एसआईआर के जवाब में कर्नाटक सरकार का ‘स्थायी निवास प्रमाणपत्र’ देने का ऐलान

कर्नाटक में एसआईआर के जवाब में राज्य सरकार ने स्थायी निवास प्रमाणपत्र जारी करने का ऐलान किया है।

राज्य सरकार ने चुनाव आयोग को चेतावनी भी दी है मतदाता सूची संशोधन स्वीकार है, लेकिन उसे पारदर्शी तरीके से करना होगा।

कर्नाटक कैबिनेट ने चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण फ्रेमवर्क की गोपनीयता, मनमानेपन और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम कटने  की आशंकाओं को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। लेकिन इससे मुकाबला करने के लिए उसने अपनी तैयारी भी कर ली है।

कैबिनेट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कर्नाटक मतदाता सूची के ‘पारदर्शी और साक्ष्य-आधारित’ संशोधन का समर्थन करता है, लेकिन इस प्रक्रिया के नाम पर वैध मतदाताओं को बाहर करने के किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सरकार का रुख साफ है: “कर्नाटक मतदाता सूची के संशोधन का समर्थन करता है, उसके विध्वंस का नहीं।”

इस बीच, मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए कहा कि राज्य सरकार नागरिकों को इस विशेष अभियान में मदद करने के लिए ‘स्थायी निवास प्रमाण पत्र’  जारी करेगी। उन्होंने सभी पात्र नागरिकों से इस सुधार अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने और अपना पंजीकरण पूरा करने की अपील की है।

शिवकुमार ने एक्स पर लिखा: “जो कोई भी निवास प्रमाण पत्र चाहता है, उसे यह ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से मिलेगा। नागरिक सेवा सिंधु पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन या संबंधित केंद्रों पर जाकर ऑफलाइन इसे प्राप्त कर सकते हैं।”

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चुनाव आयोग के कड़े नियमों के कारण आम नागरिकों, विशेषकर किराएदारों और प्रवासियों को निवास का पुख्ता सबूत देने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उससे मुकाबला करने के लिए कांग्रेस सरकार ने यह बड़ी पहल की है।

डीके शिवकुमार की कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा है कि कर्नाटक में एसआईआर को पूरी तरह से लागू करने से पहले निर्वाचन आयोग को निम्नलिखित 11 बिंदुओं पर कदम उठाने होंगे:

पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा: एसआईआर प्रक्रिया के कानूनी आधार, नाम हटाने के मानदंडों, सुपरवाइज़री ढांचे और सॉफ्टवेयर प्रणालियों की एक स्वतंत्र समीक्षा की जाए।

समयसीमा में विस्तार: प्रगणक प्रपत्रों  को जमा करने की समयसीमा को बढ़ाकर कम से कम तीन महीने किया जाए, ताकि बीएलओ और प्रशासन पर अनुचित दबाव न पड़े।

विस्तृत मैनुअल का प्रकाशन: “तार्किक विसंगतियों” और सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम के मानदंडों को स्पष्ट करने वाला एक विस्तृत मैनुअल सार्वजनिक किया जाए।

बिना ग्राउंड वेरिफिकेशन के नोटिस नहीं: बीएलओ द्वारा फील्ड सत्यापन किए बिना किसी भी मतदाता को नोटिस न दिया जाए। मामूली स्पेलिंग या लिप्यंतरण की त्रुटियों को नाम हटाने का आधार न बनाया जाए।

पक्ष रखने का पूरा मौका: किसी भी मौजूदा मतदाता का नाम तब तक न हटाया जाए जब तक कि उसे निष्पक्ष प्राधिकारी के समक्ष सुनवाई का अवसर और एक सकारण आदेश न मिल जाए।

दस्तावेजों की सूची का सरलीकरण: स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची को स्पष्ट किया जाए। वोटर आईडी और अन्य मुख्य पहचान पत्रों को बाहर रखने के फैसले पर पुनर्विचार हो, तथा राज्य के ‘कुटुंब आईडी’ को मान्यता दी जाए।

थोक आपत्तियों पर रोक: वैध फॉर्म-6 (नए नाम) और फॉर्म-7 (आपत्तियां) की जांच निष्पक्ष हो, ताकि थोक में दी जाने वाली फर्जी आपत्तियों के कारण सामूहिक रूप से नाम न कटें।

डेटा को सार्वजनिक करना: नोटिस, नाम जुड़ने, कटने और जारी आदेशों का मशीन-पठनीय दैनिक डेटा सार्वजनिक डोमेन में रखा जाए।

पारदर्शी सॉफ्टवेयर का उपयोग: मतदाता सूची की मैपिंग और सत्यापन में किसी भी प्रकार के अपारदर्शी एआई टूल का उपयोग न हो। सभी सॉफ्टवेयर की स्वतंत्र रूप से जांच की जाए।

पर्यवेक्षकों की भूमिका तय हो: विशेष रोल पर्यवेक्षकों और माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की भूमिका स्पष्ट की जाए, ताकि चुनावी पंजीकरण अधिकारी स्वतंत्र रूप से काम कर सकें।

वंचित वर्गों के लिए विशेष सुरक्षा: महिलाओं, प्रवासी मजदूरों, झुग्गीवासियों, विमुक्त एवं खानाबदोश जनजातियों, विधवाओं, दिव्यांगों, अनाथों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए विशेष सुरक्षा उपाय किए जाएं ताकि वे इस प्रक्रिया में न छूटें।

राज्य सरकार द्वारा उठाए गए इन कड़े प्रशासनिक और कानूनी सवालों पर भारत निर्वाचन आयोग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य और केंद्र के बीच एक बड़े प्रशासनिक टकराव का रूप ले सकता है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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