‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शीर्षक को लेकर पश्चिम बंगाल के प्रमुख बंगाली समाचार पत्र आनंदबाजार पत्रिका के पत्रकारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर पत्रकार संगठनों ने निंदा की है वहीं अख़बार के कार्यालय के बाहर हुए गेरुआ कपड़ा पहने लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया है।
मामला जादवपुर विश्वविद्यालय में हुई हिंसक झड़पों से जुड़ी एक ख़बर को लेकर शुरू हुआ। खबर के शीर्षक ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ को लेकर आपत्ति जताते हुए अखबार के संपादकीय विभाग के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसकी पत्रकार संगठनों ने कड़ी आलोचना करते हुए एफआईआर तुरंत वापस लेने की मांग की है।
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने इस विवाद को लेकर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर हमला बोला और सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया जिसमें गेरुआ कपड़े पहने लोग कोलकाता में एबीपी ऑफ़िस में तोड़-फोड़ करते और दीवारों को गेरुआ रंग से रंगते दिख रहे हैं। पोस्ट में उन्होंने लिखा, “सोचिए, भाजपा के गुंडे एबीपी ऑफ़िस को गेरुआ रंग से रंग रहे हैं और पुलिस उनकी सुरक्षा कर रही है… ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ नई ऊंचाइयों पर पहुँच गई है।”
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार 27 अगस्त को शास्त्री महाराज नामक एक हिंदू संत की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया। उनकी शिकायत में आरोप लगाया गया कि ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और समाज में अशांति फैलाने के उद्देश्य से किया गया। इसके आधार पर 28 अगस्त को पुलिस ने आनंदबाजार पत्रिका के संपादकीय विभाग के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली।
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार एफआईआर में आनंदबाजार पत्रिका की संपादक ईशानी दत्ता रॉय, चीफ रिपोर्टर सोमा मुखर्जी और संपादकीय टीम के अन्य सदस्यों के नाम शामिल किए गए हैं। शिकायत में मांग की गई है कि पुलिस यह जाँच करे कि विवादित शब्द का सुझाव किसने दिया, शीर्षक किसने मंजूर किया और संपादन प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन लोगों ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से यह शब्द इस्तेमाल किया।
मामला एफआईआर तक ही नहीं रुका रहा। मंगलवार दोपहर गेरुआ कपड़े पहने कई लोग मंगलवार दोपहर आनंदबाजार पत्रिका के कार्यालय के बाहर पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने ‘आनंदबाजार पत्रिका हाय-हाय’ और ‘भगवा का अपमान हिंदुस्तान नहीं सहेगा’ जैसे नारे लगाए। इसके बाद उन्होंने अखबार दफ्तर की दीवारों पर भगवा रंग पोत दिया। हालाँकि कुछ घंटों बाद अखबार प्रबंधन ने दीवारों को दोबारा सफेद रंग से रंगवा दिया।
इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि जब प्रदर्शनकारी दीवारों पर रंग पोत रहे थे और नारे लगा रहे थे, तब कई पुलिसकर्मी मौके पर मौजूद थे। हालांकि पुलिस ने इस घटना को लेकर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। यह भी साफ़ नहीं है कि दीवारों पर रंग पोतने वाले लोगों के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया गया है या नहीं।
तृणमूल कांग्रेस के विधायक कुणाल घोष ने घटना को लेकर कहा कि किसी समाचार पत्र की संपादकीय नीति या खबर से असहमति हो सकती है और उसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से विरोध भी किया जा सकता है। लेकिन ताकत के बल पर किसी मीडिया संस्थान के दफ्तर पर इस तरह हमला करना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं पश्चिम बंगाल की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं।
एफआईआर दर्ज होने से पहले 28 अगस्त को जादवपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने आनंदबाजार पत्रिका से 24 घंटे के भीतर ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शीर्षक के लिए माफी मांगने को कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि अखबार माफी नहीं मांगता तो भगवा पहनने वाले लोग विरोध प्रदर्शन करेंगे। अखबार ने माफी जारी नहीं की। इसके बाद कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन हुआ।
इस बीच इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स यानी आईडब्ल्यूपीसी और प्रेस एसोसिएशन ने संयुक्त बयान जारी कर पत्रकारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की कड़ी निंदा की है। दोनों संगठनों ने कहा कि पत्रकारों का काम तथ्यों को सामने लाना है। कई बार रिपोर्टिंग या इस्तेमाल किए गए शब्द कुछ लोगों को पसंद नहीं आते, लेकिन यही स्वतंत्र पत्रकारिता और लोकतंत्र की बुनियाद है। बयान में कहा गया कि पत्रकारों के खिलाफ लगातार एफआईआर दर्ज होना बेहद चिंताजनक है।
प्रेस संगठनों ने शिकायत में यह मांग किए जाने पर भी आपत्ति जताई कि कथित विवादित शीर्षक का सुझाव किसने दिया, उसे किसने मंजूर किया और शीर्षक तय करने में कौन-कौन शामिल था। उनका कहना है कि इस तरह संपादकीय प्रक्रिया में शामिल पत्रकारों और संपादकों की पहचान मांगना सीधे तौर पर पत्रकारों को निशाना बनाने जैसा है। संगठनों ने इसे स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव बनाने की कोशिश बताया।
संगठनों ने राज्य सरकार और पुलिस से अपील की है कि पत्रकारों को डराने या उनकी आवाज दबाने के लिए एफआईआर जैसे कानूनी साधनों का इस्तेमाल न किया जाए और एफआईआर तुरंत वापस लेने की माँग की। संगठनों ने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का संरक्षण जरूरी है, न कि उसे कानूनी कार्रवाई के जरिए दबाने की कोशिश।
(जनचौक ब्यूरो)