सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के मामले में मंगलवार को उन्हें अंतरिम राहत देते हुए किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अंतरिम सुरक्षा उनके खिलाफ भविष्य में दर्ज की जाने वाली किसी एफआईआर पर भी लागू होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना कीपीठ ने उपाध्याय की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया कि उन्हें संबंधित एफआईआर की प्रति उपलब्ध कराई जाए। गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को अगली सुनवाई तक एफआईआर की कॉपी दिए जाने के संबंध में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रदीप राय ने अभिषेक उपाध्याय की ओर से पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल ने अयोध्या में राम मंदिर से जुड़े चंदे में कथित गड़बड़ी का मामला सामने लाया था और अन्य मामलों पर भी खोजी रिपोर्टिंग की है।
उन्होंने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर झूठे और मनगढ़ंत आरोपों पर आधारित है तथा उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता के कारण परेशान किया जा रहा है। प्रदीप राय ने यह भी कहा कि घटना के समय की सीसीटीवी फुटेज से आरोपों की वास्तविकता सामने आ सकती है और इन रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया जाना चाहिए। उन्होंने निष्पक्ष जांच के लिए किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग भी की।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा “बार-बार एफआईआर दर्ज होने से आपकी आशंका को हम समझते हैं। हमें सच्चाई का पता नहीं है, लेकिन आपकी आशंका समझ में आती है। आप हाईकोर्ट जाइए और अगर मामला बनता है तो एफआईआर रद्द कराने की मांग कर सकते हैं। तब तक हम आपको अंतरिम सुरक्षा दे सकते हैं।”
इसके बाद पीठ ने आदेश जारी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले से दर्ज एफआईआर या भविष्य में दर्ज की जाने वाली किसी एफआईआर के संबंध में फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में 18 अगस्त को उपाध्याय के ख़िलाफ़ कथित रोड रेज मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी।शिकायत के अनुसार, शिप्रा मॉल के पास एक मोटरसाइकिल को बलेनो कार से कथित तौर पर टक्कर लगी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कार चालक ने उसके साथ गाली-गलौज और धमकी दी।
अभिषेक उपाध्याय ने इन आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि 18 अगस्त को बेटी को स्कूल से लेकर लौटते समय शिप्रा मॉल के पास मोटरसाइकिल सवार एक व्यक्ति उनकी कार के पास आया और हंगामा करने लगा। उनके मुताबिक न तो कोई टक्कर हुई और न ही कोई हाथापाई हुई। बेटी के साथ होने के कारण वह बिना लड़ाई-झगड़ा किए वहां से चले गए।
उन्होंने शिकायत में मोटरसाइकिल के नंबर को लेकर भी विसंगति होने का दावा किया है। उनका कहना है कि एफआईआर में जिस नंबर का उल्लेख किया गया, वह दूसरी मोटरसाइकिल का है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि पुलिसकर्मियों ने कथित घटना वाली जगह के आसपास की दुकानों पर जाकर दुकानदारों पर सीसीटीवी फुटेज हटाने या उपलब्ध नहीं कराने का दबाव बनाया।
अभिषेक उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश देने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार मांग किए जाने के बावजूद उन्हें एफआईआर की पूरी प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई।याचिका के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के अनुसार एफआईआर को वेबसाइट पर भी अपलोड नहीं किया गया।
अभिषेक उपाध्याय ने आरोप लगाया कि 20 अगस्त की रात करीब एक दर्जन पुलिसकर्मी उनके घर पहुंचे थे जबकि वह उस समय वहां मौजूद नहीं थे। उनकी पत्नी और दो बेटियां घर पर थीं। इसके बाद उन्हें गिरफ्तारी और आगे की पुलिस कार्रवाई की आशंका हुई।
याचिका में कहा गया कि उनके खिलाफ कार्रवाई को उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार और कथित अनियमितताओं से जुड़ी उनकी खोजी पत्रकारिता से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उनकी हालिया रिपोर्टों में राम मंदिर से जुड़े चंदे में कथित गड़बड़ी और सरकारी अधिकारियों तथा विभागों से जुड़े आरोप शामिल रहे हैं।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)