नई दिल्ली। मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘उद्योग’ की परिभाषा की पुनर्व्याख्या के हालिया फैसले, जिससे कई संस्थान उद्योग की अवधारणा से बाहर और अतः कई मजदूर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हो जाएंगे, के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया और फ़ैसले को वापस लेने की माँग की।
यह प्रस्ताव रविवार, 30 अगस्त को नई दिल्ली के सुरजीत भवन सभागार में “मासा की 10 वर्षों की यात्रा और भारत में हाल का मज़दूर आंदोलन” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार में किया गया। सेमिनार में पारित अन्य प्रस्तावों में दिल्ली एनसीआर में इस वर्ष उठे मजदूर आंदोलन में नोएडा में गिरफ्तार मजदूरों व कार्यकर्ताओं की रिहाई एवं उनपर सभी मुकदमे रद्द करने की मांग का प्रस्ताव और हरियाणा के नगरपालिका सफाई मजदूरों एवं अग्निशमन कर्मचारियों द्वारा अपनी जायज़ मांगों पर चलाए जा रहे संघर्ष से पूर्ण एकजुटता व समर्थन जाहिर करते हुए एवं उनकी मांगों को पूरा करने की मांग पर प्रस्ताव शामिल थे।
सेमिनार में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई सौ मज़दूरों और कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
मानसेर, फरीदाबाद, पानीपत, हरिद्वार, दिल्ली, दार्जिलिंग आदि में हाल के तथा जारी मज़दूर संघर्षों के मज़दूर प्रतिनिधियों ने सेमिनार को संबोधित किया।
सेमिनार में मासा के घटक संगठनों—मज़दूर संघर्ष समिति, जन संघर्ष मंच हरियाणा, ग्रामीण मज़दूर यूनियन (बिहार), सीएसटीयू, आईइफ़टीयू-सर्वहारा, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, एआईडब्ल्यूसी, बिहार निर्माण और असंगठित श्रमिक यूनियन, कर्नाटक श्रमिक शक्ति, लाल झंडा मज़दूर यूनियन—ने अपने विचार रखे। मासा के घटक संगठनों के साथ-साथ संयुक्त किसान मोर्चा, टीयूसीआई, आईएफटीयू-न्यू, आईसीटीयू, क्रांतिकारी मज़दूर मोर्चा, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मज़दूर कार्यकर्ता समिति), एआईआरटीयू और यूपी-सीएचहो के प्रतिनिधियों ने भी सेमिनार में भाग लिया और सभा को संबोधित किया।
मासा की तरफ से ने मासा के संघर्षशील सफर के 10 वर्ष पूरे होने पर बधाई देते हुए बताया कि मजदूर आंदोलन में स्थापित अर्थवादी कानूनवादी व रस्मअदायगी की प्रवृत्ति एवं बिखराव के खिलाफ मासा को जुझारू मजदूर संगठनों के साझा मंच के रूप में 28 अगस्त 2016 को खड़ा किया गया था। इसे पूंजीवाद के नवउदारवादी हमलों, निजीकरण, मजदूर विरोधी नीतियों और शोषण दमन के खिलाफ निरंतर समझौतहीन संघर्ष, आरपार की लड़ाई के नारे के तहत तैयार किया गया था।
उन्होंने बताया कि मासा ने मजदूरों की गुलामी के दस्तावेज 4 लेबर कोड और आर्थिक मांगों पर संघर्ष के साथ साथ जरूरी राजनीतिक मुद्दों पर भी हस्तक्षेप किया है। फासीवादी मुहिम, साम्राज्यवादी युद्धों, फिलीस्तीन में जारी जनसंहार, जी20 जैसे मंचों के खिलाफ अभियानों के अतिरिक्त किसान आंदोलन व अन्य जनांदोलनों के साथ एकजुटता स्थापित की गई। साथ ही, इस वर्ष पानीपत, बरौनी, सूरत से शुरू हुए उद्योग उपक्रमों के मजदूरों के देशव्यापी उभार, एवं दिल्ली एनसीआर में स्वतःस्फूर्त औद्योगिक हड़ताल में भी जमीनी हस्तक्षेप किया गया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए हिल प्लांटेशन इंप्लाइज यूनियन, लॉन्गव्यू यूनिट दार्जिलिंग की अध्यक्ष बिंदिया ने लॉन्गव्यू चायबगान में चले 102 दिन की हड़ताल के बारे में बताया जिसमें अंततः मजदूरों की जीत हुई और 6 करोड़ की बकाया पीएफ राशि का भुगतान किया गया, साथ ही गैरकानूनी मजदूर विरोधी कार्रवाई के लिए मालिक की गिरफ्तारी भी हुई।
जयप्रकाश (इमके हरिद्वार के मजदूर कार्यकर्ता) ने न्यूनतम वेतन व संबंधित मांगों के लिए हरिद्वार में उठे मजदूर आंदोलन के बारे में बताया जिसमें मजदूर नेताओं पर गुंडा एक्ट की कार्रवाई की गई एवं जिला बदर तक का नोटिस दिया गया।
आकाश (मानेसर में फैक्ट्री मजदूर) ने अप्रैल में गुरूग्राम मानेसर में औद्योगिक मजदूरों की दयनीय स्थिति (12-14 घंटे काम करने के बाद भी 12000 मजदूरी) को लेकर उठे आंदोलन एवं पुलिस दमन के बारे में बताया जिसमें उन्हें भी फर्जी मुकदमे लगा कर गिरफ्तार कर 49 दिन जेल में रखा गया था।
कुसुम (फरीदाबाद की फैक्ट्री मजदूर) ने अप्रैल-मई में फरीदाबाद में उठे औद्योगिक मजदूर आंदोलन के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि कैसे मजदूरों को मनमाने ढंग से अर्द्धकुशल अकुशल श्रेणियों में बांट कर न्यूनतम वेतन में कटौती की जाती है।
अनिरुद्ध (भगतसिंह स्टूडेंट & यूथ फ्रंट) ने पानीपत इंडियन ऑयल रिफाइनरी में न्यूनतम मजदूरी और 8 घंटे काम के लिए उठे मजदूर आंदोलन के बारे में बताया जिसमें हजारों ठेका रिफाइनरी व निर्माण मजदूरों ने भागीदारी की थी। यहां भी पुलिस दमन के तहत दो कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई थी।
मो. इरफान (जंतर-मंतर प्रदर्शन में मज़दूर चेहरा) ने मजदूरों की एकता का संदेश देते हुए और मजदूरों को जाति धर्म में बांटने के लिए शासकों की चालों का भंडाफोड़ करते हुए क्रांतिकारी कविताएं प्रस्तुत की। उन्होंने मजदूर वर्ग के महानतम शिक्षक काल मार्क्स के जीवन और शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हुए पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
सम्मेलन को इनके अलावा प्रवेंद्र, लक्षदीप (ग्रामीण मजदूर यूनियन बिहार) पी कृष्णप्रसाद (संयुक्त किसान मोर्चा के सेक्रेटेरिएट सदस्य), मंटू (इफ्टू सर्वहारा), पी के शाही (एआईइफ़टीयू न्यू), जयप्रकाश (बिहार निर्माण असंगठित श्रमिक यूनियन), श्यामवीर (इंकलाबी मजदूर केंद्र) आदि ने भी संबोधित किया।
सेमिनार में वक्ताओं ने उल्लेख किया कि मासा का दस वर्षों का अनुभव केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसने कितने प्रदर्शन आयोजित किए हैं, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह समकालीन भारतीय मज़दूर वर्ग आंदोलन की एक केंद्रीय समस्या को संबोधित करने का निरंतर प्रयास है: मज़दूर संघर्षों के विखंडन को कैसे दूर किया जाए और राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित/एकजुट संघर्ष कैसे विकसित किया जाए; महज़ कर्मकांड या अर्थवाद से आगे बढ़कर भारतीय मज़दूर वर्ग के एक समझौताविहीन, सतत और संघर्षशील आंदोलन का विकास कैसे किया जाए; और श्रम के शोषण को समाप्त करने के लिए पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ निर्णायक संघर्ष के लिए राजनीतिक रूप से सचेत मज़दूर वर्ग की लामबंदी कैसे विकसित की जाए।
वक्ताओं ने कहा कि मासा भारतीय मज़दूर वर्ग के एक सतत, संघर्षशील और निर्णायक संघर्ष के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारे लिए यह आत्ममंथन का एक अवसर है—अपनी उपलब्धियों पर पीछे मुड़कर देखने, उन्हें आगे बढ़ाने, संभावनाओं का पता लगाने तथा अपनी और भारत के समकालीन मज़दूर वर्ग आंदोलन की सीमाओं और चुनौतियों का सामना करने का अवसर।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)