8 सितंबर को अयोध्या में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं के सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का मानदेय 12,000 रुपये और सहायिकाओं का मानदेय 6,000 रुपये करने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने कोरोना काल में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों के योगदान की सराहना करते हुए इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में नई पहल बताया और कहा कि प्रदेश सरकार उनकी सेवाओं का उचित सम्मान कर रही है। इसके साथ स्मार्टफोन, स्वास्थ्य बीमा और अतिरिक्त साड़ी जैसी सुविधाओं की भी घोषणा की गई।
लेकिन सरकार की घोषणा और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों की वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर है। घोषणा के बाद प्रदेशभर में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं में गहरा क्षोभ देखने को मिल रहा है। उनका कहना है कि महंगाई के मौजूदा दौर में यह मानदेय बेहद कम है और सरकार द्वारा पूर्व में किए गए सम्मानजनक अथवा ‘हैंडसम’ मानदेय के वादे के अनुरूप नहीं है। उनकी मांग है कि कम से कम प्रदेश के अकुशल मजदूर को मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी के बराबर मानदेय सुनिश्चित किया जाए।
सरकार के शासनादेश से भी मानदेय वृद्धि की वास्तविक तस्वीर सामने आती है। मुख्यमंत्री की घोषणा में 12 हजार रुपये और 6 हजार रुपये का उल्लेख है, लेकिन इसमें पूरी राशि नियमित मानदेय नहीं है। आंगनबाड़ी कार्यकत्री के मानदेय में वास्तविक वृद्धि 1,500 रुपये और सहायिका के मानदेय में 750 रुपये की है। बाकी 2,500 रुपये कार्यकत्री और 1,250 रुपये सहायिका के लिए परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) के रूप में निर्धारित किए गए हैं। यानी एक निश्चित और सम्मानजनक मानदेय की जगह भुगतान का एक हिस्सा प्रदर्शन आधारित कर दिया गया है।
यह दावा भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है कि योगी सरकार बनने से पहले आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को केवल 3,000 रुपये मिलते थे और अब उनका मानदेय 12,000 रुपये कर दिया गया है। वर्ष 2017 में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का मानदेय लगभग 5,500 रुपये और सहायिकाओं का 2,750 रुपये था। वर्तमान वृद्धि के बाद नियमित मानदेय क्रमशः करीब 7,000 और 3,500 रुपये होता है। इसलिए 12 हजार और 6 हजार रुपये की घोषणा को पूरी तरह नियमित मानदेय के रूप में प्रस्तुत करना वास्तविकता को छिपाने जैसा है।
स्वास्थ्य बीमा की घोषणा को भी नई उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को आयुष्मान योजना के दायरे में लाने का प्रावधान केंद्र के स्तर पर पहले ही किया जा चुका है। इसके अलावा स्मार्टफोन दिए जाने के बावजूद उसके रिचार्ज का भुगतान समय पर नहीं होता। आज आंगनबाड़ी का अधिकांश काम पोषण ट्रैकर एप के माध्यम से मोबाइल पर ही संचालित होता है। इसी डिजिटल कार्यप्रणाली से जुड़े प्रदर्शन के आधार पर PLI भी निर्धारित है। सितंबर से नए पोषण ट्रैकर एप में लोकेशन अनिवार्य किए जाने के कारण अनेक कार्यकत्रियों को व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
महिला सशक्तिकरण के दावे को सरकारी बजट के आईने में भी देखने की जरूरत है। वर्ष 2024-25 में महिला एवं बाल कल्याण के मद में 13,253.11 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया, लेकिन वास्तविक खर्च 9,284.95 करोड़ रुपये ही रहा। यानी करीब 32.7 प्रतिशत राशि खर्च ही नहीं हुई। सवाल यह है कि जब महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए आवंटित धन ही पूरा खर्च नहीं किया जा रहा है, तब महिला सशक्तिकरण का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना भी इसी विरोधाभास को सामने लाती है। इस योजना में बालिका के जन्म से लेकर स्नातक तक की शिक्षा के लिए कुल 25,000 रुपये देने का प्रावधान किया गया है। लेकिन कैग के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023-24 में योजना के लिए 1,050 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान था, जबकि वास्तविक खर्च केवल 74.6 करोड़ रुपये रहा, जो लगभग 7.1 प्रतिशत है। 2021 से 2024 के बीच घोषित बजट के मुकाबले वास्तविक खर्च बेहद कम रहा। इससे स्पष्ट है कि योजनाओं की घोषणा और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच गंभीर अंतर है।
महिला सशक्तिकरण केवल योजनाओं और घोषणाओं का सवाल नहीं है। यह महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। विधवा और वृद्धावस्था पेंशन तक कई बार समय से नहीं पहुंचती। हर वर्ष नवरात्र के दौरान ‘मिशन शक्ति’ के नाम पर महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण का व्यापक प्रचार अभियान चलाया जाता है, लेकिन महिलाओं के विरुद्ध अपराध की स्थिति सरकार के दावों पर सवाल खड़े करती है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के विरुद्ध 66,381 मामले दर्ज हुए, जो देश में सबसे अधिक थे और देश में महिलाओं के विरुद्ध दर्ज कुल अपराधों का लगभग 15.6 प्रतिशत थे। इस अवधि में देश में बलात्कार एवं हत्या के 230 मामलों में से 33 मामले उत्तर प्रदेश में घटित हुए। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की यह स्थिति बताती है कि प्रचार अभियानों के साथ-साथ जमीनी स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की कितनी बड़ी जरूरत है।
महिलाओं की सुरक्षा और सहायता के लिए पहले संचालित 181 वीमेन हेल्पलाइन इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। ‘नंबर एक—काम अनेक’ के नारे के साथ चलने वाली इस व्यवस्था में काउंसलिंग, कानूनी सहायता, चिकित्सा सहायता, पुलिस सहायता और रेस्क्यू जैसी सेवाएं एक साथ उपलब्ध थीं। बाद में इसे 112 व्यवस्था में मर्ज कर दिया गया और इसका स्वरूप मुख्यतः हेल्पलाइन तक सीमित हो गया। इससे जुड़े करीब 400 महिला कर्मचारियों के रोजगार को खत्म कर दिया गया। इसी तरह महिलाओं को संगठित और सशक्त बनाने वाली महिला समाख्या जैसी पहल को बंद कर दिया गया और सैकड़ों महिलाओं को काम से निकाल दिया।
ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय है। गांवों में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का तेजी से विस्तार हुआ है। महिलाओं को छोटे-छोटे ऋण देकर उनसे ऊंची ब्याज दरों पर वसूली की जाती है। कर्ज की अदायगी न होने पर आर्थिक दबाव के साथ सामाजिक अपमान और उत्पीड़न की शिकायतें भी सामने आती हैं। महिलाओं को वास्तविक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के बजाय यदि उन्हें महंगे कर्ज के जाल में धकेला जाएगा तो इसे महिला सशक्तिकरण कैसे कहा जा सकता है?
चुनाव के पहले महिलाओं के खातों में 50 हजार रुपये डालने की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। यदि सरकार ऐसा करती है तो उससे पहले यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या महिलाओं को अधिकार चाहिए या चुनावी खैरात? महिलाओं को स्थायी रोजगार, सम्मानजनक मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल, सस्ता संस्थागत ऋण और शिक्षा-स्वास्थ्य की गारंटी चाहिए। एकमुश्त आर्थिक सहायता इन बुनियादी अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकती।
दरअसल, महिला सशक्तिकरण का अर्थ महिलाओं को लाभार्थी बनाना नहीं, बल्कि उन्हें अधिकार-संपन्न नागरिक बनाना है। आंगनबाड़ी, आशा और अन्य स्कीम वर्कर महिलाओं से सरकार वर्षों से नियमित सरकारी सेवाओं जैसा काम ले रही है, लेकिन उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा, सम्मानजनक वेतन और पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं दी जा रही है। यह विरोधाभास दूर किए बिना महिला सशक्तिकरण की बात अधूरी रहेगी।
इसी सवाल को रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान के तहत मजबूती से उठाया जा रहा है। 20 सितंबर को वाराणसी में आयोजित ‘नई पीढ़ी संवाद’ में माइक्रोफाइनेंस और चिटफंड कंपनियों द्वारा महिलाओं की आर्थिक लूट पर रोक लगाने, महिला स्वयं सहायता समूहों को सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध कराने और महिलाओं को वास्तविक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की मांग उठाई जाएगी। साथ ही आशा और आंगनबाड़ी जैसी लाखों स्कीम वर्कर महिलाओं के सम्मानजनक मानदेय और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने का सवाल भी प्रमुखता से उठाया जाएगा।
महिला सशक्तिकरण का रास्ता प्रचार और चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि अधिकारों की गारंटी से होकर जाता है। महिलाओं को खैरात नहीं, रोजगार, सम्मानजनक आय, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और निर्णय लेने की बराबरी का अधिकार चाहिए। आज जरूरत इसी संवैधानिक अधिकार को हासिल करने और सरकार को उसके प्रति जवाबदेह बनाने की है।
(दिनकर कपूर, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के प्रदेश महासचिव हैं।)