एसआईआर, ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ याचिका की सुनवाई करेगी सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और देशभर में चल रहे एसआईआर के ख़िलाफ़ सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को याचिका को अगले सप्ताह तीन सदस्यीय पीठ के सामने सूचीबद्ध करने की बात कही है। याचिका में ज्ञानेश कुमार के कामकाज, इनके तौर-तरीक़ों और एसआईआर को अवैध घोषित करने की मांग की गई है।

याचिका में आरोप है कि चुनाव आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के स्तर पर किया गया। इसमें अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त 2023 के कानून की धारा 18 का हवाला देते हुए एसआईआर को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की गई है।

याचिका में न केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं, बल्कि एसआईआर और उसके तहत मतदाता सूची में किए गए बदलावों को शुरू से ही अवैध और बिना कानूनी अधिकार के किया गया क़दम घोषित करने की मांग भी की गई है।

याचिका राकेश कुमार सिंह की ओर से दाखिल की गई है। उनकी तरफ़ से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मंगलवार को सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मामले को जल्द सुनने का अनुरोध किया। पीठ में सीजेआई सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं।

विकास सिंह ने दलील दी कि संविधान ने चुनावों की निगरानी, दिशा और नियंत्रण की शक्ति किसी एक व्यक्ति यानी मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं, बल्कि चुनाव आयोग नाम की संवैधानिक संस्था को दी है। उनका कहना है कि अगर चुनाव आयोग तीन सदस्यों वाली संस्था है तो उसके अधिकारों का इस्तेमाल भी संविधान और कानून में निर्धारित सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के मुताबिक होना चाहिए।

याचिका में इसी आधार पर यह सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले ऐसे फ़ैसले ले सकते हैं जो संवैधानिक रूप से पूरे चुनाव आयोग की शक्तियों के तहत आते हैं।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 की अलग-अलग धाराओं का हवाला दिया गया है। अनुच्छेद 324(1) चुनावों की निगरानी, दिशा और नियंत्रण का अधिकार चुनाव आयोग को देता है। याचिका का तर्क है कि संविधान में यह शक्ति ‘चुनाव आयोग’ को दी गई है, केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को नहीं। अनुच्छेद 324(2) के मुताबिक़ चुनाव आयोग में सीईसी और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं। वहीं अनुच्छेद 324(3) के मुताबिक, जब अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाते हैं तो CEC आयोग के अध्यक्ष होते हैं।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यहाँ संविधान ने दो चीजों को अलग-अलग रखा है- मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष हैं, लेकिन वे खुद पूरे आयोग के समान नहीं हैं। याचिका में कहा गया है कि अध्यक्ष होने की भूमिका और आयोग की सामूहिक संवैधानिक शक्ति को एक नहीं माना जा सकता।

याचिका में चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर एंड इलेक्शन कमिश्नर्स (एप्वाइंटमेंट, कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड टर्म ऑफ़ ऑफिस) एक्ट, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जहाँ फ़ैसला चुनाव आयोग की सामूहिक शक्ति के तहत आता है वहां निर्णय आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि आयोग के भीतर किसी मुद्दे पर सहमति हो तो सर्वसम्मति से और मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने अदालत से यह जाँचने की मांग की है कि एसआईआर और उससे जुड़े फ़ैसले वास्तव में किस प्रक्रिया से लिए गए।

याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के कथित मतभेदों और आपत्तियों का भी ज़िक्र किया गया है। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले क़रीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के कुछ फ़ैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में मतदाता सूची में बदलाव, नए मतदाताओं के पंजीकरण, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता डेटा तक पहुँच और आईटी सिस्टम से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

दोनों आयुक्तों ने कुछ फ़ैसलों को लेकर यह सवाल उठाया था कि वे उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना लिए गए। इन्हीं मतभेदों को आधार बनाकर मौजूदा याचिका में यह संवैधानिक सवाल उठाया गया है कि क्या SIR जैसे बड़े चुनावी अभ्यास के संबंध में निर्णय वास्तव में पूरे आयोग का निर्णय था।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने अपनी ओर से यह स्पष्ट किया था कि संधू और जोशी द्वारा कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र एक प्रतिनियुक्त अधिकारी से जुड़े मामले को लेकर थे और उनका संबंध चुनाव आयोग की नीति या आईटी विभाग से जुड़े मुद्दों से नहीं था।

चुनाव आयोग ने इसके अलावा एसाईआर से जुड़े फ़ैसलों को लेकर भी कहा है कि आयोग के निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए हैं। 27 सितंबर को आयोग की बैठक के बाद जारी स्पष्टीकरण में भी यह रुख सामने आया कि तीनों सदस्यों के बीच निर्णय प्रक्रिया को लेकर सहमति रही है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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