“….सत्याग्रह सीधी कार्रवाई के अत्यंत बलशाली उपायों में से एक है, इसलिए सत्याग्रही सत्याग्रह का आश्रय का लेने से पहले और सब उपाय आज़मा कर देख लेता है।” महात्मा गांधी।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में युवा भारत के प्रतिरोध ने मोदी+ शाह एकतंत्रीय सत्ता प्रतिष्ठान को झकझोर कर रख दिया है। 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में बहुमुखी वोट चोरी और कुशासन के खिलाफ उमड़े जन- सैलाब ने सत्ता की अभेद्य किलेबंदी को ध्वस्त कर दिया; प्रतिरोधिकर्मियों ने दिल्ली पुलिस और अर्धसैन्य बल को ज़म कर छकाया और लुकाछिपी रणनीति से उन्हें खूब दौड़ाया। सभी वामदल व सिविल सोसाइटी के कर्मठ एक्टिविस्टों और सामान्य जन की संकल्पबद्धता ने स्वतंत्रता संग्राम के दृश्यों को ताज़ा कर दिया; 1942 के ‘अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो (quit india)’ की तर्ज़ पर ‘मोदी-शाह-ज्ञानेश कुर्सी छोड़ो-सत्ता छोड़ो, वोट चोरों -सत्ता छोड़ो ‘ जैसे नारे राजधानी की सड़कों पर गूंजते रहे; गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन प्रतिरोध -ज्वार ठंडा नहीं पड़ा; नेहा बोरा और अन्य प्रतिरोधकर्मियों ने ‘शहरी गुरिल्ला शैली’ में अपना शांतिपूर्ण विरोध ज़ारी रखा। सारांश में, गांधी के प्रतिरोध -शस्त्रों की वापसी दिखाई दी। दिल्ली के तख़्त पर विशेष नस्ल शासक सत्तारूढ़ हैं। इनके विरुद्ध प्रतिरोध को अंतिम मंज़िल तक पहुंचाने के लिए ‘संरक्षित संघर्ष’ यानि दीर्घकालीन रणनीति की आवश्यकता है। इस दृष्टि से गांधी -शस्त्र ( सत्याग्रह, सिविल नाफरमानी, अनशन, धरना, विलासितमयी वस्तुओं की तिलांजलि, दल बदलुओं का सामाजिक बहिष्कार, ज्ञात भ्रस्टाचारियों का बहिष्कार, चुनाव सुधार के लिए आंदोलन आदि) बहुत कारगर सिद्ध हो सकते हैं। बेशक़ , इन शस्त्रों पर छाई ज़ंग को हटा कर इन्हें धारदार बनाने की ज़रुरत है।
वास्तव में, इक्कीसवीं सदी व्यक्ति और राजसत्ता की चरम व उग्र प्रवृत्तियों का काल है;आत्मकेन्द्रीयता, उपभोक्तावाद, यांत्रिकतावाद ,युद्धोन्माद, आक्रामक राष्ट्रवाद, बहुसंख्यवाद, अतीतवाद जैसे लक्षण भारत सहित विश्व रंगमंच पर छाए हुए हैं। विश्व के प्रमुख देशों में असंतोष, तनाव और अशांति का परिवेश है। अतिवादी प्रवृत्तियों के विस्फोट से कैसे निपटा जा सकता है, इसका वांछित समाधान निकालने में राजसत्ताओं के नियंत्रक असफल सिद्ध हो रहे हैं। इस असफलता ने राजसत्ता के साथ नागरिक समाज के ‘विभिन्नमुखी टकराव’ को जन्म दे दिया है। टकरावों से निपटने के लिए राज्य ज्यादतियों के विकल्प आज़माने लगता है। इससे स्थिति सुलझने के स्थान पर और बिगड़ती है, पेचीदा हो जाती है। पर, इस विकल्पहीनता के कुहासे में गांधी ‘लाइट टावर’ के रूप में अडिग खड़े दिखाई देते हैं। कुतुबनुमा के रूप में उनका जीवन मार्ग संचालन करता दिखाई देता है।
बीती सदी के अंत होते-होते महात्मा गांधी को ‘अतीत नायक ‘ के रूप में देखा जाने लगा था। भविष्य में उनकी सार्थक प्रासंगिकता पर संदेहयुक्त प्रश्न उठने लगे थे। एक प्रकार से भारत के बौद्धिक , नवोदित मध्य और युवा वर्गों में गांधी युग का ‘पटाक्षेप भाव’ भी था;गांधी संग्रहालय की ‘अनमोल वस्तु’ बन चुके हैं, समाज में ऐसे मानने वालों की कमी नहीं थी। कतिपय आत्ममुग्ध नेताओं के अनुसार ‘फिल्म गांधी ‘ के कारण ही महात्मा गांधी की पुनर्वापसी हो रही है, वरना वे विगत में समा गये थे।यह कितनी भ्रामक सोच है। लेकिन, भारत सहित विश्व के वर्तमान घटनाचक्र ने इस ‘प्रायोजित भ्रम’ को भंग कर दिया है। गांधी के परिवर्तन और अन्याय -कुव्यवस्था प्रतिरोध के शस्त्रों के पुनरीक्षण की ज़रुरत को आज़ शिद्दत के साथ महसूस किया जा रहा है। इस सन्दर्भ में, पिछले दिनों युवा भारत द्वारा शुरू किया गया ‘GEN Z आंदोलन’ को रेखांकित किया जा सकता है।
इसके साथ ही स्कूली छात्रों का ‘GEN। Alpha’ आंदोलन ने भी इसमें एक नया आयाम जोड़ दिया है। बेशक, इन दोनों प्रकार के आन्दोलनों को कॉकरोच जनता पार्टी का सहयोगी छाता प्राप्त है।विभिन्न राज्यों में ‘छात्रों की गूंज’ के नाम से आयोजित राहुल गांधी का आंदोलन युवा प्रतिरोधी -आन्दोलनों में खाद-बीज की भूमिका निभा रहा है। लेकिन, मूल प्रश्न यह है कि सत्ता,शस्त्र और पूंजी के अंधड़ में गांधी के सत्य+आग्रह+शांति+ प्रेम + अहिंसा के संवेदनात्मक तत्वों से निर्मित शस्त्र कितने कारगर साबित होंगे? विगत सदी के मध्य तक राज्य सत्ताएं दो दो महायुद्धों की विभीषिकाओं से ग्रस्त थीं। नतीज़तन, सशस्त्र क्रांतियां रूस, चीन , पूर्वी यूरोप, क्यूबा जैसे देशों में सफल रहीं थी। माओ के नेतृत्व में ‘लोंग मार्च’ सालों तक चला।क्यूबा में कास्त्रो व चे ग्वेरा के नेतृत्व में लम्बा छापामार युद्ध चला। सारांश में, राज्य सत्ताएं निर्बल थीं, और हथियारबंद प्रतिरोध का सामना करने में असमर्थ थीं। लेकिन, बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में स्थितियां पूरी तरह से बदल गईं। पूर्व राज्य के बनिस्बत वर्तमान राज्य के विभिन्न सत्ता प्रतिष्ठान हज़ार गुना शक्तिशाली हैं। दीर्घ कालीन सशस्त्र प्रतिरोधी आंदोलन की सार्थकता व सफलता संदिग्ध हैं।
देश में नक्सलवादी – माओवादी आंदोलन का निराशाजनक हश्र सामने है। पिछले दशकों में हज़ारों युवा सशस्त्र क्रांति के स्वप्न पर बलि चढ़ चुके हैं। हिंसक क्रांति के सन्दर्भ में समय की शिला पर गाँधी जी की भविष्यवाणी शत -प्रतिशत सही सिद्ध हुई। उन्होंने 1928 के यंग इंडिया में रूस की बोलशेविक क्रांति की जहां तारीफ़ की है, वहीं यह भी कहा है “ मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिंसा की बुनियाद पर किसी भी स्थायी रचना का निर्माण नहीं हो सकता।” (मेरे सपनों का भारत, पृ। 29 ) मानव इतिहास में बोलशेविक क्रांति की महानतम उपलब्धि सोवियत संघ का 1990 -91 में लोप हो गया। पूर्वी यूरोप की साम्यवादी सत्ताएं विलुप्त हो गईं। चीन में साम्यवाद अपनी मंज़िल से बहुत दूर है। लेकिन, गांधी के नेतृत्व में हुई अहिंसक क्रांति और तद्जनित लोकतान्त्रिक-गणतांत्रिक -धर्मनिरपेक्ष भारत 80 वर्ष का हो चुका है। यद्यपि, इसके वर्तमान स्वरूप को कतिपय चरम दक्षिण पंथियों द्वारा चुनौतियां दी जा रही हैं। फिर भी, अहिंसक व शांतिपूर्ण प्रतिरोध द्वारा कट्टरपंथी प्रतिगामी शक्तियों का सामना भी किया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में विभिन्न स्तरीय युवा आंदोलनों को देखा जाना चाहिए।
1906 में दक्षिण अफ्रीका में जन्मे सत्याग्रह को नवंबर में 120 वर्ष हो जाएंगे। इस 120 वर्ष की यात्रा में सत्याग्रह ने कई मोड़ देखे हैं; आज़ादी के आंदोलन में यह अपने उत्कर्ष पर था। फिर कुछ लुप्त- सा हो गया। लेकिन, पिछले कुछ समय से इसकी ‘अपने होने ‘ की दस्तकें फिर से सुनाई देने लगी हैं। इससे व्यवस्था परिवर्तन के लिए आशा की नई किरण दिखाई दे रही है। अतः
सत्याग्रह के आधुनिकतम संस्करणों की कार्यशैली को ठीक से समझना होगा। मेरी दृष्टि में, तीन बरस पहले हुआ ‘ किसान आंदोलन’ सत्याग्रह का ही एक विस्तारित रूप था; किसानों ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की चारों दिशाओं से करीब एक साल तक घेराबंदी की थी; 700 से अधिक किसानों के प्राणों का उत्सर्ग हुआ; किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं हुई; आज़ाद भारत में किसानों का सबसे लम्बा चला सत्याग्रह था। अंततः, सरकार झुकी और उसे किसान विरोधी तीनों कानूनों को वापस लेना पड़ा। इसी तरह का सफल प्रयोग कॉकरोच जनता पार्टी ने भी किया। पेपर लीक के मुद्दे को लेकर नई दिल्ली के जंतर मंतर पर देश भर के हज़ारों विद्यार्थियों और युवाओं ने 36 दिनों तक सत्याग्रह किया, लद्दाख के सोनम वांग्चुक के साथ-साथ कुछ युवा नेताओं ने आमरण अनशन भी किया। इस आंदोलन का सकारात्मक परिणाम भी निकला; केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफ़ा भी देना पड़ा। सत्याग्रह के संबंध में गांधी जी का स्पष्ट मत है कि सभी प्रकार के वैध विकल्पों के चुक जाने के बाद सत्याग्रह और अनशन का सहारा लेना चाहिए।
सत्याग्रह प्रणेता गाँधी कहते हैं ,” वह (सत्याग्रही) सदा और निरंतर सत्ताधारियों के पास जायेगा, लोकमत को प्रभावित और शिक्षित करेगा, जो उसको सुनना चाहते हैं उन सबके सामने अपना मामला शांति और ठन्डे दिमाग़ से रखेगा और जब ये उपाय वह आज़मा चुकेगा तभी सत्याग्रह का आश्रय लेगा’( मेरे सपनों का भारत,पृ। 88 ) उनका यह भी स्पष्ट मत है “ …सत्याग्रह में हिंसा, लूटपाट, आगजनी आदि के लिए कोई स्थान नहीं है…।” ( वही पृ। 89 )। इस परिप्रेक्ष्य में, कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूँज’ आंदोलनों में सत्याग्रह की धारा बहती हुई दिखाई देगी। इसी श्रेणी में रांची में सोरेन -सरकार के विरुद्ध चले विद्यार्थियों के सफल आंदोलन को भी रखा जा सकता है। इतना ही नहीं, सत्याग्रह के दौरान उपवास के शस्त्र के प्रयोग के सम्बन्ध में भी गाँधी जी अपने विचारों को स्पष्ट रूप से रखते हैं। उनका साफ़ निर्देश है,” उपवास सत्याग्रह के शस्त्रागार का एक अत्यंत शक्तिशाली अस्त्र है।
उसे हर कोई नहीं कर सकता …सत्याग्रही को उपवास अंतिम उपाय के तौर पर ही करना चाहिए, यानी तब जबकि अपनी शिकायत दूर करवाने के और सब उपाय विफल हो गए हों। … जिसमें आंतरिक शक्ति न हो उसे उपवास का विचार भी नहीं करना चाहिए, उपवास सफलता की आसक्ति रख कर कभी न किया जाए। “ ( वही पृ। 92 ) । दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का जन्म और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में प्रभावी प्रयोग, दोनों ही स्थानों में इस अहिंसात्मक अस्त्र का इस्तेमाल विदेशी सत्ता के ख़िलाफ़ किया गया था। लेकिन, आज़ाद भारत में स्वदेशी सत्ता की जनविरोधी या अतिवादी प्रवृत्तियों को दुरुस्त करने के लिए ‘सत्याग्रह अस्त्र’ का प्रयोग कैसे किया जाना चाहिए, आज़ का यह ‘गुरु प्रश्न’ प्रतिरोधी राजनीति के वाहकों, आंदोलनकारियों और चिंतकों को समानरूप से ललकार रहा है। हर पार्टी के शासन में ज्यादतियों की आशंका बनी रहती है और जनविरोधी नीतियां भी रहती हैं, और रहेंगी भी। प्रतिरोध की रणनीति कैसी रहे और उसमें सत्याग्रह का क्या स्थान रहे, इसमें गहन चिंतन-मनन की आवश्यकता है। सभी स्थितियों और प्रतिरोध का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। इस अस्त्र के प्रयोग से पहले ज़रूरी है कि स्थितियों और मुद्दों को सही सही ढंग से चिन्हित किया जाए और परिणामों का पर्याप्त आकलन रहे; आंदोलन में जब भी हिंसा घटी, गांधी जी ने इस अस्त्र को वापस लेने से हिचके नहीं।
स्वदेशी राजसत्ताओं के साथ जनता के भावनात्मक व प्रतिरोधात्मक, दोनों प्रकार के परिवर्तनशील रिश्ते रहते हैं। इनमें परिवर्तन शासन शैली और स्थिति जनित चुनौतियों से होता रहता है। सो, इन संबंधों का रूप स्थायी भाव का नहीं होता है। गाँधी जी ने सत्याग्रह का प्रयोग सार्वजनिक जीवन में ही नहीं, निजी जीवन -घर परिवार में भी किया।
गांधी जी के शब्दों में “जब मुझे कोई काम पसंद न आये और वह काम मैं न करूं, तो उसमें मैं सत्याग्रह या आत्मबल का उपयोग करता हूं… सत्याग्रह में मैं अपना ही बलिदान देता हूं।” ( हिन्द स्वराज, पृ। 63 ) महात्मा का मत यह भी है ,”सरकार तो कहेगी कि हम उसके सामने नंगे होकर नाचें। तो क्या हम नाचेंगे? अगर मैं सत्याग्रही होऊं तो सरकार से कहूंगा -यह कानून आप अपने घर में रखिये। मैं आपके सामने न तो नंगा होने वाला हूं और न नाचने वाला हूं।” ( वही पृ।64 )। क्योंकि सत्याग्रह प्रतिरोध का अंतिम शांतिपूर्ण अस्त्र है, इसलिए इसका सतर्कतामूलक व कल्पनाशील प्रयोग अपेक्षित है। यदि सत्याग्रही निःस्वार्थी हैं तब आज़ भी इस अस्त्र का प्रयोग सामाजिक -आर्थिक -राजनैतिक सुधारों के लिए किया जा सकता है। अधिनायकवादी व एकतंत्रीय सत्ता के प्रतिरोध में सत्याग्रह दीर्घकालीन ‘टिकाऊ अस्त्र’ सिद्ध हो सकता है। परिस्थितियों को ध्यान में रख कर इसे आधुनिक प्रचार टेक्नोलॉजी से भी लैस करना वांछित रहता है; किसान आंदोलन से लेकर जेन अल्फा आंदोलन में इसकी सार्थक भूमिका स्वतः सिद्ध है।
सारत्व यह है कि काल, समय, समाज और राष्ट्र की सीमाओं से मुक्त हैं महात्मा गांधी और उनके अहिंसात्मक अस्त्र।
(रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)