अहमदाबाद। राहुल गांधी ने जहां एक तरफ मोदी और शाह को उनके गढ़ गुजरात में हराने की चुनौती दे रहे हैं वहीं दूसरी तरफ सवाल उठ रहा है कि राहुल गांधी कैसे बीजेपी को उसके ही गढ़ में हराएंगे। यह चुनौती राहुल गांधी ने संसद में और गुजरात दौरे के समय अहमदाबाद में कार्यकर्त्ता सम्मलेन में दी है।
गुजरात विधानसभा चुनाव में अभी 3 वर्ष से अधिक का समय है। उससे पहले फ़रवरी-मार्च 2026 में गुजरात की छह महानगर पालिका का चुनाव है। जहां पिछले 20 वर्षों से बीजेपी का कब्ज़ा है। कांग्रेस पार्टी गुजरात में दयनीय स्थिति में है। विशेष कर शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस के पास जनाधार के नाम पर केवल मुस्लिम वोट है। महानगर पालिकाओं की गणित में सबसे अधिक पार्षद अहमदाबाद में हैं। इस समय 192 पार्षद वाली अहमदाबाद महानगर पालिका में कांग्रेस के पास 25 पार्षद हैं। इसी प्रकार वडोदरा महानगर पालिका में 76 में से कांग्रेस के पास 7 पार्षद हैं। भावनगर में 52 में से 8 और जामनगर में 64 में 11 पार्षद कांग्रेस के हैं।
सूरत महानगर पालिका में कांग्रेस का एक भी पार्षद नहीं है। सूरत में आम आदमी पार्टी विरोध में है। सूरत महानगर पालिका चुनाव 2021 में आम आदमी पार्टी ने 27 सीटों पर जीत हासिल की थी। आप के 10 पार्षद बीजेपी में चले गए और यहां 17 पार्षद के साथ आम आदमी पार्टी विपक्ष में है। गुजरात विधानसभा में कांग्रेस के पास मात्र 12 विधायक हैं। ऐसी स्थित में राहुल गांधी का चुनौती देना देश को आकर्षित करता है और देश भर का मीडिया राहुल गांधी की इस चुनौती पर चर्चा तो कर रहा है लेकिन मीडिया गुजरात में कांग्रेस की ज़मीनी हकीकत पर बात नहीं कर रहा है।
राहुल गांधी ने भले ही बीजेपी को चुनौती दे दी हो लेकिन वह जानते हैं कि उनके पास गुजरात में भाजपा से लड़ने के लिए रेस के घोड़े नहीं हैं। शायद इसीलिए अहमदाबाद में अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यहां कांग्रेस के पास रेस के अलावा शादी के घोड़े भी हैं। कांग्रेस से यही गलती होती आई है कि रेस के घोड़ों को शादी में नचाया गया और शादी के घोड़ों पर रेस लगाई गई। राहुल के अनुसार यह गलती आगे नहीं होगी।
गुजरात में कांग्रेस के सामने यह बड़ी चुनौती नहीं है कि उनके पास विधायकों और पार्षदों की संख्या बहुत थोड़ी है, संगठन कमज़ोर है। कांग्रेस के पास सबसे बड़ी चुनौती है कि कांग्रेस के संगठन में बीजेपी का स्लीपर सेल है। जो पार्टी निर्णयों को प्रभावित करते हैं। जब कांग्रेस के कार्यकर्त्ता सरकार और प्रशासन के विरोध में कोई आन्दोलन करते हैं तो स्लीपर सेल नेता ही आम जन के हितों में उठे आन्दोलन को दबाकर प्रशासन की मदद करते हैं। कांग्रेस के बड़े नेता जब किसी आन्दोलन में शामिल होते हैं तो आन्दोलन की पूरी जानकारी पुलिस को दे देते हैं। कांग्रेस के स्लीपर सेल नेता पुलिस को पहले से बता देते हैं कि उनकी गिरफ़्तारी कहां से और कैसे करनी है। पुलिस को यह भी बताया जाता है कि उनकी गिरफ़्तारी टांग पकड़ कर करनी है या गिरेबान पकड़ना है, या इज्ज़त के साथ हाथ पकड़ कर गाड़ी में बिठा देना है।
1 और 2 जुलाई को बीजेपी, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद द्वारा अहमदाबाद स्थित कांग्रेस भवन पर हमला हुआ था। इस हमले में कथित तौर पर दोनों तरफ से पथराव हुआ था। पुलिस ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों के खिलाफ FIR दर्ज की है। FIR ज़मानती और गैर ज़मानती दोनों धाराओं में हुई है। पहली फ़रियाद पुलिस ने खुद दाखिल की है। जिसमें पुलिस अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के विरोध पक्ष नेता शेहजाद खान, प्रगति नन्दनिया, हेता बेन अहीर सहित 200 से 250 कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया है। इसी FIR में बीजेपी के किसी नेता या कार्यकर्त्ता का नाम न लिख कर पुलिस ने 150 – 200 कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया है।
कांग्रेस विधायक शैलेश परमार द्वारा दर्ज कराइ गई FIR में विहिप नेता ज्वलित मेहता, बीजेपी कार्यकर्त्ता ऋत्विक शाह और चिंतन लोधा सहित अन्य 8-9 लोगों को आरोपी बनाया गया है। बीजेपी की तरफ से विनय देसाई द्वारा दर्ज एक अन्य FIR में 26 कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नामज़द किया गया है। कांग्रेस की तरफ से एक अन्य FIR पूर्व विधायक और शहर अध्यक्ष हिम्मत सिंह पटेल ने दर्ज कराई है जिसमें बीजेपी के 15 कार्यकर्ता को नामज़द किया गया है। दोनों तरफ से किसी बड़े नेता को FIR में नामज़द नहीं किया गया है। कांग्रेस विधायक शैलेश परमार को पुलिस कांग्रेस भवन में घुस कर गिरेबान पकड़ कर ले गई थी। उनके साथ अन्य 28 लोगों को पुलिस ने डिटेन किया था। सभी को उसी दिन पुलिस ने जाने दिया था। इनके विरुद्ध पुलिस प्राथमिकी दर्ज नहीं किया है।
पुलिस ने अब तक जिन पांच लोगों को गिरफ्तार किया है वह सभी कांग्रेस पार्टी के हैं। बीजेपी के किसी भी कार्यकर्त्ता की अब तक गिरफ़्तारी नहीं हुई है। जिस कारण पुलिस पर एक तरफ़ा कार्यवाही करने का आरोप लग रहा है। भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं को नामज़द न किये जाने पर ज़ोन 7 के डीसीपी शिवम वर्मा ने जनचौक संवाददाता को बताया “किसी को क्लीन चिट नहीं दी गई है। पुलिस रथ यात्रा के बंदोबस्त में व्यस्त थी जिस कारण अभी सीसीटीवी फुटेज खंगाले नहीं जा सके हैं। जांच अभी चल रही है। जांच में जिस किसी का नाम आया उसके खिलाफ पुलिस कानूनी कार्यवाही करेगी।”
शैलेश परमार पांच बार के विधायक हैं जो अनुसूचित जाति से आते हैं। शैलेश परमार को एक अपराधी की तरह पकड़ने की घटना की निंदा करते हुए दलित नेता एवं विधायक जिग्नेश मेवाणी ने मीडिया में कहा कि “इस घटना के बाद पुलिस और गुजरात सरकार का जातिवादी चरित्र भी बाहर आ गया। पुलिस कांग्रेस भवन में घुसती है। जहां और भी नेता होते हैं लेकिन पुलिस पांच टर्म के दलित विधायक शैलेश परमार को घसीटते हुए ले जाती है। जैसे कोई विधायक नहीं बुटलेगर या ड्रग पेडलर हो। उन्होंने (शैलेश परमार) ने पुलिस को बताया भी था। मैं पांच टर्म का विधायक हूं मुझे डिटेन या गिरफ्तार करना है तो उसका भी प्रोटोकॉल होता है। फिर भी पुलिस ने ऐसा व्यवहार किया क्योंकि वह अनुसूचित जाति से आते हैं। पुलिस की इस हरकत से हम लोग बहुत आहत हैं।”
शैलेश परमार से जनचौक संवाददाता ने पूछा कि “पुलिस द्वारा प्रोटोकॉल तोड़कर जिस प्रकार कांग्रेस कार्यालय में घुस कर आप को डिटेन किया गया है… क्या आप की तरफ से पुलिस के खिलाफ कोई क़दम उठाया गया है ?”
जिसके जवाब में परमार ने कहा “हमने पुलिस के विरुद्ध कोई मुकदमा दर्जा नहीं कराया है। मैंने विश्व हिन्दू परिषद् के खिलाफ एक FIR दर्ज कराई है। पुलिस द्वारा की गई मेरी गिरफ़्तारी की जानकारी हमने विधान सभा अध्यक्ष को दे दी है। वह जांच करेंगे।”
संवाददाता ने जब पूछा कि क्या आप विशेषाधिकार हनन का नोटिस देंगे। तो परमार ने कहा विशेषाधिकार नोटिस नहीं विधाvसभा अध्यक्ष को सूचित किया है। शैलेश परमार से जब पूछा गया कि आपको ही पुलिस ने क्यों उठाया जिसके जवाब में परमार ने आगे कहा कि “पुलिस किसी को भी डिटेन कर सकती है। पुलिस के पास किसी को भी डिटेन करने का अधिकार है। लेकिन उन्होंने जिस प्रकार से कांग्रेस भवन में घुस कर मेरा डिटेंशन किया है। वह गलत था।”
पुलिस द्वारा शैलेश परमार को कांग्रेस भवन में घुस कर डिटेन किये जाने पर जब ज़ोन 7 डीसीपी से पूछा गया तो डीसीपी शिवम् वर्मा ने कहा कि “शैलेश परमार को प्राइमा फेसी के तहेत डिटेन किया गया था। बाद में उनके ऊपर कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। उनका मात्र डिटेंशन हुआ था।”
गुजरात प्रदेश अनुसूचित जाति मोर्चे के चेयरमैन हितेंद्र पिथडिया ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पत्र लिख कर आयोग से कहा है कि पुलिस कर्मचारी जानते थे कि शैलेश परमार दलित समाज से आते हैं। इसीलिए उनका अपमान किया गया। जिससे दलित समाज की भावना आहत हुई है। भजपा सरकार के इशारे पर दलित विधायक का अपमान किया गया है। पुलिस के खिलाफ एट्रोसिटी कानून के तहत कार्यवाही की जाये।
1 और 2 जुलाई को जिस प्रकार पुलिस ने कांग्रेस भवन में घुस कर कार्यवाही किया उसके खिलाफ विधायक जिग्नेश मेवाणी ने एक निजी टीवी चैनल से कहा था कि “6 जुलाई को अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर ऑफिस को कांग्रेस नेता मार्च करेंगे। इस मार्च में शामिल होने के लिए हम लोग राहुल गाँधी से भी रिक्वेस्ट करेंगे।” लेकिन अभी तक कांग्रेस ने कोई मार्च नहीं किया गया है। राहुल गांधी अहमदाबाद आए और चले भी गए।
देश भर के मीडिया भले ही राहुल गांधी के भाषणों पर चर्चा कर रहे हो लेकिनगुजराती अख़बार कांग्रेस और बीजेपी के इस संघर्ष को नूराकुश्ती बता रहे हैं। गुजराती अखबार सवाल उठा रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी और भाजपा के बड़े नेताओं को पुलिस ने क्यों नामज़द नहीं किया। दोनों तरफ से मात्र कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया गया है। बीजेपी विधायक अमित शाह जो अहमदाबाद शहर अध्यक्ष भी हैं। उनके बेटे को हिंसा के समय कांग्रेस भवन के सामने देखा गया लेकिन पुलिस ने उन्हें नामज़द नहीं किया है।
अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के विरोध पक्ष नेता शेहजाद खान पठान को पुलिस ने पहले नंबर का आरोपी बनाया है। क्योंकि पठान मुस्लिम हैं और बीजेपी की राजनीति को हिन्दू मुस्लिम सूट करता है। गुजरात प्रदेश अध्यक्ष शक्ति सिंह गोहिल ने राहुल गांधी के संबोधन से पहले कहा था कि गुजरात की जनता भाजपा को हराएगी।
(अहमदाबाद से कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट)
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