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कोरोना कालः गोदी मीडिया लीपापोती में लगा, लेकिन विदेशी समाचारों में निशाने पर हैं पीएम मोदी

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने भले ही यहाँ इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया को मैनेज कर रखा हो पर पश्चिमी देशों की मीडिया कोरोना की दूसरी लहर में सरकार की नाकामी की सच्चाई जहाँ खुलकर सामने रख रही है, वहीं फ़्रांस भारत के बीच हुए राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करके इमानदार सरकार का रचा गया मिथक तोड़ कर रख दिया है। फ्रांस के न्यूज पेपर ‘ले मोंडे’   में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना संकट के पीछे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अहंकार, बड़बोलेपन और कमजोर प्लानिंग का हाथ है। दुनिया भर में वैक्सीन एक्सपोर्ट करके ढिंढोरा पीटा पर  तीन महीने बाद खुद भारत को दूसरे देशों से वैक्सीन मंगाना पड़ा। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा है कि मोदी सरकार जन असन्तोष को दबा रही है।

जब मोदी मई 2019 में दोबारा प्रधानमंत्री बने थे, तभी द गार्जियन ने लिखा था कि भारत की रूह अंधेरी राजनीति में खो गई है। द न्यूयॉर्क टाइम्स लिखा था कि भारतीय मतदाताओं ने लंबा और डरावना ख्वाब’ चुना। दो साल बाद मई 2021 में विदेशी मीडिया की तल्खी मोदी सरकार को लेकर और बढ़ गई है। कोरोना की दूसरी लहर में सरकार नाकाम हुई तो विदेशी मीडिया भी सच्चाई खुलकर सामने रख रही है।

फ्रांस के न्यूज पेपर ‘ले मोंडे’  में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर रोज 3.5 लाख नए कोरोना मरीज और 2000 से ज्यादा मौतें हो रही हैं। ये स्थिति खतरनाक वायरस की वजह से है, लेकिन इसके पीछे भारतीय प्रधानमंत्री के घमंड, बड़बोलेपन और कमजोर प्लानिंग का भी हाथ है। दुनिया भर में वैक्सीन एक्सपोर्ट करके ढिंढोरा पीटा। तीन महीने बाद खुद भारत में खौफ का मंजर देखने को मिला। भारत के हालात आपे से बाहर हो चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद की जरूरत है। 2020 में अचानक लॉकडाउन लगा और लाखों प्रवासी मजदूरों को शहर छोड़ना पड़ा। प्रधानमंत्री ने पिछले साल सिस्टम लॉक करके सब रोका और 2021 की शुरुआत में खुला छोड़ दिया।

‘ले मोंडे’  ने लिखा है कि मेडिकल सिस्टम पर सिर्फ भाषण दिए गए। जनता की सुरक्षा के बजाय बेवजह उत्सव हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने स्थिति और बिगाड़ दी। राज्य के चुनाव में जीत के लिए प्रचार हुए, जहां उन्होंने बिना मास्क के आई हजारों की भीड़ को संबोधित किया। कुंभ मेले को भी इजाजत दे दी। लाखों लोग इकट्ठा हुए और ये कोरोना का हॉटस्पॉट बन गया।

‘ले मोंडे’  ने लिखा है कि प्रधानमन्त्री मोदी का सभी को वैक्सीन देने का टारगेट, लेकिन वे देश की उत्पादन क्षमता की असलियत से वाकिफ नहीं हैं। राजनीतिक फायदा जहां से मिले वहां वैक्सीनेशन को प्राथमिकता दी गई, न कि जरूरत के मुताबिक। नतीजा ये कि अभी तक बमुश्किल दस फीसदी आबादी को वैक्सीन मिली है। यानी हर्ड इम्युनिटी हासिल करने के लिए जरूरी वैक्सीनेशन शायद 2023 तक भी पूरा न हो सके। दूसरे ग्लोबल मीडिया हाउसेज भी मोदी सरकार को फेल मान रहे हैं।

कोरोना की दूसरी और भयावह लहर का सामना कर रहे भारत में पहली मई से 18+ को भी वैक्सीन लगने लगेगी। इस अभियान को लेकर चिंता यह थी कि वैक्सीन डोज नहीं हैं, ऐसे में 18+ को कैसे वैक्सीनेट किया जाएगा? पर अब खबरें आ रही हैं कि रूसी वैक्सीन स्पुतनिक V ने इस चिंता को दूर कर दिया है। स्पुतनिक V का पहला बैच भारत में पहली मई को उपलब्ध हो जाएगा। स्पुतनिक V के पहले बैच से पूरे देश में 18+ के टीकाकरण में मदद मिलेगी। इससे पहले 13 अप्रैल को भारत ने अन्य देशों में पहले से उपलब्ध वैक्सीनों को इमरजेंसी अप्रूवल दिया था। ताकि ज्यादा से ज्यादा वैक्सीन डोज उपलब्ध हो सकें और वैक्सीनेशन की रफ्तार को बढ़ाकर कोरोना वायरस की दूसरी लहर को रोका जा सके।

भारत में 16 जनवरी को टीकाकरण शुरू हुआ था और इसके लिए इसी साल की शुरुआत में कोवीशील्ड और कोवैक्सिन को मंजूर किया गया था। कोवीशील्ड को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका ने मिलकर बनाया है। भारत में पुणे का सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया इसका प्रोडक्शन कर रहा है। वहीं, कोवैक्सिन को भारत बायोटेक ने इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरलॉजी के साथ मिलकर बनाया है।

भारत में इस समय दो ही वैक्सीन उपलब्ध हैं। उनमें कोवैक्सिन का एफिकेसी रेट 81% है, जबकि कोवीशील्ड का कुछ शर्तों के साथ 80% तक। ऐसे में 91.6 फीसद इफेक्टिवनेस के साथ रूसी वैक्सीन सबसे ज्यादा इफेक्टिव वैक्सीन हो जाएगी। इस समय दोनों उपलब्ध वैक्सीन का प्रोडक्शन चार करोड़ डोज प्रतिमाह का है, जिससे सिर्फ 25 लाख डोज रोज दिए जा सकते हैं। वहीं,  इस समय 35 लाख डोज रोज दिए जा रहे हैं। इससे कम से कम 7 करोड़ डोज हर महीने चाहिए होंगे। भारत में रूसी वैक्सीन को डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरी विकसित कर रही है और इसके 1,500 वॉलंटियर्स पर फेज-3 ब्रिजिंग ट्रायल्स किए हैं। इसके साथ-साथ हिटरो बायोफार्मा और ग्लैंड फार्मा में भी प्रोडक्शन होगा।

देश में कोरोना के हालात के बीच सरकार की लाचारी पर सोशल मीडिया के जरिए लोग अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर #ResignModi  हैशटैग चलाया गया। इसके जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग की गई। इस ट्रेंड को अचानक ही 28 अप्रैल को फेसबुक ने ब्लॉक कर दिया। पश्चिम बंगाल में अंतिम चरणों का मतदान शुरू होने से कुछ ही घंटे पहले लगे इस ब्लॉक पर विवाद शुरू हो गया। विवाद बढ़ता देख फेसबुक ने कुछ घंटों बाद उस हैशटैग को दोबारा रीस्टोर कर दिया। इसी से जुड़ी रिपोर्ट में अमेरिका के वॉल स्ट्रीट जर्नल ने दावा किया था कि इसे सरकार के निर्देश के बाद हटाया गया। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा मोदी सरकार जन असन्तोष को दबा रही है।

दरअसल भारत में कोरोना के लगातार बढ़ते केस और हालात पर काबू नहीं पाने की वजह से केंद्र सरकार लोगों के निशाने पर है। इसी के मद्देनजर केंद्र के कहने पर फेसबुक से विवादित हैशटैग हटाने से जुड़ी अमेरिका मीडिया वॉल स्ट्रीट जरनल की रिपोर्ट का सरकार ने खंडन किया है। सरकार ने कहा कि पोर्टल की रिपोर्ट पूरी तरह से भ्रामक है और गलत इरादे से पेश की गई है। सरकार ने ऐसे किसी भी हैशटैग को हटाने के लिए निर्देश जारी नहीं किए थे। वहीं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक ने भी माना है कि उससे गलती से यह हैशटैग रिमूव हो गया था, जिसे बाद में रीस्टोर भी कर दिया गया।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की प्रवक्ता ने इस बारे में बताया कि हैशटैग #ResignModi को गलती से ब्लॉक कर दिया गया था। साथ ही उन्होंने यह भी सफाई दी कि भारत सरकार के कहने पर यह कदम नहीं उठाया गया और न ही उनके कहने पर इसे दोबारा रीस्टोर किया गया। फेसबुक ने इसे महज एक गलती करार दिया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on April 30, 2021 11:56 am

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