेहरू का दृष्टिकोण भी जान लेना जरुरी है। 

इस संबंध में नेहरू का एक ख़त पढ़ा जाना चाहिए जो उन्होंने 6 अप्रैल 1938 को जिन्ना को उनके वंदे मातरम विरोधी दृष्टिकोण पर लिखा था। नेहरू ने लिखा – ‘‘वंदेमातरम गीत भारतीय राष्‍ट्रवाद के साथ पिछले 30 साल से अधिक समय से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसके साथ अनगिनत बलिदान और भावनाएं जुड़ी हुई हैं। लोकप्रिय गीत किसी आदेश से पैदा नहीं होते और न ही उन्‍हें जबरन थोपा जा सकता है। वे जनभावनाओं से उपजते हैं। पिछले 30 साल से अधिक समय में ऐसा कभी नहीं माना गया कि ‘वंदे मातरम्’ गीत में कोई सांप्रदायिक भाव छुपा हुआ है। और इसे हमेशा से भारत की प्रशंसा में देशभक्ति का गीत माना गया है।”

इसके अलावा आपको बताते चलें कि 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित गीत पहली बार 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में ही गाया गया था, जिसको स्वर दिया था टैगोर जी ने और इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे रहमतुल्ला सयानी साहब। 

इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि तब इस गीत के प्रति सांप्रदायिक दृष्टि थी ही नहीं। बंग-भंग विरोधी आंदोलन में ‘वंदेमातरम’ राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान बन गया था। तमाम कांग्रेसी नेता और क्रांतिकारियों ने यथा विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपतराय, मैडम कामा, अरविंद घोष ने “वंदे मातरम” नामक अख़बार और पत्रिकाएं निकालीं। तमाम क्रांतिकारी वंदे मातरम का नारा लगाते हुए जेल गए, फांसी चढ़े।

लेकिन आप निर्विकार भाव से इन प्रेरणाओं से अछूते ही रहे। चलो मान लिया वह स्वतंत्रता का दौर था और हर आदमी “वंदेमातरम” कहने के खतरे नहीं उठा सकता था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद कम से कम आप अपनी पार्टी में तो इसे अनिवार्य कर ही सकते थे। आश्चर्य है कि वंदे मातरम् से इतना प्रेम होते हुए भी न तो आपने अब तक इसे अपने संगठन या पार्टी का गीत बनाया और न ही अपने अधिवेशनों में इसे गाने की परंपरा डाली।

ख़ैर अब जबकि आपने पूरे वंदे मातरम को गाना अनिवार्य कर ही दिया है, तो लगे हाथों अपनी पार्टी और संगठन में भी इसको जरूरी बना दें। अपने पुरखों की गलती सुधारने का भी बहुत बढ़िया मौका है। कांग्रेस में तो हमेशा से ही वन्दे मातरम का गायन होता आया है। 

वैसे यह अच्छा ही है कि जिनके वैचारिक पुरखे कभी तिरंगा को अशुभ बताते थे, जिनके यहां दशकों तक झंडा नहीं फहराया गया, उनकी अगली पीढ़ी घर घर तिरंगा का आह्वान करे और वंदे मातरम गाए। यह उस अपराध का पश्चाताप भी होगा जो आपने वंदे मातरम विरोधी मुस्लिम लीग के साथ गलबहियां करके की थीं। 

ज्ञात हो कि स्वतंत्रता की रात आजादी का पहला उत्सव मनाने के लिए एक विशेष सत्र आयोजित किया गया जिसमें नेहरू ने अपना विख्यात भाषण “ए ट्रस्ट विद डेस्टिनी” दिया था, लेकिन इस भाषण से भी पहले सुचेता कृपलानी की आवाज में वंदे मातरम गाया गया। यह सम्मान था उस गीत के प्रति जिसने देशभक्तों को बलिदान की प्रेरणा दी। और यही नहीं 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा बाकायदा वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। इस स्वीकृति में आपके श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भी स्वीकृति शामिल थी। इसलिए एक निंदा प्रस्ताव उनके खिलाफ़ भी लाइए, कि उन्होंने अधूरे वन्दे मातरम को स्वीकृति दी। 

और हां चलते-चलते एक सवाल और। और वह यह कि सभी पदों को गाने का नियम सिर्फ़ वंदे मातरम तक ही सीमित रहेगा या राष्ट्रगान भी इसके दायरे में आएगा? राष्ट्रगान में भी पांच स्टेंजा हैं, जिनमें पहला स्टेंजा ही गाया जाता है। क्या विचार हैं? 

(संजीव शुक्ल का लेख)

Leave a Reply