औरतें नहीं, तो इतिहास नहीं: एक ज़रूरी किताब

क्या आपको अंग्रेजों के खिलाफ होने वाले आदिवासी विद्रोहों में हिस्सा लेने वाली दुर्गारानी, रानी कुंवर सबरन, राधा और हीना का नाम पता है? चलिए, आपको यह तो पता ही होगा कि अंग्रेजों ने जिस दिन से हमारी धरती को गुलाम बनाना शुरू किया उसी दिन से यहां की आदिवासी जनता, (औरत और पुरुष दोनों) ने उनके खिलाफ हथियार उठा लिया। उन्होंने अपनी ज़मीन पर दिकुओं को कभी बर्दाश्त नहीं किया। 

गौरतलब है कि 1764 में बक्सर की लड़ाई में बंगाल ने अपनी राजनीतिक संप्रभुता खोई और 1766 में चुआर आदिवासियों ने उनके ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी। सेना ने जब दमन शुरू किया तो पुरुष गांव छोड़ कर जंगलों से लड़ाई लड़ने लगे। उनकी औरतों ने प्रतिरोध जारी रखा। वे पुरुषों तक खाना पानी, सूचना और हथियार तक पहुंचाएं और ज़रूरत पड़ने पर ज़हर बुझे तीर लेकर लड़ाई में हिस्सा भी लिया। उनके प्रतिरोध की यह परंपरा आज तक कायम है। 

1774 से 1910 के बीच मौजूदा छत्तीसगढ़ के बस्तर में दस विद्रोह हुए। इनमें सबसे व्यापक 1910 का भूमकाल विद्रोह था। दुर्गारानी इस विद्रोह की एक नेता का नाम था। इनके बारे में ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

भूमकाल बग़ावत के परिणामस्वरूप माड़िया राज स्थापित हुआ और उस इलाके के लोगों ने 40 दिनों तक आज़ादी का आस्वाद लिया। 

उनकी रवायत के अनुसार ब्रिटिश फौजों ने भीषण दमन किया। गांव के गांव रौंद दिए गए (याद करिए सलवा जुडूम) हज़ारों आदिवासियों की निर्मम हत्या की गई। अनगिनत औरतों को यातनाएं दी गईं, उनका बलात्कार किया गया। रानी कुंवर सबरन को पकड़ कर रायपुर भेज दिया गया। वहीं पर अक्टूबर 1910 में उनकी मौत हो गई। 

यह सिलसिला कोल विद्रोह से लेकर, मुंडा विद्रोह, संथाल विद्रोह समेत नील विद्रोह तक जारी रहा है। इनमें असंख्य अनाम औरतें लड़ीं और शहीद हुईं। 

औरतों के इसी अलिखित इतिहास को कलमबद्ध किया है वी. गार्गी ने अपनी किताब – ‘No Women No History : Women in Indian Movement ( 19th century – 2004)’ ने। इस किताब को विरसम बुक्स ने प्रकाशित किया है। इसका मूल्य है 400/ 

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस किताब का हिंदी अनुवाद भी आ गया है। ‘महिलाओं के बगैर इतिहास नहीं : भारतीय आंदोलनों में औरतें (19वीं सदी से 2004 तक)। इसका अनुवाद किया है मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आज़ाद ने। 

मैंने यह किताब अंग्रेज़ी में ही पढ़ी। यह किताब वी. गार्गी द्वारा मूलतः अंग्रेज़ी में लिखे हुए नोट्स हैं। 

हम सभी जानते हैं, इतिहास अतीत की पुनर्रचना है। लेकिन इस पुनर्रचना में बहुत कुछ शामिल होता है। उसमें इतिहासकार की सोच, अतीत का बैगेज, पितृसत्ता का प्रभाव सभी कुछ शामिल है। इसलिए विभिन्न कारणों से इतिहास में औरतों के योगदान को हमेशा हाशिये पर रखा गया है। 

इस मायने में यह किताब बहुत उल्लेखनीय काम करती है कि 19वीं सदी से लेकर 2004 तक के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों के लम्बे समय में देश भर में उन तमाम सारी औरतों के नाम को दर्ज करती है, जिनके योगदान को इतिहास में कभी दर्ज ही नहीं किया गया। 

आदिवासी और किसान विद्रोहों से शुरू करके यह किताब समकालीन क्रांतिकारी महिला आन्दोलन तक के दौर में औरतों के योगदान को चिन्हित करती है। 

न केवल आम औरतों बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान रानी महारानियों के योगदान को भी इस किताब में उकेरा गया है। यह किताब बताती है कि किस तरह से प्रसिद्ध किट्टूर के युद्ध में रानी चेलम्मा ने इसका नेतृत्व किया। 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बेगम हजरत महल ने लखनऊ संघर्ष में नेतृत्व किया। रानी लक्ष्मी बाई का ज़िक्र तो है ही, साथ ही झलकारी बाई और अन्य औरतों का ज़िक्र भी है जिन्होंने विद्रोह में हिस्सा लिया। 

बड़े नामों के अलावा कुछ छोटी रियासतों की रानियों का ज़िक्र भी है। रामगढ़ मध्यप्रदेश में रानी मंडला अंग्रेजों के खिलाफ लड़ीं और गुरिल्ला युद्ध लड़ती रहीं। जब पराजय नज़दीक आ गई तो अपनी तलवार अपने शरीर में भोंक ली और शहीद हो गई। 

ऐसे ही रणजीत सिंह की पत्नी ज़िन्दन कौर और तुलसीपुर की रानी तेजबाई, तुक्लाई सुल्ताना जमानी बेगम, महारानी तपस्विनी आदि का जिक्र भी इस किताब में है, जिनका ज़िक्र इतिहास की किताबों में नहीं मिलता। 

इसके बाद तो समाज सुधार आंदोलनों से लेकर क्रांतिकारी आंदोलनों तक औरतों की हिस्सेदारी निर्बाध चलती रही। इनमें से बहुत से नाम पता हैं लेकिन अनेकों अनाम औरतें भी रहीं जिनका ज़िक्र इस किताब में किया गया है। 

1870-80 के दशक में बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र में विधवा विवाह की वकालत की गई और कई विधवाओं के पुनर्विवाह कराये गए। यह तो सब को पता है लेकिन यह किसी को नहीं पता होगा कि 1870 के दशक में कई विधवाओं ने बजाफ्ता बग़ावत की। उन्होंने समाज द्वारा जबरन सर मुंडवाये जाने का विरोध किया। किसी ने सफ़ेद साड़ी पहनने से इनकार किया तो किसी ने अपनी पसंद से पुनर्विवाह करने की ज़िद की। काकीनाडा में एक और विधवा घर से अपने गहने लेकर अपने शूद्र प्रेमी के साथ भाग गई। बाद में दोनों को चोरी के ज़ुर्म में जेल हो गई। ओडिशा के गंजम जिले के यसिका गांव की एक विधवा सीताम्मा वीर्सालिंगम से मिलने इतनी दूर की यात्रा के सारे कष्ट उठाते हुए राजमुंदरी आ गई। उन्हें पता लगा था कि उनके आश्रम में विधवा पुनर्विवाह किया जाता है। (पृष्ठ 37-38) 

ऐसे बहुत से नाम हम इस किताब से जान सकते हैं, जिनका उल्लेख इतिहास की किताबों में नदारद है। ऐसे ही कई महिला संगठन और उनकी महिला आन्दोलन में भूमिका के बारे में भी हमको इस किताब से पता चलता है। इसी में से एक है ‘अंजुमन-ए-ख़वातीन-ए-इस्लाम’। इस संगठन की स्थापना सन 1914 में अलीगढ़ में हुई थी। बहुत सारी सीमाओं के साथ इस संगठन ने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा के लिए काफ़ी काम किया। 

हिन्दू धर्म की अतियों के खिलाफ पेरियार के ‘आत्म सम्मान आन्दोलन’ में बड़ी संख्या में औरतों ने हिस्सेदारी की। उनकी पत्रिकाओं में औरतों ने अपने जीवन से जुड़े विविध विषय पर लेख लिखे। पेरियार औरतों की आज़ादी के लिए शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अपनी मर्ज़ी से विवाह को अनिवार्य मानते थे। औरतों ने उनके इस विचार का समर्थन किया। 1973 में पेरियार की मौत के बाद उनकी जीवनसाथी मणियम्मई ने उनके कामों को संभाला और नेतृत्व किया। 

अम्बेडकर के दलित आन्दोलन में भी औरतों की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रही। इस विषय पर भी इस किताब में अच्छा-खासा उल्लेख है। 

राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वदेशी आन्दोलन के समय से ही बड़ी संख्या में औरतें आन्दोलन में जुड़ने लगीं। गांधी के आन्दोलन ने भी आज़ादी की लड़ाई में औरतों की हिस्सेदारी को संभव बनाया। हालांकि अपनी इस भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए औरतों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। गांधी जी मूलतः औरतों के घर में ही रहने के हिमायती थे। आन्दोलन की बढ़ती लहर में औरतों की हिस्सेदारी को रोका भी नहीं जा सकता था। 

जब भी कांग्रेस के नेतृत्व ने आह्वान किया औरतों ने बढ़-चढ़ कर आन्दोलन में हिस्सेदारी की और हर संभव त्याग किया। मुस्लिम समुदाय से भी बड़ी संख्या में औरतों ने आन्दोलन में शिरकत की। स्वयं तवायफों ने भी इस आन्दोलन में अपना योगदान दिया। इस किताब में इन सभी का मय नाम विवरण दिया है। 

क्रांतिकारी आन्दोलन में भी बंगाल से शुरू करके समूचे देश में बड़ी संख्या में औरतें लड़ीं और शहादतें दीं। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। स्वदेशी आन्दोलन से लेकर भूमकाल विद्रोह, तेभागा, तेलंगाना और विभिन्न वामपंथी आंदोलनों में औरतों की हिस्सेदारी प्रेरणा का सबब है।  

यह किताब इन नामों को छू-छू कर आगे बढ़ती रहती है। इतने सारे नामों के बारे में विस्तार से जानने का मन होने लगता है। पर एक किताब में इतना कुछ संभव नहीं। इसके लिए बहुत शोध और संकल्प की ज़रूरत है। 

इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में औरतों की हिस्सेदारी और उनका ज़िक्र आश्वस्त करता है। इस किताब को पढ़ा जाना चाहिए और इस किताब का सिलसिला आगे बढ़ाया जाना चाहिए। जिससे इतिहास लेखन में एकाधिकार टूटे…

(नोट: यह किताब अंग्रेज़ी और हिंदी दोनो में उपलब्ध है…)

(अमिता शीरीं लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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